Cleanliness Will Transform the Country: Sahar Bhamla
आवाज द वाॅयस / नई दिल्ली
बदलते समय में जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो छोटे प्रयासों से बड़े बदलाव की राह दिखा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सहर भामला उन्हीं में से एक हैं। उनका मानना है कि स्वच्छता केवल एक आदत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। अगर व्यक्ति खुद को साफ रख सकता है, तो वह अपने आसपास और देश को भी स्वच्छ रखने में योगदान दे सकता है।
एक विशेष बातचीत में सहर भामला ने अपने जीवन, विचारों और काम के अनुभव साझा किए। उन्होंने साफ कहा कि अनुशासन और स्वच्छता का गहरा संबंध है। दिन में कई बार खुद को साफ रखना केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। यह सोच को भी प्रभावित करता है। जब व्यक्ति अपने प्रति सजग होता है, तो समाज के प्रति भी जिम्मेदार बनता है।
सहर का पर्यावरण से जुड़ाव अचानक नहीं हुआ। इसकी शुरुआत उनके घर से ही हुई। उनके पिता ने वर्षों पहले एक छोटे प्रयास के रूप में एक सामाजिक संगठन की शुरुआत की थी। समय के साथ यह पहल एक बड़े अभियान में बदल गई। सहर बताती हैं कि बचपन से ही उन्होंने लोगों की समस्याओं को करीब से देखा। दूसरे बच्चे जहां खेल में व्यस्त रहते थे, वहीं वह अपने पिता के साथ लोगों की बातें सुनती थीं। यही अनुभव उनके भीतर संवेदनशीलता लेकर आया।
धीरे धीरे उन्होंने महसूस किया कि समाज सेवा केवल बड़े कामों से नहीं होती। छोटे प्रयास भी असर डालते हैं। इसी सोच ने उन्हें पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में उन्हें लगा कि एक बार सफाई कर देने से समस्या खत्म हो जाएगी। लेकिन वास्तविकता अलग थी।
समुद्र तट की सफाई के दौरान उन्हें एक महत्वपूर्ण बात समझ आई। उन्होंने और उनके साथियों ने कचरा हटाया। लेकिन कुछ समय बाद वही कचरा लहरों के साथ वापस आ गया। इस अनुभव ने उनकी सोच बदल दी। उन्हें समझ आया कि केवल सफाई करना काफी नहीं है। असली जरूरत है लोगों की आदत बदलने की।
वह कहती हैं कि समस्या की जड़ हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में है। हम कुछ सेकंड के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसका असर वर्षों तक रहता है। प्लास्टिक बैग, बोतल और स्ट्रॉ जैसे सामान पर्यावरण को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए।
हालांकि वह यह भी मानती हैं कि हर व्यक्ति के सामने अपनी चुनौतियां होती हैं। हर कोई महंगी चीजें नहीं खरीद सकता। कई लोग रोजाना भागदौड़ में रहते हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद करना कि वे तुरंत पूरी तरह प्लास्टिक छोड़ दें, व्यवहारिक नहीं है। लेकिन छोटे कदम उठाए जा सकते हैं। जैसे घर से पानी की बोतल लेकर निकलना। या जरूरत से ज्यादा प्लास्टिक का उपयोग न करना।
सहर का जोर जागरूकता पर है। वह मानती हैं कि जब लोग खुद देखेंगे और समझेंगे, तभी बदलाव आएगा। इसलिए उनके अभियान में बच्चों और युवाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया जाता है। जब नई पीढ़ी समस्या को समझेगी, तभी उसका स्थायी समाधान संभव है।
उन्होंने स्वास्थ्य के पहलू पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि आज प्लास्टिक केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। यह हमारे शरीर तक पहुंच चुका है। हवा, पानी और भोजन सब प्रभावित हो रहे हैं। इसके कारण कई बीमारियां बढ़ रही हैं। छोटे बच्चों में भी गंभीर समस्याएं देखी जा रही हैं। यह स्थिति चेतावनी है।
सहर भामला ने बातचीत में धर्म और जीवन के संतुलन पर भी खुलकर बात की। उनका मानना है कि धर्म को कठिन बनाना सही नहीं है। आस्था व्यक्ति को सरल और जिम्मेदार बनाती है, न कि बोझिल। उन्होंने कहा कि धार्मिक जीवन और दुनियावी जिम्मेदारियां साथ साथ चल सकती हैं।
उनका दृष्टिकोण साफ है। व्यक्ति को अपने परिवार की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। साथ ही अपनी आस्था से भी जुड़ा रहना चाहिए। केवल पूजा में समय बिताना पर्याप्त नहीं है। जीवन के अन्य पहलुओं को भी उतना ही महत्व देना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि कई बार लोग धर्म को गलत तरीके से समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि सब कुछ छोड़कर केवल इबादत करना ही सही रास्ता है। जबकि सच्चाई यह है कि संतुलन ही सबसे महत्वपूर्ण है। एक जिम्मेदार इंसान वही है जो अपने परिवार, समाज और ईश्वर के प्रति समान रूप से समर्पित हो।
सहर का काम केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। वह समाज के कमजोर वर्गों की मदद में भी सक्रिय हैं। उनके अनुसार सेवा का कोई एक रूप नहीं होता। जहां जरूरत हो, वहां हाथ बढ़ाना ही असली इंसानियत है।
उनकी सोच सरल है लेकिन गहरी है। वह कहती हैं कि बदलाव किसी एक दिन में नहीं आता। इसके लिए लगातार प्रयास करना पड़ता है। और सबसे जरूरी है कि हम खुद से शुरुआत करें।
आज जब दुनिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है, तब सहर जैसे लोगों की सोच प्रेरणा देती है। वह हमें याद दिलाती हैं कि बड़े बदलाव के लिए छोटे कदम ही काफी होते हैं। स्वच्छता, जागरूकता और संतुलन यही वह तीन आधार हैं जिन पर एक बेहतर समाज खड़ा किया जा सकता है।
उनकी बातों में एक सादगी है। कोई जटिल भाषा नहीं। कोई दिखावा नहीं। बस साफ सोच और स्पष्ट संदेश। अगर हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाए, तो तस्वीर बदल सकती है। अंत में उनका संदेश सीधा है। खुद को बदलें। आदतें सुधारें। और दूसरों को भी प्रेरित करें। यही असली सेवा है। यही सही दिशा है।