कन्नौज : जहां की फ़िज़ाओं में महकता है इत्र

Story by  फिरदौस खान | Published by  [email protected] | Date 28-04-2023
कन्नौज : जहां की फ़िज़ाओं में इत्र महकता है
कन्नौज : जहां की फ़िज़ाओं में इत्र महकता है

 

फ़िरदौस ख़ान

उत्तर प्रदेश में गंगा तट पर बसा कन्नौज दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसकी फ़िज़ाओं में इत्र घुला हुआ है, जिसकी हवायें ख़ुशबू से मुअत्तर हैं. इत्र नगरी के नाम से मशहूर कन्नौज में तरह-तरह का इत्र बनाया जाता है. इत्र कई चीज़ों से बनता है. फूलों के अलावा सुंगंधित पौधों के दूसरे हिस्सों से भी इत्र बनाया जाता है, जैसे जाफ़रान, ख़स, लकड़ी, गर्म मसाले और कस्तूरी आदि से भी इत्र तैयार किया जाता है.   

इत्र का इतिहास

इत्र का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि दुनिया में सबसे पहले इत्र मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के लोगों ने बनाया था. यहां के लोग इत्र बनाने में माहिर थे. मेसोपोटामिया यानी सुमेरियन सभ्यऔता अब तक इंसानी इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है.

ये भी कहा जाता है कि बेबीलोन मेसोपोटामिया में ताप्पुती नाम की एक महिला कैमिस्ट ने फूलों की ख़ुशबू को तेल में मिलाकर इत्र बनाया था. तक़रीबन चार हज़ार साल पहले मिस्र के अमीर और आला तबक़े के लोग अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए इत्र का इस्तेमाल किया करते थे.

इत्र उनकी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा था. ख़ुशियों से लेकर ग़म तक के माहौल में इत्र का इस्तेमाल किया जाता था. शादी जैसी ख़ुशियां हों या मैयत रखी हो, हर मौक़े पर इत्र का इस्तेमाल होता था. ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जहां दुल्हन को इत्र लगाया जाता है वहीं मैयत के कफ़न पर भी इत्र छिड़का जाता है.       

चूंकि इस्लाम में शराब को हराम क़रार दिया गया है. इसलिए इत्र बनाने में ख़ुशबू वाले तेल का इस्तेमाल किया जाता है.क़ाबिले ग़ौर है कि फ़ारस के लोग सदियों तक इत्र के कारोबार में अव्वल रहे हैं. उन्होंने आसवन विधि का आविष्कार किया था. माना जाता है कि कन्नौज में इत्र बनाने का तरीक़ा फ़ारस से ही आया था. कन्नौज में आज भी इसी पुराने रिवायती तरीक़े से इत्र बनाया जाता है.

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इत्र से मुग़लों का रिश्ता  

मुग़ल बादशाहों को इत्र बहुत पसंद था. मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां को ख़ुशबुओं का बेहद शौक़ था. वे बालों में फूल लगाया करती थीं. उनके कमरे में तरह-तरह के ख़ुशबूदार फूलों के गुलदस्ते सजे रहते थे. कहते हैं कि जब वे नहाया करती थीं तो पानी में फूलों की पंखुड़ियां डलवा लिया करती थीं, ताकि पानी में उनकी ख़ुशबू घुल जाए. कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने देखा कि गर्म पानी में पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों से तेल निकल रहा है.

इस तेल में फूलों से भी ज़्यादा ख़ुशबू थी. इससे वे बहुत मुतासिर हुईं. उन्होंने इसका ज़िक्र बादशाह जहांगीर से किया. बादशाह ने उनकी बात को संजीदगी से लिया और उन्होंने फूलों से इत्र बनाने के काम को बढ़ावा दिया. कहा जाता है कि बादशाह ने नूरजहां के कहने पर फ़ारस से इत्र बनाने वाले कारीगर बुलाए थे और उन्होंने गुलाब से ख़ास तरह का इत्र बनाया था.

matkaइतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुस्तान में गुलाब के इत्र को बढ़ावा देने का श्रेय नूरजहां की मां अस्मत बेगम को जाता है. उन्होंने देखा कि नूरजहां के नहाने के लिए आए गर्म पानी के बर्तनों में जब गुलाब की पंखुड़ियां डाली जाती हैं, तो पानी की ऊपरी सतह पर हल्का सा तेल जमा हो जाता है.

उन्होंने इस तेल को छूकर देखा, तो इसमें बहुत तेज़ ख़ुशबू थी. ये ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि कई गुलाबों की महक भी इसके आगे फीकी मालूम होती थी. कहा जाता है कि तभी से हिन्दुस्तान में गुलाब का इत्र बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. हक़ीक़त ये है कि मुग़ल बादशाहों ने इत्र के कारोबार पर ख़ास तवज्जो दी और उनके शासनकाल में ख़ुशबू का ये कारोबार ख़ूब फलाफूला.    

आइने-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि मुग़ल बादशाह इत्र के शौक़ीन थे. बादशाह अकबर रोज़ाना इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. उन्हें ख़ुशबू बहुत पसंद थी. वे सोने और चांदी के बर्तनों में अगरबत्ती भी जलवाया करते थे. मुग़ल शहज़ादियां ख़ुशबू वाले पानी से नहाया करती थीं. वे इत्र भी लगाया करती थीं. उन्हें अगरऊद इत्र बहुत पसंद था.

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इत्र कैसे बनता है

इत्र बनाने के लिए ताज़े फूलों को ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में डाला जाता है. फिर देग़ों को ढककर गीली मिट्टी से सील कर दिया जाता है. फिर इन्हें भट्ठियों पर कई घंटों तक पकाया जाता है. इन देग़ों के ढक्कनों में पाइप लगे हुए होते हैं, जो भट्टियों के पास बनी पानी की हौज़ में रखे सुराहीनुमा ताम्बे के बर्तनों से जुड़े होते हैं.

इन्हें भपका कहा जाता है. इन बर्तनों में पहले से ही तेल होता है, जिसे बेस ऑयल कहा जाता है. जब देग़ के फूल पकने लगते हैं, तो उनमें से निकलने वाली भाप को इन बर्तनों में इकट्ठा किया जाता है. ये भाप बर्तन के तेल में अच्छी तरह से घुल-मिल जाती है.

फिर भाप मिले इस तेल को चमड़े के सुराहीनुमा थैलों में भर दिया जाता है. ये थैले ऊंट के चमड़े के बने हुए होते हैं. इन थैलों को एक रस्सी के सहारे धूप में ऊंची जगहों पर लटका दिया जाता है. ये थैले भाप की नमी को सोख लेते हैं और इस तरह ख़ुशबूदार इत्र तैयार होता है. 

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मिट्टी का इत्र

फूलों से इत्र बनाने के बारे में तो सब ही जानते हैं, लेकिन कन्नौज में मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. बारिश के दिनों में जब आसमान से रिमझिम बूंदे बरसती हैं, तो इससे यहां की मिट्टी से एक अलग ही तरह की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू उठती है. विज्ञान की बात करें तो कच्ची मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया जब बारिश के पानी में भीगते हैं, जो उनसे एक सौंधी सी महक पैदा होती है.

ये महक दिलो-दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून देती है. ये महक ऐसी होती है कि उदास मन भी चहक उठता है. इस महक से इंसान का नाता उतना ही पुराना है, जितना पुराना बारिश और मिट्टी का रिश्ता है.यहां के कारीगर इस ख़ुशबू को भी बोतलों में भरने का हुनर जानते हैं.

दरअसल फूलों की तरह ही इस मिट्टी को भी ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में भर दिया जाता है और फिर बारिश के पानी के साथ इसे पकाया जाता है. फिर इससे निकलने वाली भाप को इकट्ठा किया जाता है. इस तरह भाप को बेस ऑयल के साथ मिलाकर इत्र तैयार किया जाता है.          

itrअगरऊद

कन्नौज में दुनिया का सबसे महंगा इत्र बनाया जाता है, जिसका नाम है अगरऊद. अगर एक पेड़ का नाम है और ऊद का मतलब है तेल. अगरऊद यानी अगर का इत्र. अदर के पेड़ असम में पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी भी चन्दन की तरह ही ख़ुशबूदार होती है.

इसकी लकड़ी बहुत ज़्यादा महंगी होती है. इसलिए इसका इत्र भी बहुत ही महंगा होता है. अगरऊद के एक किलो इत्र की क़ीमत तक़रीबन 50लाख रुपये है. इसे शाही परिवार और दुनिया के अमीर लोग ही इस्तेमाल करते हैं. आम इंसान तो इसे ख़रीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता. इसके अलावा गुलाब से बनने वाले इत्र भी कम महंगे नहीं हैं. इनकी क़ीमत भी हज़ारों रुपये से लेकर लाखों रुपये है.

कन्नौज में गर्म मसालों से भी इत्र बनाया जाता है. ऐसे ही एक इत्र का नाम है शमामा. इसमें दालचीनी, जायफल, लौंग, चक्री फूल जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए इसकी तासीर बहुत गर्म है. अमूमन सर्दियों में इस इत्र का इस्तेमाल किया जाता है. गर्मियों में ख़स का इत्र बहुत अच्छा माना जाता है.  

कन्नौज में इत्र के कारोबार से जुड़े व सन रेज़ परफ़्यूमर्स के मालिक मुरसलीन चिश्ती बताते हैं कि चूंकि इत्र में किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसलिए इसकी क़ीमत ज़्यादा होती है. गुलाब के इत्र की क़ीमत 15हज़ार रुपये से लेकर चार लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है.

वे कहते हैं कि यहां जन्नतुल फ़िरदौस, केसर, बेला, मोगरा, चमेली, गेंदा, हिना, नर्गिस, गुलदाऊदी, ज़ाफरान, ख़स, केवड़ा, मजमुआ, शमामा, कस्तूरी आदि इत्र भी बनाए जाते हैं. यहां से विदेशों को करोड़ों रुपये का इत्र निर्यात किया जाता है. इन देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, इराक़, ईरान, रूस आदि शामिल हैं. इत्र के कारोबार का सालाना टर्नओवर तक़रीबन एक हज़ार करोड़ रुपये बताया जाता है. कोरोना काल में इत्र के कारोबार पर ख़ासा असर पड़ा था, लेकिन अब ये फिर से अपने ढर्रे पर वापस आ रहा है.

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फूलों की खेती

इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है.

वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं.

देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता

यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-  

  • 1. कन्नौज अत्तर
  • कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है. 
  • 2. पराग फ़्रेगरेंस
  • पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है.
  • 3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
  • काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है.
  • 4. अजमल इत्र
  • अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है.
  • 5. इंद्र सुगंध भंडार
  • इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है.
  • 6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम
  • मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
  • 7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
  • स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है.
  • 8. अल रिहैब
  • अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
  • 9. जेबी फ़्रेगरेंस
  • जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
  • 10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
  • एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट  दिल्ली में स्थित है.

(लेखिका शायरा, कहानीकार व पत्रकार हैं)




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