मंसूरुद्दीन फरीदी / नई दिल्ली
सर सैयद अहमद खान का नाम आते ही अक्सर लोगों के मन में एक सीमित छवि उभरती है। उन्हें केवल मुसलमानों के नेता के रूप में देखा जाता है। यह धारणा अधूरी है। सच इससे कहीं बड़ा है। सर सैयद सिर्फ एक समुदाय के सुधारक नहीं थे। वे उस दौर के ऐसे चिंतक थे जिन्होंने समाज को जोड़ने का काम किया। उन्होंने शिक्षा को आधार बनाया और इंसानियत को दिशा दी।
उन्नीसवीं सदी का भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा था। 1857 के बाद हालात और भी जटिल हो गए थे। अविश्वास बढ़ चुका था। ऐसे समय में सर सैयद ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने टकराव की जगह संवाद को महत्व दिया। उन्होंने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार माना। उनका मानना था कि बिना शिक्षा के कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
अलीगढ़ आंदोलन इसी सोच का परिणाम था। लेकिन यह आंदोलन किसी एक धर्म तक सीमित नहीं था। इसमें कई ऐसे लोग शामिल थे जो अलग पृष्ठभूमि से आते थे। खास बात यह थी कि सर सैयद ने अपने आसपास ऐसे लोगों को जोड़ा जो इंसानियत और तरक्की में विश्वास रखते थे।
उनके करीबी साथियों में कई हिंदू नाम प्रमुखता से सामने आते हैं। राजा जय किशन दास उनमें सबसे महत्वपूर्ण थे। वे केवल सहयोगी नहीं थे बल्कि भरोसेमंद मित्र भी थे। साइंटिफिक सोसाइटी की स्थापना में उनका योगदान अहम था। अलीगढ़ कॉलेज की नींव रखने में भी उन्होंने पूरी निष्ठा से साथ दिया। यह रिश्ता किसी औपचारिकता का नहीं था। यह विश्वास और सम्मान पर टिका था।
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बाबू श्याम प्रसाद भी सर सैयद के विचारों से प्रभावित थे। वे आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने कई कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी की। पंडित बद्री नाथ ने भी साइंटिफिक सोसाइटी को मजबूत बनाने में भूमिका निभाई। बाबू ज्योति प्रसाद ने गाजीपुर में उनके काम को आगे बढ़ाया। इन सभी नामों को अक्सर भुला दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि इनके बिना अलीगढ़ आंदोलन अधूरा होता।
सर सैयद की सोच साफ थी। वे भारत को एक साझा सांस्कृतिक विरासत मानते थे। उनके लिए धर्म निजी आस्था का विषय था। समाज का विकास उससे ऊपर था। वे अपने हिंदू मित्रों के साथ त्योहारों में शामिल होते थे। उनके घर के दरवाजे सबके लिए खुले रहते थे।
एक घटना इस बात को और स्पष्ट करती है। यह उनके पोते रास मसूद की बिस्मिल्लाह की रस्म से जुड़ी है। आमतौर पर यह रस्म मस्जिद में होती है। लेकिन सर सैयद ने इसे एक अलग तरीके से किया। उन्होंने इस समारोह को स्ट्रेची हॉल में आयोजित किया। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपने पोते को राजा जय किशन दास की गोद में बैठाकर बिस्मिल्लाह कराई। यह सिर्फ एक रस्म नहीं थी। यह एक संदेश था। एक ऐसा संदेश जिसमें विश्वास और भाईचारे की झलक थी।
उस मौके पर उन्होंने राजा जय किशन का स्वागत अपने सगे भाई की तरह किया। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने पोते में वही गुण देखना चाहते हैं जो उनके इस मित्र में हैं। यह बात बहुत कुछ कहती है। यह दिखाती है कि उनके लिए रिश्ते धर्म से बड़े थे।
सर सैयद का प्रभाव केवल मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं रहा। उनके काम ने दूसरे समुदायों को भी प्रेरित किया। महर्षि दयानंद सरस्वती इसका एक उदाहरण हैं। उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने हिंदू समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। उनके अनुयायियों ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा काम किया।
यह माना जाता है कि दयानंद एंग्लो वैदिक संस्थाओं की स्थापना में अलीगढ़ मॉडल की प्रेरणा थी। लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने भी इस बात को स्वीकार किया। यह इस बात का प्रमाण है कि सर सैयद की सोच व्यापक थी। वह सीमाओं में बंधी नहीं थी।
स्वामी दयानंद सरस्वती और सर सैयद के संबंध भी दिलचस्प हैं। जब दयानंद सरस्वती को विरोध का सामना करना पड़ा तो सर सैयद ने उन्हें अपने घर आमंत्रित किया। उन्होंने उनकी बातों को ध्यान से सुना। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने घर में वेदों का पाठ भी सुना। यह उस दौर के लिए असाधारण बात थी। इससे उनकी सहिष्णुता और खुलेपन का पता चलता है।
सर सैयद ने हमेशा दूसरों की भावनाओं का सम्मान किया। 1857 के बाद गाय का मुद्दा बहुत संवेदनशील था। उन्होंने इसे समझा। उन्होंने अपने कॉलेज में गोमांस पर रोक लगा दी। एक बार बकरा ईद के मौके पर कुछ छात्र गाय लेकर आए। जैसे ही उन्हें पता चला, वे तुरंत पहुंचे। उन्होंने उस गाय को बचाया और सख्त निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसा न हो। यह कदम किसी दबाव में नहीं था। यह उनके अपने विचारों का हिस्सा था।
उनका मानना था कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब लोग एक दूसरे की भावनाओं को समझें। उन्होंने कहा था कि हिंदू और मुसलमान भारत की दो आंखें हैं। अगर एक कमजोर होगी तो देश की दृष्टि भी कमजोर हो जाएगी। यह सोच आज भी प्रासंगिक है।
सर सैयद की पूरी जिंदगी एक संदेश देती है। यह संदेश है शिक्षा का। यह संदेश है सहिष्णुता का। यह संदेश है आपसी सम्मान का। उन्होंने दिखाया कि मतभेद होने के बावजूद साथ चला जा सकता है। उन्होंने यह भी सिखाया कि सुधार केवल भाषणों से नहीं आता। इसके लिए व्यवहार में बदलाव जरूरी है।
आज जब समाज में विभाजन की बातें होती हैं तो सर सैयद की याद और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका मॉडल हमें रास्ता दिखाता है। यह बताता है कि तरक्की का रास्ता टकराव से नहीं बल्कि सहयोग से निकलता है।
अलीगढ़ आंदोलन को केवल एक शैक्षिक पहल मानना गलत होगा। यह एक सामाजिक क्रांति थी। इसकी नींव इंसानियत पर रखी गई थी। इसमें हर उस व्यक्ति का योगदान था जिसने बेहतर समाज का सपना देखा।
सर सैयद अहमद खान की विरासत आज भी जिंदा है। यह सिर्फ इमारतों में नहीं है। यह विचारों में है। यह उन कहानियों में है जो हमें जोड़ती हैं। यह हमें याद दिलाती है कि असली ताकत एकता में है।और शायद यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।