असम लाखिमी मिस्त्री योजना: ग्रामीण महिलाओं की कंस्ट्रक्शन क्रांति

Story by  मुकुंद मिश्रा | Published by  [email protected] | Date 04-06-2026
Assam Lakhimi Mistry Scheme: A Construction Revolution for Rural Women
Assam Lakhimi Mistry Scheme: A Construction Revolution for Rural Women

 

पल्लव भट्टाचार्य

भारत के ग्रामीण विकास में महिलाओं की भूमिका हमेशा से रही है। लेकिन उन्हें अक्सर मजदूरी या सहायक कामों तक ही सीमित रखा गया। असम सरकार ने इस सोच को बदलने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य में लाखिमी मिस्त्री कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। यह योजना ग्रामीण महिलाओं को राजमिस्त्री बनाने का काम कर रही है। इससे महिलाएं अब केवल घर की देखरेख नहीं करेंगी बल्कि खुद घर का निर्माण भी करेंगी।

इस योजना की कल्पना असम के पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के कमिश्नर और आईएएस अधिकारी कीरिति झल्ली ने की है। उन्होंने इस कार्यक्रम को इस तरह तैयार किया है जिससे महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को हुनरमंद बनाकर विकास की मुख्यधारा से जोड़ना इसका मुख्य उद्देश्य है।

लाखिमी मिस्त्री योजना की शुरुआत और मुख्य उद्देश्य

असम में इस कार्यक्रम की आधिकारिक शुरुआत गुवाहाटी में की गई थी। इस कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मौजूद थे। यह पहल प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत शुरू की गई है। इसी दौरान केंद्र सरकार ने असम के लिए 3.76 लाख अतिरिक्त नए पक्के घरों को मंजूरी दी है। इतने बड़े पैमाने पर मकान बनने से राज्य में राजमिस्त्रियों की मांग बहुत बढ़ गई है। लाखिमी मिस्त्री योजना इसी मांग को पूरा करने और महिलाओं को रोजगार देने का काम कर रही है।

लाखिमी शब्द का अर्थ असमिया संस्कृति में देवी लक्ष्मी से है जो समृद्धि का प्रतीक हैं। मिस्त्री शब्द का मतलब एक कुशल कारीगर होता है। इन दोनों शब्दों को मिलाकर इस योजना का नाम रखा गया है। इसका सीधा संदेश है कि महिलाएं अब कुशल कारीगर बनकर अपने परिवार में समृद्धि लाएंगी। यह नाम समाज में महिलाओं की नई पहचान बनाने की एक कोशिश है।
 
ट्रेनिंग मॉड्यूल और सुविधाएं

पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग की रिपोर्ट के अनुसार यह ट्रेनिंग पूरी तरह से व्यावहारिक है। महिलाओं को सिर्फ बंद कमरों में नहीं सिखाया जाता है। उन्हें सीधे उन साइट्स पर ले जाया जाता है जहां प्रधानमंत्री आवास योजना के घर बन रहे हैं।

  • 53 दिनों का कोर्स: महिलाओं को 53 दिनों की पूरी ट्रेनिंग दी जाती है।

  • रोजाना स्टाइपेंड: ट्रेनिंग के दौरान महिलाओं को दैनिक भत्ता मिलता है जिससे उनका खर्च चल सके।

  • सर्टिफिकेट और टूलकिट: कोर्स पूरा होने पर राष्ट्रीय स्तर का सर्टिफिकेट और काम करने के लिए जरूरी औजारों की किट दी जाती है।

  • शिशु गृह की व्यवस्था: मांओं की सुविधा के लिए ट्रेनिंग सेंटर पर बच्चों की देखभाल के लिए क्रैच की व्यवस्था की गई है।

  • अन्य तकनीकी कोर्स: राजमिस्त्री के अलावा महिलाओं को टाइल्स लगाने और बिजली के काम की भी ट्रेनिंग दी जा रही है।

पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसे धेमाजी जिले के मोराढोल ग्राम पंचायत सहित कुछ चुनिंदा इलाकों में शुरू किया गया है। स्थानीय स्वयं सहायता समूह और जिला ग्रामीण विकास एजेंसियां महिलाओं की पहचान करने में मदद कर रही हैं। स्थानीय स्तर पर काम होने से ग्रामीण महिलाएं इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।

आर्थिक और सामाजिक बदलाव

इस योजना के आर्थिक परिणाम बहुत बड़े होने वाले हैं। जो महिलाएं पहले केवल दिहाड़ी मजदूर के रूप में कम पैसों में काम करती थीं वे अब कुशल कारीगर बनेंगी। ट्रेनिंग के बाद उनकी कमाई पहले से दोगुनी या तिगुनी हो सकती है। इसके अलावा स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे सरकारी प्रोजेक्ट्स में भी कुशल कामगारों की लगातार जरूरत होती है। महिलाओं के पास अब रोजगार के कई नए अवसर होंगे।

कमाई के साथ-साथ इसका सामाजिक असर भी गहरा होगा। ग्रामीण इलाकों में निर्माण कार्य को हमेशा पुरुषों का काम माना जाता रहा है। जब महिलाएं खुद घर की दीवारें चुनेंगी और छत डालेंगी तो समाज का नजरिया बदलेगा। परिवार के लोग बेटियों को बोझ समझने के बजाय उन्हें कमाऊ सदस्य के रूप में देखेंगे। गांवों की छोटी लड़कियां इन महिलाओं को देखकर आत्मनिर्भर बनने का सपना देख सकेंगी।
 
वैश्विक उदाहरण और भविष्य की राह

दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां महिलाओं ने निर्माण क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है। कीन्या और युगांडा जैसे अफ्रीकी देशों में महिलाओं को कंस्ट्रक्शन का काम सिखाया गया। वहां यह देखा गया कि महिलाओं के काम की क्वालिटी पुरुषों के मुकाबले बेहतर थी।

नेपाल में 2015 के भूकंप के बाद महिलाओं ने नए और मजबूत घर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। बांग्लादेश में भी महिलाएं ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रही हैं। असम की यह योजना इसलिए खास है क्योंकि इसे सीधे एक बड़े सरकारी हाउसिंग प्रोजेक्ट से जोड़ दिया गया है।

योजना को लंबे समय तक सफल बनाए रखने के लिए कुछ नए कदम उठाने की जरूरत होगी। भविष्य में इन प्रमाणित महिला मिस्त्रियों के सहकारी समूह बनाए जा सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए इन्हें सीधे ठेकेदारों और आम लोगों से जोड़ा जा सकता है। सरकार अगर अपने प्रोजेक्ट्स में इन महिला समूहों को प्राथमिकता दे तो इनके पास काम की कभी कमी नहीं होगी। इसके साथ ही इनके लिए बीमा और सुरक्षा उपकरण सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।

असम की लाखिमी मिस्त्री योजना केवल हुनर सिखाने का जरिया नहीं है। यह महिलाओं को समाज में बराबरी का हक और सम्मान दिलाने की एक मूक क्रांति है। जब महिलाएं खुद अपने हाथों से घर बनाएंगी तो देश का भविष्य भी मजबूत होगा।