ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
मालवीय नगर की उस सुबह को शायद लंबे समय तक भुलाया नहीं जा सकेगा। होटल की खिड़कियों से उठता काला धुआं, अंदर फंसे लोगों की चीखें, आग की भयावह लपटें और हर गुजरते सेकंड के साथ बढ़ता खतरा, पूरा इलाका एक बड़े हादसे का गवाह बन रहा था। लेकिन इसी भयावह मंजर के बीच कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मौत से जंग लड़ने का फैसला किया।
जब होटल के भीतर फंसे लोग मदद के लिए पुकार रहे थे, तब सबसे पहले दौड़कर पहुंचे आसपास के मोहल्ले के युवक थे। रिहान, साजिद, मुबारक और उनके जैसे कई स्थानीय मुस्लिम युवकों ने किसी आदेश, किसी सरकारी इंतजार या किसी सुरक्षा उपकरण का इंतजार नहीं किया। उन्होंने देखा कि लोग मर सकते हैं, इसलिए वे बचाने निकल पड़े।

आग तेजी से फैल रही थी। मुख्य रास्ता आग की चपेट में था। खिड़कियों पर लोग लटककर अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। ऐसे में इन युवकों ने आसपास की दुकानों से गद्दे और रजाइयां निकालकर सड़क पर बिछानी शुरू कर दीं। होटल के सामने कुछ ही मिनटों में गद्दों की एक अस्थायी सुरक्षा परत तैयार कर दी गई ताकि ऊपर से कूदने वाले लोगों की जान बचाई जा सके। कई लोगों ने दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल से छलांग लगाई और नीचे मौजूद लोगों ने उन्हें संभालने की कोशिश की।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, स्थानीय मुस्लिम युवकों ने होटल की खिड़कियों के शीशे तोड़े, लोगों को बाहर निकलने का रास्ता दिखाया और लगातार आवाज लगाकर उन्हें हिम्मत देते रहे। कुछ लोग घायल हुए, कई लोगों के हाथ-पैर टूटे, लेकिन वे जिंदा बाहर निकल आए। हर बचाई गई जान के पीछे उन लोगों की कोशिशें थीं जो खुद भी आग और धुएं के बीच खड़े थे।

सबसे खास बात यह रही कि उस समय किसी ने यह नहीं पूछा कि अंदर फंसा व्यक्ति कौन है, किस धर्म का है या कहां से आया है। लोगों ने सिर्फ इंसान देखा और उसे बचाने की कोशिश की। स्थानीय निवासियों के अनुसार, कई पीड़ित हिंदू परिवारों और अन्य समुदायों से जुड़े थे, लेकिन बचाव में जुटे युवकों के लिए उनकी पहचान सिर्फ इतनी थी कि वे मदद मांग रहे इंसान थे।
मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि यदि स्थानीय नागरिक तुरंत सक्रिय नहीं होते तो मृतकों की संख्या कहीं अधिक हो सकती थी। दमकल विभाग के पहुंचने से पहले ही मोहल्ले के लोग राहत और बचाव का काम शुरू कर चुके थे। कई लोगों को खिड़कियों से बाहर निकाला गया, कई को कूदने के लिए हिम्मत दी गई और कई घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया गया।
मालवीय नगर की इस त्रासदी में जहां आग ने कई परिवारों को गहरा दुख दिया, वहीं स्थानीय मुस्लिम युवकों की बहादुरी ने इंसानियत की एक ऐसी मिसाल भी पेश की जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। जब चारों ओर अफरा-तफरी थी, तब वे मदद का सहारा बने। जब लोग मौत से बचने के लिए पुकार रहे थे, तब वे उम्मीद बनकर खड़े थे। और जब हालात सबसे मुश्किल थे, तब उन्होंने यह साबित किया कि असली बहादुरी किसी पहचान में नहीं, बल्कि किसी अनजान की जान बचाने के लिए आगे बढ़ जाने में होती है।
राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर में शनिवार सुबह हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। सुबह लगभग 8:48 बजे एक बहुमंजिला इमारत में लगी आग ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया। इस दर्दनाक हादसे में अब तक 21 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 15 से अधिक विदेशी नागरिक शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं, 40 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, जबकि कई घायल अभी भी अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। प्रारंभिक जांच के अनुसार आग की शुरुआत इमारत के रसोईघर में हुए शॉर्ट सर्किट से हुई।