बाइसरण बरसी पर गूंजा संदेश: मजहब नहीं सिखाता बेगुनाहों का कत्ल

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 22-04-2026
Message Resounds on Baisaran Anniversary: ​​Religion Does Not Teach the Killing of the Innocent
Message Resounds on Baisaran Anniversary: ​​Religion Does Not Teach the Killing of the Innocent

 

ओनिका माहेश्वरी/ दानिश अली /श्रीनगर /पहलगाम

“वलक़द कर्रमना बनी आदम- अल्लाह ने आदम की तमाम औलाद को सम्मान दिया है, इसलिए किसी भी बेगुनाह इंसान की जान लेना सिर्फ एक व्यक्ति का कत्ल नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत को जख्मी करना है” ये कहना है मौलवी मोहम्मद अशरफ़  का। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम की बाइसरण घाटी में हुआ आतंकी हमला आज एक साल बाद भी कश्मीर की वादियों और पूरे देश के दिलों में एक ऐसे दर्द की तरह मौजूद है, जिसकी टीस समय गुजरने के बाद भी कम नहीं हुई है। 

कश्मीर की खूबसूरत वादियों में सुकून और प्रकृति की गोद में कुछ पल बिताने आए 22 भारतीय पर्यटक उस दिन आतंक की गोलियों का शिकार हो गए थे। जिस जगह पर आमतौर पर घोड़ों की टापें, बच्चों की हंसी और पर्यटकों की चहल-पहल सुनाई देती थी, वहां अचानक गोलियों की आवाज ने सब कुछ बदल दिया। उस घटना ने न केवल कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी, बल्कि कश्मीर की उस पहचान को भी गहरी चोट पहुंचाई जो बरसों से मोहब्बत, मेहमाननवाजी और इंसानियत के नाम से जानी जाती रही है।
 
 
हमले की पहली बरसी पर कश्मीर और देश के अलग-अलग हिस्सों से आए इस्लामी विद्वानों और उलेमा ने एक मंच से इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए साफ कहा कि आतंकवाद का किसी मजहब से कोई रिश्ता नहीं है। उन्होंने कहा कि इस्लाम अमन, रहमत और इंसानी भाईचारे का पैगाम देता है, जबकि बेगुनाह लोगों का खून बहाना मजहब की बुनियादी तालीमात के खिलाफ है। मौलाना सैयद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने अपने बयान में कुरआन की आयत “वलक़द कर्रमना बनी आदम” का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह ने इंसान को सम्मान के साथ पैदा किया है और हर इंसान के साथ हमदर्दी और करुणा से पेश आना ही सच्चे ईमान की पहचान है।
 
मौलाना ने कहा कि बाइसरण में जो हुआ, वह केवल एक आतंकी घटना नहीं थी बल्कि इंसानियत के खिलाफ एक ऐसा गुनाह था, जिसे किसी भी धर्म या तहजीब में सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि जो लोग कश्मीर की वादियों में सुकून तलाशने आए थे, उन्हें इस तरह मौत के हवाले कर देना उस सोच का प्रतीक है जो इंसानियत से कोसों दूर है। उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि इस घटना का दर्द केवल उन घरों तक सीमित नहीं है जिन्होंने अपने प्रियजन खोए, बल्कि हर संवेदनशील इंसान के दिल में यह जख्म आज भी ताजा है।
 
उन्होंने कहा कि इस्लाम यह सिखाता है कि दुख की घड़ी में इंसान को इंसान के साथ खड़ा होना चाहिए। यही वजह है कि कश्मीर के धार्मिक नेताओं ने पीड़ित परिवारों के लिए दुआ की और कहा कि जो लोग इस हमले में मारे गए, उनके लिए हर मजहब के लोग अपनी-अपनी आस्था के अनुसार शांति की प्रार्थना करें। मौलाना ने कहा कि इंसानियत का रिश्ता मजहब से ऊपर होता है और किसी भी दुखी परिवार के साथ खड़े होना हमारा फर्ज है।
 
 
हमले के बाद कश्मीर प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से घाटी के 48 पर्यटन स्थलों को स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए बंद कर दिया था। जैसे-जैसे हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे, वादी के कुछ पर्यटन स्थलों को फिर से खोल दिया गया, लेकिन एक साल गुजर जाने के बाद भी बाइसरण घाटी अब तक बंद है। वहां जाने वाले रास्तों पर आज भी पाबंदियां हैं और लोगों को आगे जाने की इजाजत नहीं है। जिस घाटी तक कभी हर दिन हजारों लोग पहुंचते थे, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है। जहां से बाइसरण की दूरी कुछ ही किलोमीटर है, वहां अब सुरक्षा बैरिकेड और खामोशी दोनों साथ दिखाई देते हैं।
 
मौलाना सैयद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने कहा कि कश्मीर के लोगों के दिलों पर लगा यह जख्म तब तक पूरी तरह नहीं भरेगा, जब तक देश और दुनिया से आने वाले पर्यटक फिर उसी भरोसे के साथ कश्मीर लौटकर नहीं आएंगे। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ कारोबार का मामला नहीं है, बल्कि दिलों के रिश्ते का सवाल है। कश्मीर और पर्यटकों के बीच केवल मेहमान और मेजबान का संबंध नहीं रहा, बल्कि वर्षों से एक भावनात्मक रिश्ता बना है जिसे आतंक की ताकतें तोड़ना चाहती हैं।
 
उन्होंने कहा कि कश्मीर की पहचान बंदूक की आवाज नहीं, बल्कि इंसानियत की आवाज है। यहां आने वाले लोग केवल पहाड़ देखने नहीं आते, बल्कि यहां के लोगों की मोहब्बत महसूस करने आते हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग आतंक के जरिए इस रिश्ते को तोड़ना चाहते हैं, वे कभी सफल नहीं होंगे क्योंकि कश्मीर की रूह में मोहब्बत बसती है, नफरत नहीं।
 
 
उलेमा ने कहा कि बाइसरण में जो हुआ, वह सिर्फ पर्यटकों पर हमला नहीं था, बल्कि कश्मीर की मेहमाननवाजी, उसकी तहजीब और उसकी पहचान पर हमला था। उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि इस दर्द को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। एक धार्मिक विद्वान ने कहा, “जो लोग उस दिन मारे गए, वे सिर्फ सैलानी नहीं थे, वे हमारे मेहमान थे। मेहमान की हिफाजत करना हमारी रिवायत है। उनकी मौत हमारे दिलों पर बोझ बनकर बैठी है।”
 
इस हमले का दर्द सिर्फ उन परिवारों तक सीमित नहीं है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया, बल्कि उन स्थानीय लोगों के दिलों में भी है जिनकी जिंदगी पर्यटन पर टिकी हुई है। बाइसरण के स्थानीय घोड़ा चालक नजीर अहमद की आंखें आज भी नम हो जाती हैं जब वह उस दिन को याद करते हैं। उन्होंने कहा, “हम आज भी सोचते हैं कि काश हम वहां होते और उन लोगों को बचा पाते। वो हमारे मेहमान थे, हमारे अपने जैसे थे। जो उनके साथ हुआ, उसने हम सबको अंदर से तोड़ दिया।”
 
नजीर बताते हैं कि उस हमले के बाद सिर्फ इंसानी नुकसान नहीं हुआ, बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी भी छिन गई।
 
बाइसरण घाटी तक जाने वाला रास्ता अब भी बंद है। वहां जाने की इजाजत न पर्यटकों को है और न ही स्थानीय लोगों को। उन्होंने भारी आवाज में कहा, “पहले यहां रोज सैलानी आते थे। घोड़े चलते थे, दुकानें खुलती थीं, बच्चों के घर में खाना बनता था। अब सब सूना है। घोड़े का चारा तक जुटाना मुश्किल हो गया है।”
 
एक अन्य स्थानीय युवक तस्लीम ने कहा कि बाइसरण सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं था, बल्कि यहां के लोगों की जिंदगी का हिस्सा था। “लोग यहां स्विट्जरलैंड जैसी खूबसूरती देखने आते थे, लेकिन हमारे लिए यह हमारी जिंदगी थी। उस एक घटना ने सब कुछ बदल दिया। अब रास्ता बंद है, काम बंद है और दिलों में डर बैठ गया है।”
 
हालांकि स्थानीय लोगों के शब्दों में दर्द साफ दिखाई देता है, लेकिन उनके दिलों में नफरत नहीं है। वे आज भी देश के बाकी हिस्सों से आने वाले पर्यटकों का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनका रिश्ता सिर्फ कारोबार का नहीं, बल्कि मोहब्बत का है। नजीर कहते हैं, “हमारा मरहम तभी होगा जब पर्यटक फिर से कश्मीर आएंगे। सिर्फ पैसे के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगे कि कश्मीर आज भी उनका अपना है।”
 
श्रद्धांजलि सभा में उलेमा ने एक स्वर में कहा कि समाज को आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना होगा। उन्होंने अपील की कि ऐसी घटनाओं को किसी धर्म की नजर से न देखा जाए, क्योंकि आतंक का कोई धर्म नहीं होता। उन्होंने कहा कि जब कोई मासूम मारा जाता है तो केवल एक जान नहीं जाती, बल्कि इंसानियत घायल होती है। इसलिए यह जरूरी है कि समाज हर उस विचार का विरोध करे जो नफरत और हिंसा को जन्म देता है।
 
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पहलगाम हमले की पहली बरसी पर यह साफ दिखाई दिया कि बाइसरण की वादी आज भी उस दर्द को अपने भीतर समेटे हुए है, लेकिन उसी दर्द के बीच उम्मीद की एक लौ भी जल रही है। वह उम्मीद इस बात की है कि एक दिन फिर वही वादियां पर्यटकों की आवाजों से गूंजेंगी, वही रास्ते फिर खुलेंगे और कश्मीर एक बार फिर अपने खुले दिल से मेहमानों का स्वागत करेगा। उलेमा ने कहा कि इंसानियत की आवाज हमेशा आतंक की आवाज से ऊंची रहेगी और यही उन 22 मासूम जिंदगियों के लिए सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।