पहलगाम हमले की बरसी: दर्द, साहस और उम्मीद

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 22-04-2026
Anniversary of the Pahalgam Attack: Pain, Courage, and Hope, AI Photo Hashmi
Anniversary of the Pahalgam Attack: Pain, Courage, and Hope, AI Photo Hashmi

 

मलिक असरग हाशमी

जम्मू कश्मीर के पहलगाम की वादियों में अप्रैल की ठंडी हवा आज भी वही है, लेकिन एक साल पहले की 22 अप्रैल की दोपहर ने इस खूबसूरत जगह की रूह तक हिला दी थी। बैसरन घाटी, जिसे अक्सर “मिनी स्विट्जरलैंड” कहा जाता है, उस दिन सैलानियों की हंसी से नहीं बल्कि गोलियों की आवाज और चीखों से गूंज उठी थी। 26 लोगों की जान गई। कई परिवार बिखर गए। और कश्मीर की पहचान पर एक गहरा जख्म दर्ज हो गया।

एक साल बाद जब इस हमले की बरसी आई, तो पहलगाम में सन्नाटा और संवेदनाओं का अजीब संगम दिखा। बाजार खुले थे, दुकानें सजी थीं, लेकिन ग्राहकों का इंतजार करती आंखों में एक खालीपन था। सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। हर रास्ते पर चौकसी थी। मगर इन सबके बीच सबसे ज्यादा मौजूद थी यादें। वो यादें जो हर चेहरे पर साफ दिखती हैं।

इस हमले की कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं है। यह इंसानियत, साहस और दर्द की कहानी है। इस कहानी का एक नाम है सैयद आदिल हुसैन शाह। एक साधारण पोनीवाला, जो उस दिन असाधारण बन गया। जब आतंकियों ने हमला किया, तो आदिल भागे नहीं। उन्होंने सैलानियों को बचाने के लिए खुद को आगे कर दिया। एक आतंकी की राइफल छीनने की कोशिश में उन्हें गोली लगी और वहीं उनकी मौत हो गई। लेकिन उस पल उन्होंने जो किया, उसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया।

उनके पिता सैयद हैदर शाह आज भी बेटे को याद करते हुए टूट जाते हैं। उनकी आवाज भर्रा जाती है। वे कहते हैं कि उनका बेटा किसी धर्म या नाम को नहीं देखता था। उसने सिर्फ इंसानियत को चुना। यही बात उन्हें गर्व भी देती है और भीतर से तोड़ भी देती है। उनका कहना है कि सरकार ने मदद की, लोगों ने साथ दिया, लेकिन बेटे की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती।

हाल ही में एकनाथ शिंदे ने अपना वादा निभाते हुए आदिल के परिवार को नया घर सौंपा। पहलगाम से करीब 30 किलोमीटर दूर हपतनार गांव में बना यह घर अब उनके परिवार की नई शुरुआत का प्रतीक है। पहले वे लकड़ी और टिन के जर्जर मकान में रहते थे। अब एक पक्की छत है, लेकिन उस छत के नीचे एक खाली जगह हमेशा रहेगी।

स हमले की दूसरी कहानी है नजाकत अली की। एक टूरिस्ट गाइड, जो उस दिन 11 सैलानियों के साथ बैसरन में मौजूद थे। नजाकत बताते हैं कि सब कुछ सामान्य था। सैलानी जिप लाइन और दूसरी गतिविधियों का आनंद ले रहे थे। अचानक गोलियां चलने लगीं। पहले किसी को समझ नहीं आया। फिर जब लोग गिरने लगे, तो हकीकत सामने आई।

उस अफरातफरी में नजाकत ने भागने के बजाय अपने मेहमानों को बचाने का फैसला किया। वे उन्हें लेकर भागे। बीच रास्ते में जब पता चला कि दो लोग पीछे रह गए हैं, तो वे वापस लौटे। उन्हें भी सुरक्षित लेकर आए। थके हुए, डरे हुए सैलानियों को पहलगाम तक पहुंचाया और फिर उन्हें रवाना किया। उनकी आवाज में आज भी उस दिन की दहशत साफ सुनाई देती है, लेकिन साथ ही एक गर्व भी है कि उन्होंने अपना फर्ज निभाया।

नजाकत आज भी सैलानियों से अपील करते हैं कि वे कश्मीर आएं। वे कहते हैं कि कश्मीर हिंदुस्तान का ताज है। यहां के लोग मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि अगर बैसरन बंद रहेगा और सैलानी नहीं आएंगे, तो यहां के लोगों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ेंगी। उनके शब्दों में दर्द भी है और उम्मीद भी।

इस हमले का असर सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं रहा जो उस दिन वहां थे। इसका असर पूरे कश्मीर पर पड़ा। पर्यटन, जो यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, बुरी तरह प्रभावित हुआ। हमले के बाद महीनों तक सैलानी नजर नहीं आए। होटल खाली रहे। टैक्सी ड्राइवरों और दुकानदारों की आमदनी ठप हो गई।

एक साल बाद हालात धीरे धीरे सुधर रहे हैं। कुछ सैलानी लौटे हैं। लेकिन संख्या अब भी पहले जैसी नहीं है। पहलगाम के बाजारों में शाम होते ही सन्नाटा छा जाता है। दुकानदार कहते हैं कि जब तक पहले जैसी भीड़ नहीं लौटेगी, तब तक जख्म भी हरे रहेंगे।

कैब ड्राइवर मंजूर उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपनी गाड़ी अस्पताल आने जाने के लिए मुफ्त में लगा दी थी। वे बताते हैं कि आतंकियों ने नाम पूछकर गोली मारी थी। यह एक साजिश थी लोगों को बांटने की। लेकिन उन्हें तसल्ली है कि देश ने एकजुट होकर इस साजिश को नाकाम कर दिया।

इस हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने भी कड़ा रुख अपनाया। भारतीय सेना ने आतंकियों के खिलाफ एक विशेष अभियान चलाया, जिसे “ऑपरेशन महादेव” नाम दिया गया। करीब 90 दिनों तक चली कार्रवाई के बाद 28 जुलाई को तीनों हमलावरों को मार गिराया गया। अधिकारियों का कहना था कि यह मिशन निर्दोषों को न्याय दिलाने के लिए था।

इसके समानांतर एक और बड़ी कार्रवाई “ऑपरेशन सिंदूर” के नाम से हुई, जिसमें सीमा पार आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन कार्रवाइयों ने यह संदेश दिया कि ऐसे हमलों का जवाब दिया जाएगा। लेकिन इसके बावजूद पहलगाम हमले के कुछ बड़े साजिशकर्ता अब भी पकड़ से बाहर हैं।

इस घटना का सबसे गहरा असर उन परिवारों पर पड़ा, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया। हरियाणा के करनाल के रहने वाले शहीद नेवी अफसर विनय नरवाल का परिवार आज भी उस दर्द से उबर नहीं पाया है। उनके पिता राजेश नरवाल कहते हैं कि सांस लेना ही जीवन नहीं होता। अंदर से टूट जाना भी एक तरह की मौत है।

वे बताते हैं कि बेटे की शादी के कुछ ही दिन बाद यह हादसा हुआ। घर में खुशियों का माहौल था। अचानक सब खत्म हो गया। अब घर में सन्नाटा है और यादें हैं। वे कहते हैं कि समय के साथ लोगों का आना जाना कम हो गया, लेकिन उनका दर्द कम नहीं हुआ। हर दिन, हर रात वही यादें उन्हें रुलाती हैं।

उनकी एक ही इच्छा है कि उनके बेटे का नाम हमेशा जिंदा रहे। वे उसके जन्मदिन पर समाज सेवा के काम करने की योजना बना रहे हैं। दर्द के बीच यह एक कोशिश है अपने बेटे की याद को जिंदा रखने की।

इस बीच बैसरन वैली अब भी बंद है। सुरक्षा कारणों से इसे फिलहाल सैलानियों के लिए नहीं खोला गया है। प्रशासन का कहना है कि जब तक पूरी तरह सुरक्षित व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक इसे खोलना ठीक नहीं होगा। वहां तक पहुंचने वाले रास्तों पर कड़ी निगरानी है और भविष्य में बेहतर कनेक्टिविटी के लिए सड़क बनाने की योजना भी है।

एक साल बाद पहलगाम की तस्वीर बदली जरूर है, लेकिन पूरी तरह नहीं। यहां दर्द भी है और उम्मीद भी। लोग चाहते हैं कि सैलानी लौटें, बाजार फिर से गुलजार हों और वादियों में फिर से हंसी गूंजे। वे यह भी चाहते हैं कि उस दिन की याद कभी मिटे नहीं, ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो।

शाम ढलते ही जब पहाड़ों पर अंधेरा उतरता है, तो पहलगाम की गलियों में एक सन्नाटा फैल जाता है। लेकिन उसी सन्नाटे के बीच एक उम्मीद भी जिंदा है। उम्मीद कि एक दिन सब कुछ पहले जैसा होगा। उम्मीद कि डर की जगह फिर से खुशियां लेंगी।

पहलगाम की यह कहानी सिर्फ एक हमले की नहीं है। यह इंसानियत की ताकत, दर्द की गहराई और उम्मीद की रोशनी की कहानी है। यह याद दिलाती है कि आतंक का मकसद चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, इंसानियत उससे हमेशा बड़ी होती है।

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