आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
एक समय था जब मैराज अहमद खान एक बल्लेबाज के रूप में क्रिकेट में नाम कमाने का सपना देखते थे। तीन दशक से अधिक समय बाद 50 वर्षीय मैराज आज भी खेल जगत में नाम कमाने की राह पर हैं, बस अंतर इतना है कि अब उनके हाथ में बल्ले के बजाय बंदूक है।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा से लेकर दुनिया भर के निशानेबाजी रेंज तक, मैराज की यात्रा उन्हें उन जगहों पर ले गई है जिनकी उन्होंने खेल की दुनिया में कदम रखते समय कभी कल्पना भी नहीं की थी।
जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियाई खेलों में वह घुड़सवार श्रुति वोरा के बाद भारतीय दल के दूसरे सबसे उम्रदराज सदस्य होंगे। वह चौथी बार एशियाई खेलों में भाग ले रहे हैं। लेकिन कभी ऐसा समय था जब निशानेबाजी से उनका कोई खास नाता नहीं था।
मैराज ने पीटीआई से कहा, ‘‘जब 1994 में यह सब शुरू हुआ, तब मैं क्रिकेट खेल रहा था।’’
मैराज बाएं हाथ के शीर्ष क्रम के बल्लेबाज थे, जो आमतौर पर तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आते थे। उन्होंने 1996 में जामिया मिलिया इस्लामिया में आने से पहले सीके नायडू और वीनू मांकड़ ट्रॉफी में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालय क्रिकेट भी खेला और विज़ी ट्रॉफी में भी भाग लिया। उनके साथियों में युवा वीरेंद्र सहवाग भी शामिल थे।