पोलियो नहीं रोक सका फरमान बाशा का पैरालंपिक सफर

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 06-09-2026
Farman Basha: Turning the challenge of polio into strength—a journey from Arjun Buland to the Paralympics.
Farman Basha: Turning the challenge of polio into strength—a journey from Arjun Buland to the Paralympics.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

जिस उम्र में जिंदगी ने फरमान बाशा को पोलियो जैसी चुनौती दी, उसी चुनौती को उन्होंने अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपनी ताकत बनाने का फैसला किया। व्हीलचेयर और कैलिपर्स के सहारे चलने वाले इस खिलाड़ी ने पावरलिफ्टिंग में ऐसा मुकाम हासिल किया कि दुनिया के सबसे बड़े पैरा खेल मंच यानी पैरालंपिक तक भारत का प्रतिनिधित्व किया।
 
बार पर रखा वजन बढ़ता गया और उसके साथ फरमान बाशा का हौसला भी। बीजिंग पैरालंपिक में 155 किलो वजन उठाकर चौथे स्थान पर रहना हो या लंदन और रियो में भारत का प्रतिनिधित्व करना, फरमान बाशा का सफर भारतीय पैरा खेलों के संघर्ष और जज्बे की एक खास कहानी है।

खिलाड़ी का परिचय

फरमान बाशा भारतीय पैरा पावरलिफ्टिंग के चर्चित खिलाड़ियों में से एक हैं। उनका जन्म 25 मार्च 1974 को बेंगलुरु, कर्नाटक में हुआ। बचपन में ही पोलियो की चपेट में आने के कारण उनके पैरों पर इसका स्थायी असर पड़ा। लेकिन शारीरिक चुनौती के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं टेलीविजन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया। बाद में जिम जाने के दौरान उनकी मजबूत ऊपरी शरीर की क्षमता ने उन्हें पावरलिफ्टिंग की ओर आकर्षित किया। फरमान बाशा की खासियत यह रही कि उन्होंने अपनी पहचान अपनी शारीरिक अक्षमता से नहीं, बल्कि अपनी खेल प्रतिभा से बनाई। पावरलिफ्टिंग में उन्होंने भारत को कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रतिनिधित्व किया और वर्षों तक राष्ट्रीय स्तर के शीर्ष खिलाड़ियों में बने रहे।
 
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शुरुआती जीवन और संघर्ष

फरमान बाशा 12 भाई-बहनों वाले परिवार में सातवें नंबर पर थे। परिवार के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना ज्यादा महत्वपूर्ण था और खेल को करियर बनाने का विचार आसान नहीं था। बचपन में पोलियो होने के बाद उन्हें चलने-फिरने के लिए कैलिपर्स और व्हीलचेयर की मदद लेनी पड़ी। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक स्थिति को अपने सपनों के रास्ते में आने नहीं दिया। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई की और जिम जाना शुरू किया। इसी दौरान एक दोस्त ने उन्हें पैरा खेलों के बारे में बताया। फरमान को महसूस हुआ कि उनकी शारीरिक क्षमता की सीमाओं के बावजूद पावरलिफ्टिंग में वे खुद को साबित कर सकते हैं। यहीं से उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया।
 
पावरलिफ्टिंग में शुरुआत और पहला बड़ा कदम

फरमान बाशा ने 1990 के दशक के आखिर में पावरलिफ्टिंग में अपनी पहचान बनानी शुरू की। 1997 के National Wheelchair Games में उन्होंने रजत पदक जीता। अगले साल 1998 में उन्होंने साउथ जोन चयन ट्रायल में स्वर्ण पदक जीतने के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। यही प्रदर्शन उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का महत्वपूर्ण पड़ाव बना। इसके बाद उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में करना शुरू किया। वर्ष 2002 में उन्होंने IPC Powerlifting World Championships में हिस्सा लिया और एथेंस 2004 पैरालंपिक में भी भारत की ओर से उतरे। एथेंस में वे 52 किलोग्राम वर्ग में दसवें स्थान पर रहे।
 
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बीजिंग पैरालंपिक में चौथे स्थान की कहानी

फरमान बाशा के करियर का एक महत्वपूर्ण अध्याय 2008 बीजिंग पैरालंपिक रहा। पुरुषों के 48 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने 155 किलोग्राम वजन उठाया और चौथे स्थान पर रहे। कांस्य पदक से वे मामूली अंतर से पीछे रह गए। आधिकारिक पैरालंपिक रिकॉर्ड में उनका परिणाम 155 किलोग्राम और चौथा स्थान दर्ज है। यह प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पैरा पावरलिफ्टरों के बीच भारत की चुनौती पेश की थी। पदक भले हाथ नहीं आया, लेकिन उनका प्रदर्शन भारतीय पैरा पावरलिफ्टिंग के लिए एक मजबूत संकेत था।
 
देश के लिए उपलब्धियां

फरमान बाशा ने अपने लंबे करियर में कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 2004 एथेंस, 2008 बीजिंग, 2012 लंदन और 2016 रियो पैरालंपिक में हिस्सा लिया। बीजिंग में वे चौथे, लंदन में पांचवें और रियो में फिर चौथे स्थान पर रहे। उनका अंतरराष्ट्रीय सफर पैरालंपिक तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विश्व चैंपियनशिप और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया। 2010 Guangzhou Asian Para Games में उन्होंने पदक जीता, जिसे बाद में रजत के रूप में दर्ज किया गया। 2014 Asian Para Games में भी उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया। उनका करियर यह दिखाता है कि भारतीय पैरा खेलों में निरंतरता कितनी महत्वपूर्ण होती है। चार पैरालंपिक खेलों में हिस्सा लेना अपने आप में उनकी लंबी खेल यात्रा और फिटनेस का प्रमाण है।
 
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अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर

फरमान बाशा की उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान तब मिली जब उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। भारत सरकार की आधिकारिक वार्षिक रिपोर्ट में उनका नाम 2007 के अर्जुन अवॉर्ड विजेताओं में पावरलिफ्टिंग की Disabled category के तहत दर्ज है। यह पुरस्कार 29 अगस्त 2008 को प्रदान किया गया था। इसलिए कई जगह दिखाई देने वाले 2009 के उल्लेख के बजाय सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इसे 2007 का अर्जुन अवॉर्ड, 2008 में प्रदान किया जाना चाहिए। यह सम्मान उस दौर में विशेष मायने रखता था, जब पैरा खिलाड़ियों को आज की तुलना में कम सुविधाएं और सीमित पहचान मिलती थी। फरमान बाशा का अर्जुन अवॉर्ड तक पहुंचना इस बात की राष्ट्रीय स्वीकृति थी कि पैरा खिलाड़ी भी देश के खेल इतिहास में उतना ही महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
 
जब पावरलिफ्टिंग ने कमजोरी को ताकत में बदल दिया

फरमान बाशा की प्रेरक कहानी का सबसे बड़ा हिस्सा यही है कि उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी अंतिम पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि पावरलिफ्टिंग ने उन्हें अपनी कमियों को भूलने और खेल पर ध्यान केंद्रित करने में मदद की। उनका मानना था कि दिव्यांगता को चुनौती के रूप में स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिए। उनका सफर केवल पदक जीतने की कहानी नहीं है। वे ऐसे समय में खेल रहे थे जब पैरा खिलाड़ियों के लिए रोजगार और आर्थिक सुरक्षा भी बड़ी चुनौती थी। 2016 की एक रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद उन्हें स्थायी नौकरी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने 2004 से भारतीय खेल प्राधिकरण में स्थायी नौकरी की कोशिश की थी, लेकिन लंबे समय तक उन्हें इसका लाभ नहीं मिला। इसके बावजूद उन्होंने खेल को नहीं छोड़ा। यही जिद उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है।
 
दूसरे खिलाड़ियों के लिए बने गुरु

फरमान बाशा की कहानी सिर्फ उनके अपने करियर तक सीमित नहीं रही। उन्होंने युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में भी योगदान दिया। उनके प्रशिक्षण से जुड़े खिलाड़ियों में सकीना खातून का नाम भी सामने आता है, जिन्होंने 2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीता था। इस तरह फरमान ने जो सीखा, उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश की। उनके लिए पावरलिफ्टिंग केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं रही, बल्कि ऐसा खेल बना जिसके जरिए वे दूसरे दिव्यांग खिलाड़ियों को भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकें।
 
 

 
 
आज फरमान बाशा क्या कर रहे हैं?

फरमान बाशा की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हालिया जानकारी उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग से लगातार जुड़े खिलाड़ी और मार्गदर्शक के रूप में दिखाती है। उन्होंने अपने लंबे करियर में प्रतियोगिताओं के साथ-साथ युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में भी भूमिका निभाई है। 2018 तक वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करते रहे और 2019 World Para Powerlifting Championships में भी उनका नाम दर्ज है। उनका लंबा खेल करियर इस बात का उदाहरण है कि एक खिलाड़ी अपने सक्रिय प्रतिस्पर्धी वर्षों के बाद भी खेल की अगली पीढ़ी को प्रभावित कर सकता है।
 
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फरमान बाशा की कहानी का संदेश

फरमान बाशा की कहानी में सबसे बड़ी जीत कोई एक पदक या एक प्रतियोगिता नहीं है। उनकी सबसे बड़ी जीत उस सोच पर है जो अक्सर दिव्यांगता को सीमा मान लेती है। उन्होंने पोलियो के साथ जीवन शुरू किया, व्हीलचेयर और कैलिपर्स का सहारा लिया, लेकिन फिर उसी जीवन से निकलकर पैरालंपिक के मंच तक पहुंचे। 155 किलो का वजन उठाने वाला यह खिलाड़ी असल में अपने कंधों पर उससे कहीं ज्यादा बड़ा बोझ उठा रहा था—पूर्वाग्रहों का, संघर्षों का और उन सवालों का कि क्या दिव्यांग खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय खेलों में देश का नाम रोशन कर सकते हैं। फरमान बाशा ने अपने प्रदर्शन से इन सवालों का जवाब दिया। उनकी कहानी बताती है कि शरीर की सीमाएं इंसान की मंजिल तय नहीं करतीं। मंजिल तक पहुंचने का रास्ता हौसला, मेहनत और लगातार कोशिश तय करती है।