कार रेसर, भारत यात्री और समाजसेवी… कई पहचान समेटे हैं रूबी खान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 02-08-2026
Car racer, traveler across India, and social worker—Ruby Khan embodies many identities.
Car racer, traveler across India, and social worker—Ruby Khan embodies many identities.

 

फरहान इसराइली

जयपुर। मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखिका, शिक्षिका, कार रेसर और ‘मिसेज जयपुर’ रह चुकी रूबी खान के लिए पहचान किसी पद या परिचय से नहीं, बल्कि उनके ज़मीनी काम से बनती है। राजस्थान में कहीं भी कोई त्रासदी, गंभीर घटना या जब लोगों को उनकी ज़रूरत होती है, तो वे वहां पहुंचने की कोशिश करती हैं। रूबी खान का मानना है कि केवल संवेदना जताना काफी नहीं होता, बल्कि यह ज़रूरी है कि पीड़ित तक राहत पहुंचे और उसे सरकारी योजनाओं का सही लाभ मिल सके। रूबी खान को आज पूरे राजस्थान में “भारत यात्री” के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि वे कन्याकुमारी से कश्मीर तक का सफर पैदल तय कर चुकी हैं।

लोग उन्हें इसी नाम से पहचानते हैं, जो उनके लंबे सफर और ज़मीनी जुड़ाव की एक अलग पहचान बन चुका है। रूबी खान से बातचीत शुरू होते ही उनकी सोच साफ़ समझ में आ जाती है। वे अपने काम को लेकर न तो दिखावे में विश्वास रखती हैं और न ही बड़े-बड़े दावे करती हैं। बहुत सादे शब्दों में वे कहती हैं कि अगर हम किसी के काम नहीं आ सके, तो हमारे होने का क्या मतलब?” पिछले करीब 20–22सालों से यही सोच उनके काम की दिशा तय कर रही है।

इस पूरे सफर में उनके साथ उनके पति कैप्टन मिर्जा बेग हमेशा खड़े रहे हैं। राजस्थान के पहले मुस्लिम पायलट माने जाने वाले कैप्टन बेग एक सक्रिय समाजसेवी भी हैं। रूबी बताती हैं कि शादी के बाद मेरे काम को दिशा मिली। हमने साथ मिलकर कई काम शुरू किए। इन कामों में चिकित्सा शिविर, दस्तावेज़ीकरण अभियान, कैरियर काउंसलिंग, मुफ्त राशन वितरण और जरूरतमंद लड़कियों की शादियों में सहयोग जैसे प्रयास शामिल हैं, जिनसे अब तक हजारों लोगों तक मदद पहुंची है।

जानकारी ही सबसे बड़ी ताकत

रूबी खान का मानना है कि वंचित वर्ग के सामने सबसे बड़ी बाधा संसाधनों की नहीं, बल्कि जानकारी तक पहुंच की है। वे कहती हैं कि लोगों को यह नहीं पता होता कि वे किन योजनाओं के हकदार हैं। इसी वजह से वे लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने, उनके दस्तावेज़ बनवाने, इलाज करवाने और उन्हें सिस्टम से जोड़ने का काम लगातार करती हैं। बेरोजगार युवाओं को रोजगार उन्मुख योजनाओं की जानकारी देना, उनकी काउंसलिंग करना और उन्हें नौकरी दिलाने में मदद करना उनके काम का अहम हिस्सा है। साथ ही वे युवाओं को स्किल-बेस्ड लघु उद्योग स्थापित करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। उनके पति कैप्टन मिर्जा बेग भी इस मिशन में बराबरी से जुड़े हैं। करियर काउंसलिंग के जरिए उन्होंने कई युवाओं को अपनी क्षमता पहचानने और सही दिशा चुनने में मदद की है।

महिलाओं के लिए सहारा, आत्मनिर्भरता की राह

घरेलू हिंसा के बारे में बात करते हुए रूबी खान कहती हैं कि आज भी समाज में कई महिलाएं चुपचाप सब सहती रहती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके पास कोई रास्ता नहीं है। ऐसे समय में वे उनके साथ खड़ी होती हैं, उन्हें समझाती हैं, उनका हौसला बढ़ाती हैं और जरूरत पड़ने पर कानूनी मदद भी दिलवाती हैं। वे सिर्फ महिलाओं ही नहीं, बल्कि उन पुरुषों की भी मदद करती हैं जो खुद को झूठे मामलों में फंसा हुआ पाते हैं। ऐसे लोगों को भी वे सलाह देती हैं और सही रास्ता दिखाने की कोशिश करती हैं। उनके इस काम में कई एनजीओ भी उनके साथ जुड़े हुए हैं। रूबी का मानना है कि असली बदलाव तब आता है जब इंसान अपने पैरों पर खड़ा हो। इसलिए वे महिलाओं को खुद कमाने लायक बनाने पर खास ध्यान देती हैं। उन्हें छोटे-छोटे काम शुरू करवाने में मदद करती हैं और जहां संभव हो, नौकरी से भी जोड़ती हैं। महिलाओं के लिए उन्होंने कैंसर जांच कैंप और ट्रेनिंग प्रोग्राम भी कराए हैं। मेहंदी, बैंकिंग और डिजिटल मार्केटिंग जैसे काम सिखाकर उन्होंने कई महिलाओं को खुद की कमाई शुरू करने में मदद की है। आज ये महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हैं और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही हैं।

कार रेसिंग में भी बनाई अलग पहचान

समाज सेवा और सामाजिक अभियानों के साथ-साथ रूबी खान ने खेल और एडवेंचर की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई। वे एक कार रेसर भी हैं और 2010से 2017के बीच आयोजित कई प्रतिष्ठित कार रेस प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर विजेता बनीं। उन्होंने ‘ब्लेज़ डी राजस्थान’, ‘वूमेन ऑन व्हील्स’ जैसी चर्चित कार रेसों में भाग लिया और अपनी ड्राइविंग क्षमता से खास पहचान बनाई। रूबी खान को राजस्थान की तीन सबसे तेज महिला कार रेसर्स में भी गिना जाता है। वे मानती हैं कि महिलाओं को हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित करने का अवसर मिलना चाहिए और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

पर्यावरण से जुड़ी संवेदनशील पहल

रूबी खान का काम पर्यावरण तक भी उतनी ही गंभीरता से फैला हुआ है। हर साल गर्मियों में वे पूरे जयपुर में ‘परिंडा अभियान’ चलाती हैं, जिसके तहत अलग-अलग जगहों पर पेड़ों और ऊंची जगहों पर पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था की जाती है। बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम जगाने के लिए उन्होंने हजारों ‘सीड पेंसिल’ (बीज वाली पेंसिल) वितरित कीं। वे बताती हैं कि बच्चा जब पेंसिल इस्तेमाल कर लेता है, तो उसके ऊपर लगे बीज को मिट्टी में लगा देता है। जो बच्चे पौधों की देखभाल करते हैं, उन्हें प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया जाता है। साथ ही हर वर्ष शिक्षक दिवस पर रूबी खान निस्वार्थ सेवा करने वाले शिक्षकों को सम्मानित करती हैं। उनका मानना है कि समाज की असली नींव शिक्षक ही होते हैं, और उनका सम्मान करना जरूरी है।

पूरे देश का पैदल सफर और हर दिन एक नई सीख

रूबी खान ने साल 2022में पूरे देश की लंबी पैदल यात्रा भी की। इस अनुभव को याद करते हुए वे कहती हैं कि करीब 150दिन तक लगातार चलना, 12राज्यों और 2केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरना, यह सिर्फ एक सफर नहीं था, बल्कि देश को करीब से समझने का मौका था। देश के अंतिम छोर कन्याकुमारी से शुरू होकर यह सफर श्रीनगर तक पहुंचा। इस दौरान करीब 4000किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। वे राजस्थान से इस यात्रा में शामिल होने वाली एकमात्र महिला थीं। वे कहती हैं कि यह मेरे लिए ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान की महिलाओं के लिए गर्व की बात थी। वे इसे अपने जीवन की एक बड़ी उपलब्धि मानती हैं। उनके लिए यह सफर सिर्फ दूरी तय करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग जगहों के लोगों, उनकी जिंदगी और उनकी संस्कृति को समझने का मौका भी बना।इस दौरान रहने का इंतजाम ट्रकों पर बने  कंटेनरों में होता था। एक महिला होने के नाते इतना लंबा पैदल सफर आसान नहीं था, और एक मुस्लिम महिला के रूप में तो उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। सफर के दौरान कभी तेज गर्मी, कभी लंबा रास्ता, कई बार पैरों में छाले हो जाते थे। लेकिन उन्होंने रुकना नहीं चुना। यात्रा के दौरान एक हादसे में उनके होंठ पर टांके आए और हाथ भी टूट गया। लेकिन दर्द और चोट के बावजूद उन्होंने सफर जारी रखा। रूबी बताती हैं कि उनके पति कैप्टन मिर्जा बेग ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया।

इस यात्रा ने उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों के लोगों से मिलने का मौका दिया। वे कहती हैं कि इस दौरान हजारों किसान मिले, मजदूर मिले, महिलाएं मिलीं, सबकी अपनी कहानी थी। तब समझ आया कि हमारा देश सिर्फ नक्शे पर नहीं, लोगों की जिंदगी में बसता है। यह सफर उनके लिए सिर्फ दूरी तय करने का नहीं, बल्कि खुद को और मजबूत बनाने का अनुभव बन गया, जहां हर दिन एक नई सीख और हर मुश्किल उन्हें आगे बढ़ाती रही। हालांकि यह यात्रा कांग्रेस की ओर से आयोजित थी, जिसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे थे। लेकिन रूबी के लिए इसका मतलब सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि समाज को करीब से देखना था।

परिवार से मिली प्रेरणा और विरासत

रूबी खान अपने काम की प्रेरणा अपने परिवार से जोड़ती हैं। वे खास तौर पर कैप्टन मिर्ज़ा बेग के पिता मिर्ज़ा मुख्तार बेग का जिक्र करती हैं, जो राजस्थान के एक जाने-माने सिविल इंजीनियर थे। उन्होंने अपने बच्चों को बचपन से ही समाज के लिए कुछ करने की सीख दी, जिसका असर आज भी पूरे परिवार में दिखता है। परिवार के बाकी सदस्य भी इसी सोच को आगे बढ़ा रहे हैं। कैप्टन बेग के छोटे भाई मिर्ज़ा शारिक बेग, जो एक जाने-माने सिविल इंजीनियर हैं, ने जल महल के जीर्णोद्धार में अहम भूमिका निभाई। जो जगह कभी अनदेखी पड़ी थी, आज वही जयपुर का एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन चुकी है। वहीं परिवार के सबसे छोटे भाई मिर्ज़ा साकिब बेग एक वैज्ञानिक हैं और अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इस तरह देखा जाए तो परिवार का हर सदस्य अपने-अपने तरीके से समाज में योगदान दे रहा है।

लेखन के जरिए समाज से जुड़ाव

रूबी खान ने अपने विचार सिर्फ काम के जरिए ही नहीं, बल्कि लेखन के जरिए भी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है। उन्होंने प्रोफेसर के.एल. कमल के साथ मिलकर “हिंदू धर्म और इस्लाम: दो आंखें, नई रोशनी” नाम की किताब लिखी। इस किताब का मकसद धर्म को लेकर फैली गलतफहमियों को दूर करना है। इसका विमोचन 2010में तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया था। यह किताब उपराष्ट्रपति के पुस्तकालय के साथ-साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी रखी गई है। इस किताब को हिंदू मुस्लिम एकता के लिए एक बेहतरीन मिसाल कहा जा सकता है। इसके अलावा उन्होंने बच्चों के लिए “ज्ञान के बुलबुले” नाम की एक कविता पुस्तक भी लिखी है। यह खास तौर पर छोटे बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी गई है, ताकि वे आसान भाषा में हमारी संस्कृति, पर्यावरण और अच्छे मूल्यों को समझ सकें।

सौंदर्य प्रतियोगिता का खिताब भी किया था अपने नाम

रूबी खान 2004का एक खास पल आज भी याद करती हैं। वे बताती हैं कि जब वह ‘मिसेज जयपुर’ के फाइनल तक पहुंची थीं और यह खिताब उन्हें मिला, तो उस समय उनके साथ सिर्फ कैप्टन बेग थे। जब उनका नाम पुकारा गया, तो सबसे पहले तालियां उन्होंने ही बजाईं। वे मानती हैं कि एक मुस्लिम महिला के तौर पर ऐसी सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेना आसान नहीं था। समाज में कई तरह की बातें होती हैं, लोगों की सोच भी अलग-अलग होती है। लेकिन उन्होंने इन सबके बीच खुद पर भरोसा बनाए रखा। उनके लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान और आत्मविश्वास को सामने लाने का मौका था।

आज रूबी खान और कैप्टन मिर्जा बेग अपने काम को और आगे बढ़ाने में जुटे हैं। वे युवाओं, महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए नए ट्रेनिंग प्रोग्राम, स्कॉलरशिप कैंप और जागरूकता अभियान शुरू करने की तैयारी में हैं। इसके साथ ही वे जयपुर की बढ़ती समस्याओं को समझते हुए शहर की पहचान और विरासत को बचाने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।