ज़ेबा नसीम
कश्मीर की वादियां सदियों से सूफी संतों की भूमि रही हैं। यहां की हवा में आज भी रूहानियत और आपसी भाईचारे की खुशबू तैरती है। श्रीनगर के बीचोबीच झेलम नदी के किनारे बनी खानकाह-ए-मौला इसी साझी संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक है। लोग इसे शाह-ए-हमदान की दरगाह के नाम से भी जानते हैं। यह सिर्फ पत्थर और लकड़ी से बनी कोई ऐतिहासिक इमारत नहीं है।
यह कश्मीर के सामाजिक और धार्मिक जीवन की आत्मा है। इस जगह का इतिहास चौदहवीं सदी के महान सूफी संत हजरत मीर सैयद अली हमदानी से जुड़ा हुआ है।हजरत मीर सैयद अली हमदानी ईरान के हमदान शहर से कश्मीर आए थे।
लोग उन्हें प्यार और आदर से शाह-ए-हमदान कहते हैं। वे चौदहवीं शताब्दी में सन् 1372 में पहली बार कश्मीर की सरजमीं पर पहुंचे थे। उस दौर में कश्मीर में अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के लोग रहते थे।
उन्होंने किसी पर दबाव नहीं डाला। उन्होंने प्रेम, शांति और नैतिकता के बल पर लोगों के दिलों को जीता। उनके विचार इतने सरल और असरदार थे कि हर कोई उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।

कश्मीर की अर्थव्यवस्था और शिल्पकला का बदलाव
शाह-ए-हमदान केवल धर्म का उपदेश देने वाले संत नहीं थे। वे एक बड़े समाज सुधारक भी थे। उनके साथ ईरान और मध्य एशिया से सैकड़ों कारीगर, विद्वान और सूफी विद्वान कश्मीर आए थे। इन कारीगरों ने स्थानीय लोगों को कई तरह के हुनर सिखाए। इनमें पश्मीना शॉल की बुनाई, लकड़ी पर नक्काशी, पेपर माशी और कालीन बुनाई शामिल थी।
आज कश्मीर की शॉल और हस्तशिल्प दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। इसकी बुनियाद शाह-ए-हमदान ने ही रखी थी। उन्होंने कश्मीरियों को सिखाया कि रूहानी प्रगति के साथ-साथ ईमानदारी से रोजी-रोटी कमाना भी बेहद जरूरी है। धर्म और काम के इस अनूठे तालमेल ने कश्मीर की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को हमेशा के लिए बदल दिया। लोग स्वावलंबी बने और घाटी में एक नई औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई।

वास्तुकला की एक अनूठी मिसाल
खानकाह-ए-मौला की इमारत को देखने के लिए हर साल देश और विदेश से हजारों पर्यटक आते हैं। यह कश्मीरी लकड़ी की वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है। इस इमारत की नींव पत्थरों पर टिकी है। इसके ऊपर दो मंजिला लकड़ी का ढांचा खड़ा किया गया है। इमारत की छत पिरामिड के आकार में बनी है। इस तरह की छत पारंपरिक कश्मीरी शैली की पहचान रही है।
इस दरगाह की नक्काशी किसी को भी हैरान कर सकती है। दरवाजों, खिड़कियों और खंभों पर हाथ से की गई बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। इमारत के अंदर दीवारों पर सुंदर अरबी कैलीग्राफी और सूफी पंक्तियां लिखी हुई हैं।
सबसे खास बात यह है कि इसकी बनावट में बौद्ध, हिंदू और इस्लामिक वास्तुकला की झलक एक साथ दिखाई देती है। यह इस बात का सबूत है कि कश्मीर हमेशा से विभिन्न संस्कृतियों का संगम रहा है।

आग का सामना और पुनर्निर्माण का इतिहास
खानकाह-ए-मौला का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही कठिनाइयों से भरा भी रहा है। इसका पहला निर्माण सुल्तान सिकंदर ने सन् 1395 में कराया था। उन्होंने यह इमारत शाह-ए-हमदान की याद में बनवाई थी। हालांकि, समय-समय पर इस ऐतिहासिक इमारत को भारी नुकसान भी झेलना पड़ा।
2. who visited Kashmir thrice during the 1920s, and recorded numerous inscriptions at Jamia Masjid, Hazratbal, and Khanqah-i Maulla. He published his findings in 1929, 'A Few Persian Inscriptions of Kashmir' in Asiatic Papers. Modi's translation of the chronogram reads as: pic.twitter.com/sjrMMYFenQ
— Hakim Sameer Hamdani (@HamdaniSameer) July 30, 2026
सन् 1480 में लगी एक भीषण आग में यह इमारत काफी हद तक जल गई थी। इसके बाद सन् 1493 में सुल्तान हसन शाह ने इसे दोबारा बनवाया। इतिहास ने एक बार फिर खुद को दोहराया। सन् 1731 में एक बार फिर आग लगने से इमारत को क्षति पहुंची।
इसके बाद अबुल बरकात खान ने इसका जीर्णोद्धार कराया। लगातार आए संकटों के बावजूद कश्मीरी लोगों ने अपनी इस रूहानी धरोहर को कभी मिटने नहीं दिया। हर बार इसे पहले से भी अधिक मजबूती के साथ दोबारा खड़ा किया गया।

सालाना उर्स और अकीदत का संगम
हर साल खानकाह-ए-मौला में हजरत शाह-ए-हमदान का सालाना उर्स बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान पूरी घाटी से हजारों की तादाद में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इसमें केवल एक धर्म के लोग शामिल नहीं होते। अलग-अलग आस्थाओं के लोग भी यहां संत को श्रद्धांजलि देने आते हैं।
उर्स के दिनों में माहौल पूरी तरह रूहानी हो जाता है। दिन-रात कुरान की तिलावत और जिक्र की महफिले सजती हैं। लोग अपने परिवार की सलामती और मुल्क में अमन-चैन की दुआएं मांगते हैं। यह वार्षिक आयोजन पुरानी और नई पीढ़ी के बीच एक पुल का काम करता है। युवा पीढ़ी को अपने इतिहास और सूफी परंपराओं को करीब से जानने का मौका मिलता है।

शांति और सद्भाव का शाश्वत संदेश
आज की दुनिया में जहां हर तरफ तनाव और आपसी मतभेद बढ़ रहे हैं, वहां शाह-ए-हमदान के विचार और प्रासंगिक हो जाते हैं। खानकाह-ए-मौला हमें याद दिलाती है कि असली धर्म इंसानियत से प्यार करना है। हिंसा और नफरत से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
झेलम नदी के शांत बहते पानी के किनारे स्थित यह इमारत आज भी हर गुजरते इंसान को यही संदेश देती है। सुबह की पहली किरण जब इसके सुनहरे गुंबद पर पड़ती है, तो एक अद्भुत दृश्य बनता है। शाम के समय नदी में छनकर आती इसकी परछाई मन को शांति से भर देती है।
खानकाह-ए-मौला महज बीती हुई तारीखों का दस्तावेज नहीं है। यह कश्मीर के अस्तित्व, उसकी साझी संस्कृति और जिंदादिली का जीता-जागता सबूत है। छह सौ साल से भी अधिक का समय बीत जाने के बाद भी शाह-ए-हमदान की यह सीख कश्मीरी समाज का मार्गदर्शन कर रही है। यह स्थान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी भाईचारे और शांति का प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।