पहली अफगान महिला बनीं एवरेस्ट विजेता जकिया अहमद

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 13-06-2026
From the Shadow of the Taliban to the Summit of Everest: Zakia Ahmed 'River's' Extraordinary Saga of Struggle
From the Shadow of the Taliban to the Summit of Everest: Zakia Ahmed 'River's' Extraordinary Saga of Struggle

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
21 मई का दिन इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया, जब अफगानिस्तान की ज़किया अहमद, जिन्हें दुनिया और उनके अपने प्यार से "रिवर" नाम से पुकारते हैं, ने दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगानुमा हौसला लहराया। इस ऐतिहासिक कामयाबी के साथ ही रिवर माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला बन गईं। लेकिन रिवर के लिए दुनिया की इस सबसे ऊंची और खतरनाक चोटी पर कदम रखना महज एक खेल या पर्वतारोहण का रिकॉर्ड भर नहीं था। यह उनके जीवन के उस लंबे, दर्दनाक और अंतहीन संघर्ष की पराकाष्ठा थी, जो उन्होंने बचपन से लेकर आज तक जिया है।

रिवर का एवरेस्ट तक पहुंचने का रास्ता किसी सामान्य एथलीट जैसा नहीं था; उनका यह सफर युद्ध, विस्थापन, अपनों को खोने के गहरे सदमे, गरीबी और सामाजिक पाबंदियों की कँटीली राहों से होकर गुजरा था। ऐसे समय में जब अफगानिस्तान में तालिबान के साये तले महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी बेहद महदूद कर दी गई है. जहाँ उनसे शिक्षा, खेल, रोजगार और सार्वजनिक जीवन का हर अधिकार छीन लिया गया है. रिवर की यह कामयाबी महज एक व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि पूरी अफगान महिला जाति के लिए घने अंधेरे में उम्मीद की एक बेहद चमकदार और नई किरण बनकर सामने आई है।
 

Zakiya Ahmad becomes first Afghan woman to climb Everest

बचपन की वो बंदिशें और जब मां ने कहा था- "तुम एक लड़की हो..."

रिवर के इस फौलादी इरादे की नींव 1990 के दशक में ही पड़ गई थी, जब उनका जन्म अफगानिस्तान के गजनी प्रांत के जाघोरी जिले में स्थित एक छोटे से गांव 'जोदारी' में हुआ था। वह एक ऐसे रुढ़िवादी माहौल में पली-बढ़ीं, जहां लड़कियों के पैदा होते ही उनके सामने मौकों के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते थे। बचपन से ही उनकी जिंदगी कड़ी मेहनत और संघर्षों के बीच गुजरी। स्कूल जाने की उनकी ललक इतनी तीव्र थी कि उन्हें हर दिन कई-कई घंटों तक पैदल चलकर जाना पड़ता था। इसके बावजूद, घर लौटकर वह सिर्फ आराम नहीं करती थीं, बल्कि अपने परिवार का हाथ बंटाने के लिए मवेशियों की देखभाल, खेती-बाड़ी और घर के रोजमर्रा के कड़े काम भी करती थीं।

रिवर ने अपनी जिंदगी के इन अनछुए पहलुओं का खुलासा पहली बार अप्रैल महीने में 'इत्तिलात रोज' (Etilaat Roz) अखबार को दिए एक बेहद भावुक और बेबाक इंटरव्यू में किया था, जब वह एवरेस्ट की अपनी अंतिम तैयारियों में जुटी थीं। बचपन को याद करते हुए रिवर ने बताया था कि उन्हें बहुत कम उम्र में ही इस बात का कड़वा अहसास करा दिया गया था कि समाज में लड़कियों के लिए कितनी सख्त पाबंदियां हैं।

रिवर ने उस इंटरव्यू में भावुक होते हुए कहा था: "मेरा मन हमेशा से ही पेड़ों पर चढ़ने और ऊंची-ऊंची जगहों से छलांग लगाने का करता था। मैं प्रकृति के करीब जाना चाहती थी। लेकिन जब भी मैं ऐसा करने की कोशिश करती, मेरी मां मुझे तुरंत टोक देती थीं और कहती थीं—'तुम एक लड़की हो, इसलिए तुम ये सब काम नहीं कर सकती।' उस वक्त मुझे समझ नहीं आता था कि लड़की होने का इन सब चीजों से क्या ताल्लुक है।"

जैसे-जैसे रिवर की उम्र बढ़ती गई, समाज का यह लैंगिक भेदभाव उनके सामने और साफ होता गया। उन्होंने देखा कि अफगान महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेतों और घरों में सबसे कठिन परिस्थितियों में काम करती थीं, लेकिन जब बात आजादी, अधिकारों और फैसलों की आती थी, तो उन्हें दोयम दर्जे का ही समझा जाता था। समाज उनसे सिर्फ यही उम्मीद करता था कि वे तयशुदा रीतियों के मुताबिक चुपचाप शादी कर लें और अपनी पूरी जिंदगी को चारदीवारी के भीतर समेट लें। लेकिन रिवर ने इन रीतियों के आगे घुटने टेकने से साफ इनकार कर दिया और अपनी पढ़ाई को हर हाल में जारी रखा।

From Afghanistan to Everest: Zakia Ahmad's Historic Ascent Offers Hope to  Afghan Women

काबुल से भारत का सफर: दिन में पढ़ाई, रात में कॉल सेंटर की शिफ्ट और वो जानलेवा हमला

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, रिवर ने अपने सपनों को बड़ा फलक देने के लिए राजधानी काबुल का रुख किया। वहां उन्होंने काबुल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और कुछ समय तक पत्रकारिता (Journalism) की पढ़ाई की। उनकी काबिलियत को देखते हुए जल्द ही उन्हें उच्च शिक्षा के लिए भारत से एक स्कॉलरशिप मिल गई, जिसने उनकी जिंदगी का रुख बदल दिया। भारत आकर उन्होंने 'बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन' (BBA) में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी की और इसके बाद 'इंटरनेशनल रिलेशन्स' (International Relations) में अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की।

हालांकि, भारत में उनका जीवन किसी सुनहरे सपने जैसा आसान नहीं था। विदेशी जमीन पर टिके रहने और अपने पीछे छूटे परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए वह दिन में अपनी पढ़ाई पूरी करती थीं और रातों को एक कॉल सेंटर में नाइट शिफ्ट में काम किया करती थीं। वह लगातार 18 से 20 घंटे जागकर अपने भविष्य का निर्माण कर रही थीं।

इसी दौरान, जब वह दिल्ली में रह रही थीं, तो उन्होंने वहां शरणार्थी के तौर पर रह रही अफगान महिलाओं की स्थिति और उनके अनुभवों पर एक गहरा शोध (Research) शुरू किया। इस रिसर्च के दौरान रिवर ने पाया कि ये बेघर महिलाएं गरीबी, मुफलिसी और विस्थापन के कारण किस कदर शोषण का शिकार हो रही थीं। रिवर उनकी इस दास्तान को दुनिया के सामने लाना चाहती थीं, लेकिन यह काम बेहद खतरनाक साबित हुआ।

एक दिन जब वह अपनी रिसर्च के सिलसिले में काम कर रही थीं, तब एक नकाबपोश अज्ञात हमलावर ने उन पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया। इस हमले में वह बाल-बाल बचीं, लेकिन उस चाकू का एक गहरा निशान उनके माथे पर हमेशा के लिए रह गया। इस भयानक और डरा देने वाले हादसे के बावजूद रिवर ने घुटने नहीं टेके; उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया और महिलाओं के इंटरव्यू लेना जारी रखा। वह आज भी उम्मीद करती हैं कि इन महिलाओं के संघर्षों की कहानियों को एक दिन वह किताब की शक्ल में जरूर प्रकाशित करेंगी।

तालिबान का वो खूनी हमला: जब चेहरे पर खून लगाकर बची जान

रिवर की जिंदगी मौत के साए से कितनी करीब रही है, इसका अंदाजा उस रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे से लगाया जा सकता है, जिसका जिक्र उन्होंने बाद में 'आउटसाइड ऑनलाइन' और 'न्यू लाइन्स मैगजीन' को दिए इंटरव्यू में किया था। बात साल 2014 की है, जब वह काबुल में अपनी यूनिवर्सिटी जाने के लिए एक बस में सवार थीं। अचानक तालिबान के हथियारबंद बंदूकधारियों ने उस बस को जबरन रोक लिया। बिना कुछ सोचे-समझे आतंकियों ने बस के भीतर मौजूद मासूम यात्रियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।

चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और लोग दम तोड़ने लगे। उस भयानक मंजर के बीच, मौत को अपने सामने खड़ा देख रिवर ने सूझबूझ से काम लिया। उन्होंने बस के फर्श पर पड़े अन्य मृतकों का खून अपने चेहरे और कपड़ों पर मल लिया और वहीं लाशों के बीच बिल्कुल बेजान होकर गिर गईं, जिससे आतंकियों को लगा कि वह मर चुकी हैं। तालिबानियों के जाने के बाद जब राहत दल पहुंचा, तो पता चला कि उस पूरी बस में सवार यात्रियों में से बारह लोगों की मौके पर ही मौत हो चुकी थी। रिवर उन बदकिस्मत यात्रियों में से जीवित बचने वाले महज तीन लोगों में से एक थीं।

इस घटना ने उनके दिलो-दिमाग पर एक ऐसा गहरा और अमिट सदमा (Trauma) छोड़ा, जिसने सालों तक उनका पीछा नहीं छोड़ा। 'न्यू लाइन्स मैगजीन' से बात करते हुए उन्होंने अपने इस मानसिक दर्द को बयां किया था: "उस खूनी हमले की यादें आज भी मेरे भीतर जिंदा हैं। वे मुझे कभी अकेला नहीं छोड़तीं। आज भी कई बार जब मैं सोती हूँ, तो बुरे सपनों में मुझे वही दो बंदूकधारी अपनी तरफ आते हुए और मुझ पर गोलियां चलाते हुए दिखाई देते हैं। मैं चाहकर भी उस खौफ को खुद से अलग नहीं कर पाती।"

Zakia Ahmed aka River Ahmed Becomes First Afghan Woman Climb Mount Everest  Despite Taliban Restrictions | तालिबान की पाबंदियों के बीच जकिया ने रचा  इतिहास, एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला

भाई अहमद वली की खुदकुशी और डिप्रेशन का वो अंधकार

साल 2014 के उस आतंकी हमले से उबरकर रिवर ने किसी तरह अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाया ही था कि नियति ने उन पर एक और बेहद क्रूर वार किया। साल 2022 में, जब अफगानिस्तान के हालात पूरी तरह बिगड़ गए, तो रिवर और उनका पूरा परिवार किसी तरह एक 'मानवीय वीजा' (Humanitarian Visa) के जरिए ऑस्ट्रेलिया जाने में कामयाब रहा। उन्हें लगा कि अब उनकी जिंदगी में सुकून आएगा, लेकिन नए देश में बसने के महज छह महीने बाद ही उनके छोटे भाई, अहमद वली, ने अचानक आत्महत्या (Suicide) कर ली।

अहमद वली की इस असामयिक मौत ने रिवर को अंदर से पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। वह अपने भाई से बेइंतहा प्यार करती थीं। भाई के जाने का गम इतना गहरा था कि वह पूरी तरह टूट गईं और गहरे डिप्रेशन में चली गईं। उन्होंने अपनी सारी सामाजिक गतिविधियां बंद कर दीं, काम पर जाना छोड़ दिया और वह रोजमर्रा की सामान्य जिंदगी से पूरी तरह कट गईं। इस मानसिक आघात और अवसाद का असर यह हुआ कि उन्हें कुछ समय के लिए बेघर (Homeless) तक होना पड़ा।

'इत्तिलात रोज' को दिए इंटरव्यू में इस बेहद निजी और दर्दनाक दौर को याद करते हुए रिवर ने कहा था: "अहमद वली की मौत के बाद हमारी दुनिया उजड़ गई थी। हम बस इतना ही समझ पाए कि उसके इस आत्मघाती कदम के पीछे कई बेहद जटिल और मानसिक कारण थे, जिन्हें हम समय रहते पूरी तरह भांप नहीं पाए।"

पहाड़ों में पनाह: भाई का वो आखिरी अधूरा वादा

अपनी मौत से ठीक पहले, अहमद वली और रिवर अक्सर घंटों बैठकर प्रकृति, ऊंचे पहाड़ों और अफगानिस्तान के उन कड़े संघर्षों से परे अपने सुनहरे सपनों के बारे में बातें किया करते थे। भाई-बहन की यही आपसी बातचीत बाद में रिवर के पर्वतारोहण के सफर का सबसे बड़ा आधार और प्रेरणा बनी।

रिवर बताती हैं: "मैं और मेरा भाई एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त और बहुत करीब थे। हम अक्सर अपने भविष्य और साझा सपनों को लेकर योजनाएं बनाते थे। एक बार, जब हम एक ऊंची पहाड़ी पर खड़े होकर नीचे की खूबसूरत वादियों को देख रहे थे, तो उसने मेरी तरफ देखा और कहा—'देखो, प्रकृति कितनी सुंदर है न!' फिर उसने आगे कहा कि आल्प्स (Alps) और एवरेस्ट (Everest) की खूबसूरती तो दुनिया की किसी भी दूसरी जगह से कहीं ज्यादा शानदार और अलौकिक होगी। उसी पल, मैंने उसकी आंखों में चमक देखी और उससे वादा किया कि मैं एक दिन उन ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ने में उसका साथ दूंगी और हम दोनों वहां जाएंगे।"

भाई की मौत के बाद, वही अधूरा वादा रिवर के जीने की एकमात्र वजह बन गया। जब वह गहरे दुख और अवसाद में डूब चुकी थीं, तब उन्हें समझ आया कि इस दर्द से उबरने का रास्ता पहाड़ों से होकर ही जाता है। उन्होंने कहा, “मेरे दुखों और मुश्किलों ने मुझे मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। ऐसे में पहाड़ ही मेरी आखिरी पनाहगाह (Refuge) बने। जब मैं दोबारा पहाड़ों की तरफ लौटी, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो इन विशाल पर्वतों ने मेरे सारे दुखों और आंसुओं को अपने भीतर समेट कर मुझे गले लगा लिया है। पहाड़ों के बीच जाकर मुझे मेरा खोया हुआ वजूद और जीने का मकसद फिर से मिल गया।”

मोंट ब्लैंक से एवरेस्ट की चोटी तक: एक ऐतिहासिक फतह

शुरुआत में, रिवर का पर्वतारोहण की तरफ कदम बढ़ाना किसी विश्व रिकॉर्ड को बनाने, नाम कमाने या कोई पदक जीतने के लिए नहीं था। यह उनके लिए एक थेरेपी (Therapy) की तरह था, जिसने उन्हें अपने भाई को खोने के गम से उबरने की शक्ति दी। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसे अपना जीवन बना लिया। ऑस्ट्रेलिया में रहते हुए, आर्थिक तंगहाली, नौकरी के दबाव और दैनिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने पर्वतारोहण की बेहद कठिन और पेशेवर ट्रेनिंग शुरू की।

हम जानते हैं कि पर्वतारोहण के लिए न केवल अत्यधिक शारीरिक सहनशक्ति (Endurance) और मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता होती है, बल्कि यह एक बेहद खर्चीला खेल है जिसके लिए भारी आर्थिक संसाधनों की जरूरत होती है। लेकिन रिवर ने हार नहीं मानी और फंड जुटाने के लिए दिन-रात एक कर दिया।

माउंट एवरेस्ट के मुख्य अभियान पर निकलने से पहले, रिवर ने अपनी क्षमताओं को जांचने के लिए नेपाल और यूरोप की कई बेहद कठिन चोटियों पर फतह हासिल की। इसी सिलसिले में उन्होंने यूरोप महाद्वीप के आल्प्स पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी, 'मोंट ब्लैंक' (Mont Blanc) पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की। मोंट ब्लैंक की इस कामयाबी ने रिवर के भीतर उस आत्मविश्वास को दोबारा जगा दिया कि जो सपना उन्होंने कभी अपनी आंखों में सजाया था और जो वादा अपने दिवंगत भाई से किया था, उसे पूरा करने का समय अब आ गया है।

अफगान महिलाओं के नाम एक अमिट संदेश: "मैं कभी रुकी नहीं..."

रिवर के लिए एवरेस्ट की यह चढ़ाई केवल उनकी निजी जीत या उनके भाई को दी गई एक श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि यह अफगानिस्तान की उन करोड़ों महिलाओं और बच्चियों के हक की आवाज थी, जिन्हें तालिबान शासन ने उनके घरों में कैद कर दिया है।

एवरेस्ट के लिए काठमांडू से रवाना होने से ठीक पहले, अप्रैल में 'इत्तिलात रोज' को दिए अपने इंटरव्यू के आखिरी हिस्से में रिवर ने अफगानिस्तान की अपनी बहनों के लिए एक बेहद शक्तिशाली संदेश दिया था। उन्होंने कहा था: "अफगानिस्तान की तमाम महिलाओं और लड़कियों के लिए मेरा सिर्फ एक ही संदेश है. हालात चाहे कितने भी काले और विपरीत क्यों न हों, अपनी आकांक्षाओं, अपनी पढ़ाई और अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करना कभी मत छोड़ना। हर एक इंसान के भीतर असीम क्षमताएं छुपी होती हैं। अगर आपमें सच्ची कोशिश और अटूट लगन है, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आपके सपनों तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।"

इस ऐतिहासिक फतह के पीछे महीनों की हाड़-तोड़ ट्रेनिंग, खतरनाक मौसम से जूझने की तैयारी, फंड जुटाने की जद्दोजहद और कई व्यक्तिगत त्याग शामिल थे। चोटी पर अंतिम चढ़ाई शुरू करने से पहले, उन्होंने खुद को अत्यधिक ऊंचाई (High Altitude) और कम ऑक्सीजन वाले जानलेवा माहौल के अनुकूल ढालने (Acclimatization) के लिए नेपाल की कुछ अन्य छोटी चोटियों पर भी चढ़ाई की थी।

और आखिरकार, 21 मई की उस सुनहरी सुबह, रिवर का वह असंभव सा दिखने वाला सपना हकीकत में तब्दील हो गया। ज़किया अहमद "रिवर" ने दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर, माउंट एवरेस्ट पर अपने कदम रख दिए। उन्होंने न केवल अपने भाई से किया वादा पूरा किया, बल्कि इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों से दर्ज करा दिया।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

A post shared by Isa Soares (@isasoarescnn)

 

उनकी यह ऐतिहासिक चढ़ाई दुनिया भर के खेल जगत के लिए पर्वतारोहण की एक सामान्य घटना से कहीं बढ़कर है। यह इस बात का जिंदा सुबूत है कि एक इंसान का हौसला दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ से भी ज्यादा ऊंचा हो सकता है। जैसा कि उन्होंने अपने अभियान की शुरुआत में बेहद गर्व से कहा था: "अफगानिस्तान की कई अन्य महिलाओं की तरह, मेरी जिंदगी भी मुश्किलों, कांटों और आंसुओं से भरी रही है; मुझे बार-बार गिराने की कोशिश की गई... लेकिन मैं कभी रुकी नहीं, और आज मैं दुनिया के शिखर पर हूँ।"

सौजन्य: Kabul Now