क्या आप जानते हैं, विश्व कप की गेंद चार्ज होती है?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-06-2026
Do you know that the World Cup ball is charged ?
Do you know that the World Cup ball is charged ?

 

अरीबा हाशमी

फुटबॉल का खेल हमेशा से ही रोमांच, गति और कभी-कभार होने वाले बड़े विवादों के लिए जाना जाता रहा है। कई बार एक गलत ऑफसाइड या हैंडबॉल का फैसला पूरे मैच का पासा पलट देता है। लेकिन इस साल चल रहे फीफा विश्व कप 2026 में तकनीक ने रेफरी की भूमिका को एक नया आयाम दे दिया है। इस बार मैदान पर दौड़ने वाली फुटबॉल कोई साधारण गेंद नहीं है। खेल शुरू होने से पहले इस गेंद को मोबाइल की तरह चार्ज करना पड़ता है।

एडीडास की इस नई आधिकारिक मैच बॉल का नाम ट्रायोंडा है। यह गेंद मैदान पर होने वाली हर हलचल को डिजिटल डेटा में बदल रही है। ऐसे में प्रशंसकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर मैच के बीच में यह हाई-टेक गेंद खराब हो जाए या इसकी बैटरी खत्म हो जाए तो क्या होगा।

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क्या है ट्रायोंडा और इसके नाम की कहानी

इस बार के विश्व कप की आधिकारिक गेंद का नाम ट्रायोंडा रखा गया है। स्पेनिश भाषा में ट्रायोंडा का सीधा सा अर्थ होता है तीन लहरें। यह नाम बेहद सोच-समझकर चुना गया है। यह 2026 टूर्नामेंट के तीन मेजबान देशों कनाडा, मैक्सिको और संयुक्त राज्य अमेरिका की एकता को दर्शाता है।

गेंद का विजुअल डिजाइन भी इन तीनों देशों की संस्कृति से प्रेरित है। इसमें लाल, हरे और नीले रंगों का खूबसूरत इस्तेमाल किया गया है। इसके साथ ही गेंद पर तीनों देशों के राष्ट्रीय प्रतीक भी छपे हैं। इसमें कनाडा का मेपल का पत्ता, मैक्सिको का चील और अमेरिका का तारा साफ देखा जा सकता है।

एडीडास और फीफा की तकनीकी टीम को इस गेंद को अंतिम रूप देने में साढ़े तीन साल का लंबा वक्त लगा है। इस दौरान दुनिया के अलग-अलग मौसम और मैदानों पर इसके कई गुप्त और कड़े परीक्षण किए गए।

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चार पैनल का अनोखा गणित और जाबुलानी का सबक

अगर हम पारंपरिक फुटबॉल की बनावट को देखें तो वह कई पैनलों को आपस में जोड़कर बनाई जाती है। पुराने समय में इस्तेमाल होने वाली क्लासिक गेंदों में 32 पैनल होते थे। लेकिन ट्रायोंडा ने इस मामले में एक नया रिकॉर्ड बनाया है। यह विश्व कप के इतिहास की पहली ऐसी गेंद है जिसे सिर्फ चार पैनलों की मदद से तैयार किया गया है।

पैनलों की संख्या कम होने का सीधा फायदा इसकी बनावट को मिलता है। इससे गेंद की सतह बेहद गोल और चिकनी हो जाती है। जब गेंद हवा में तैरती है तो उसकी गति पूरी तरह नियंत्रित रहती है। साल 2010 के दक्षिण अफ्रीका विश्व कप में इस्तेमाल हुई जाबुलानी गेंद को लेकर गोलकीपरों ने काफी शिकायतें की थीं।

उनका कहना था कि जाबुलानी हवा में अजीब तरह से डगमगाती है जिससे उसके आने की दिशा का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता था। ट्रायोंडा में इस समस्या को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। इसके बाहरी आवरण पर गहरी सिलाई की गई है। साथ ही इस पर उभरी हुई और धंसी हुई सूक्ष्म बनावट यानी माइक्रो टेक्सचर दिया गया है। यह बनावट बारिश या अत्यधिक उमस वाले मौसम में भी खिलाड़ियों को गेंद पर बेहतर ग्रिप देती है।

गेंद के अंदर छिपी जादुई कंप्यूटर चिप

इस फुटबॉल की असली ताकत इसके बाहरी रंग-रूप में नहीं बल्कि इसके एक पैनल के अंदर छिपी है। इसके भीतर एक इनर्शियल मेजरमेंट यूनिट यानी आईएमयू सेंसर लगाया गया है। यह छोटा सा सेंसर किसी कंप्यूटर चिप की तरह काम करता है। यह गेंद की गति, उसके घूमने की रफ्तार, स्पिन और खिलाड़ी के पैर से होने वाले हर संपर्क को प्रति सेकंड 500 बार रिकॉर्ड करता है।

यह सेंसर बिना किसी तार के वायरलेस तकनीक के जरिए सारा डेटा सीधे वीडियो असिस्टेंट रेफरी यानी वीएआर रूम को भेजता है। स्टेडियम के चारों तरफ लगे एडवांस ऑप्टिकल ट्रैकिंग कैमरे इस डेटा को रिसीव करते हैं। इसके बाद कंप्यूटर स्क्रीन पर मैच का एक लाइव डिजिटल मॉडल तैयार हो जाता है।

पिछले कतर विश्व कप में इस्तेमाल हुई अल रिहला गेंद में यह सेंसर बिल्कुल बीच में लटका होता था। लेकिन ट्रायोंडा में इसे एक पैनल के अंदर सेट किया गया है। गेंद का संतुलन न बिगड़े और वह हवा में एक तरफ न झुके, इसके लिए एडीडास ने बाकी के तीन पैनलों में बराबर वजन के काउंटरवेट जोड़े हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि तकनीक से लैस होने के बावजूद यह मैदान पर एक सामान्य फुटबॉल की तरह ही व्यवहार करे।

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मोबाइल की तरह चार्जिंग और छह घंटे का पावर बैकअप

चूंकि इस सेंसर को लगातार काम करने के लिए बिजली की जरूरत होती है, इसलिए इसके अंदर एक छोटी रिचार्जेबल बैटरी लगाई गई है। हर मैच की शुरुआत से ठीक पहले सभी गेंदों को एक विशेष वायरलेस चार्जिंग डॉक पर रखा जाता है। यह ठीक वैसे ही काम करता है जैसे हम अपने स्मार्टफोन को बिना केबल के चार्ज करते हैं। इस तकनीक को इंडक्टिव चार्जिंग कहा जाता है।

इस गेंद को पूरी तरह चार्ज होने में करीब 90 मिनट का समय लगता है। एक बार फुल चार्ज होने के बाद इसकी बैटरी मैदान पर लगातार छह घंटे तक काम कर सकती है। यह बैकअप समय किसी भी फुटबॉल मैच के 90 मिनट, एक्स्ट्रा टाइम और पेनल्टी शूटआउट को मिलाकर भी बहुत ज्यादा है। फीफा के नियमों के अनुसार हर मैच से पहले सभी मैच बॉल्स को चार्ज करना अनिवार्य है।

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अगर मैच के दौरान गेंद खराब हो जाए तो क्या होगा?

अब आते हैं उस अहम सवाल पर कि अगर मैच के दौरान यह गेंद डैमेज हो जाए या इसकी बैटरी अचानक ठप हो जाए तो खेल कैसे आगे बढ़ेगा। फीफा के आधिकारिक नियमों के मुताबिक मैदान पर केवल एक गेंद नहीं होती। मैच कमिश्नर और रेफरी की देखरेख में साइडलाइन पर कई बैकअप गेंदें हमेशा तैयार रखी जाती हैं। इन सभी बैकअप गेंदों को भी मुख्य गेंद की तरह ही पूरी तरह चार्ज करके और सेंसर ऑन करके रखा जाता है।

अगर खेल के दौरान मुख्य गेंद पंचर हो जाती है, उसकी सिलाई खुल जाती है या तकनीकी खराबी के कारण वीएआर रूम में उसका डेटा मिलना बंद हो जाता है, तो फील्ड रेफरी तुरंत खेल को रोकता है। रेफरी के इशारे पर चौथी ऑफिशियल तुरंत साइडलाइन से एक दूसरी चार्ज्ड ट्रायोंडा गेंद मैदान के अंदर भेज देती है।

खराब हुई गेंद को तुरंत सिस्टम से डी-लिंक कर दिया जाता है और नई गेंद का सेंसर वीएआर रूम के कैमरों से जुड़ जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में महज कुछ सेकंड का समय लगता है जिससे खेल की लय प्रभावित नहीं होती।

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सटीक फैसलों से सुधरेगा फुटबॉल का स्तर

इस आधुनिक डेटा तकनीक का सबसे बड़ा फायदा मैदान पर ऑफसाइड और हैंडबॉल के विवादित फैसलों को सुलझाने में मिल रहा है। फुटबॉल के इतिहास में ऑफसाइड को लेकर हमेशा से बहस होती रही है। पहले रेफरी को वीडियो फुटेज के अलग-अलग फ्रेम देखकर फैसला लेना पड़ता था जिसमें मानवीय भूल की गुंजाइश रहती थी। लेकिन ट्रायोंडा इस संशय को खत्म कर देती है।

सेंसर यह सटीक समय बताता है कि पास देने वाले खिलाड़ी के पैर से गेंद किस मिलीसेकंड पर अलग हुई। उसी सटीक समय पर कैमरे दूसरे खिलाड़ी की पोजीशन को ट्रैक कर लेते हैं। इससे ऑफसाइड का फैसला पलक झपकते ही बेहद सटीकता से हो जाता है। हैंडबॉल की स्थिति में भी यह सेंसर बता देता है कि गेंद किसी खिलाड़ी के हाथ से छुई है या नहीं। इसके अलावा गोल लाइन टेक्नोलॉजी को भी इससे अतिरिक्त मदद मिलती है।

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रणनीति का नया खजाना और मानवीय हस्तक्षेप पर बहस

रेफरी के फैसलों के इतर यह डेटा कोच और फुटबॉल विश्लेषकों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है। अब टीमें मैच के बाद यह देख सकती हैं कि उनके खिलाड़ियों के शॉट की गति क्या थी, गेंद किस एंगल पर घूमी और पासिंग की सटीकता कितनी थी। टीवी पर मैच देखने वाले दर्शकों के लिए भी यह अनुभव बेहतरीन हो गया है। ब्रॉडकास्टर्स अब स्क्रीन पर लाइव ग्राफिक्स के जरिए गेंद की स्पिन रेट और स्पीड को दिखा पा रहे हैं।

हालांकि इस अत्यधिक आधुनिकीकरण को लेकर फुटबॉल जगत में दो विचारधाराएं बन गई हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि गलत फैसलों में कमी आना और खेल का पारदर्शी होना एक अच्छी प्रगति है। वहीं दूसरी तरफ फुटबॉल के पारंपरिक प्रेमियों का तर्क है कि खेल से मानवीय गलतियों और विवादों को पूरी तरह खत्म करने से इसका असली रोमांच कम हो सकता है।

उनका कहना है कि मैराडोना का प्रसिद्ध 'हैंड ऑफ गॉड' गोल जैसी ऐतिहासिक घटनाएं आज के दौर में कभी संभव नहीं हो पातीं। बहरहाल, तकनीक के इस दौर में फीफा विश्व कप 2026 की यह जादुई गेंद फुटबॉल के भविष्य को एक नई दिशा में ले जा रही है।