पीएचडी हासिल कर चर्चा में आए मस्जिद-ए-नबवी के पूर्व इमाम

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 12-06-2026
Former Imam of Masjid-e-Nabawi back in the spotlight after obtaining a PhD.
Former Imam of Masjid-e-Nabawi back in the spotlight after obtaining a PhD.

 

गुलाम कादिर

पवित्र मक्का और मदीना की मस्जिदों के इमामों को लेकर दुनिया भर के लोगों में एक अलग तरह का सम्मान होता है। आम तौर पर लोग सोचते हैं कि इन पवित्र स्थलों के इमाम भी पारंपरिक मदरसों से निकले आम धार्मिक गुरुओं जैसे ही होते हैं। लेकिन सऊदी अरब से आई एक ताजा खबर इस धारणा को पूरी तरह से बदल देती है। मदीना मुनव्वरा में स्थित इस्लाम के दूसरे सबसे मुकद्दर मुकाम यानी मस्जिद ए नबवी के पूर्व इमाम शेख अहमद बिन तालिब हमीद ने एक अभूतपूर्व अकादमिक कामयाबी हासिल की है।

उन्होंने ढलती उम्र की तमाम बंदिशों को दरकिनार करते हुए डिस्टिंगशन के साथ पीएचडी की डिग्री हासिल कर दुनिया को हैरान कर दिया है। अक्सर इस उम्र में लोग पढ़ना लिखना छोड़ देते हैं या आराम की जिंदगी चुनते हैं। लेकिन शेख अहमद बिन तालिब हमीद ने ज्ञान हासिल करने की अपनी ललक से एक नया इतिहास रच दिया है।

शेख अहमद बिन तालिब हमीद को यह डॉक्टरेट की मानद उपाधि सऊदी अरब के बेहद प्रतिष्ठित और प्रमुख पब्लिक रिसर्च संस्थान किंग अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी से मिली है। जेद्दा में स्थित इस यूनिवर्सिटी ने उन्हें फर्स्ट क्लास डिस्टिंक्शन और बेहतरीन सम्मान के साथ इस डिग्री से नवाजा है। इसे शिक्षा जगत में अकादमिक उपलब्धि का सबसे ऊंचा और सर्वश्रेष्ठ स्तर माना जाता है।

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शेख अहमद बिन तालिब हमीद सऊदी अरब के एक बहुत ही सम्मानित विद्वान, इस्लामिक न्यायविद और बेहतरीन कारी यानी कुरान का पाठ करने वाले रहे हैं। उन्होंने कई सालों तक मदीना की पैगंबर की मस्जिद में इमाम और खतीब यानी उपदेशक के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। दुनिया भर के मुसलमान उनकी खूबसूरत आवाज़ में कुरान की तिलावत सुनने और उनकी अगुवाई में नमाज़ पढ़ने के लिए तरसते थे।

शेख अहमद बिन तालिब हमीद का जन्म सन 1981यानी हिजरी कैलेंडर के मुताबिक 1401में रियाद शहर में हुआ था। उनका पूरा नाम शेख अहमद तालिब बिन अब्दुल हमीद बिन मुज़फ्फर खान है। वे बचपन से ही एक बहुत ही खास आध्यात्मिक और शैक्षणिक माहौल में पले-बढ़े हैं।

उनके नाना शेख अब्दुल मजीद बिन हसन जबरती भी मस्जिद ए नबवी के मशहूर इमाम रह चुके थे। उनके नाना महज 16साल की उम्र में अपने मूल देश इरिट्रिया और इथियोपिया के इलाके से हिजरत करके सऊदी अरब आए थे। बचपन में शेख अहमद अपने नाना की मदीना में होने वाली ज्ञान चर्चाओं और विद्वानों की बैठकों में लगातार शामिल होते थे। इसी माहौल ने उनके भीतर ज्ञान की ऐसी लौ जलाई जो आज इस मुकाम तक पहुंची है।

उन्होंने बहुत ही कम उम्र में पवित्र कुरान को पूरी तरह से हिफ्ज कर लिया था यानी वे हाफिज ए कुरान बन गए थे। इसके साथ ही उन्होंने कुरान के सही पाठ के लिए कई बड़े उलेमा से इजाजत और सर्टिफिकेट हासिल किया।

अपनी स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने रियाद की प्रसिद्ध इमाम मोहम्मद इब्न सऊद इस्लामिक यूनिवर्सिटी के शरिया फैकल्टी से ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद उन्होंने हायर इंस्टीट्यूट ऑफ ज्यूडिशियरी से तुलनात्मक न्यायशास्त्र यानी फिकह अल मुकारन में मास्टर डिग्री हासिल की। अपनी औपचारिक पढ़ाई को लगातार जारी रखते हुए उन्होंने किंग अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी से अपनी रिसर्च पूरी की और अब वे आधिकारिक तौर पर डॉक्टर बन चुके हैं।

शेख अहमद बिन तालिब हमीद के जीवन में साल 2013यानी हिजरी सन 1434एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ था। इसी साल रमजान के पवित्र महीने के दौरान उन्हें मस्जिद ए नबवी में तरावीह और तहज्जुद की नमाज़ की कयादत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

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उनकी बेहतरीन काबिलियत को देखते हुए इसी साल उन्हें मस्जिद का नियमित और स्थायी इमाम नियुक्त कर दिया गया। इसके बाद से वे लगातार वहां नमाज़ पढ़ाते रहे और अपने खुतबों के जरिए लोगों को दीन की सही राह दिखाते रहे। नमाज़ पढ़ाने के साथ-साथ वे सऊदी अरब की तमाम अकादमिक और धार्मिक गतिविधियों में भी बहुत सक्रिय रहे। उनका मुख्य काम इस्लामिक कानून और न्यायशास्त्र पर केंद्रित रहा है।

लेकिन साल 2025के मई महीने में मस्जिद ए नबवी के इमामों की लिस्ट से उनका नाम अचानक गायब होने के बाद कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। साल 2025में रमजान के आखिरी दस दिनों के दौरान नमाज़ पढ़ाने वाले इमामों की आधिकारिक सूची में उनका नाम शामिल नहीं था।

सऊदी अरब की हरमैन प्रेसीडेंसी ने इस बदलाव को लेकर कभी कोई सीधा या विस्तृत सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया। सऊदी अरब का यह धार्मिक प्रशासन पारंपरिक रूप से इमामों के आने-जाने या उनके बदलाव को लेकर बहुत ज्यादा गोपनीयता बनाए रखता है और कभी कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं करता है।

इस बात की पूरी तरह से पुष्टि तब हुई जब धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने हज ऑपरेशन्स लॉन्च किए। इस आधिकारिक दस्तावेज में मस्जिद ए नबवी के लिए हमेशा की तरह 11इमामों की जगह सिर्फ 10इमामों की सूची दिखाई गई थी।

इस सूची से शेख अहमद का नाम पूरी तरह गायब था जिसने बिना किसी शोर-शराबे के उनकी विदाई पर पक्की मुहर लगा दी। हालांकि वे अब मस्जिद के आधिकारिक पद पर नहीं हैं लेकिन उनके चाहने वाले और मुरीद आज भी उन्हें बहुत शिद्दत से याद करते हैं। उनके जाने से मदीना आने वाले जायरीन और स्थानीय नमाजी एक खालीपन महसूस करते हैं क्योंकि लोगों का उनके खुतबों से एक गहरा रूहानी रिश्ता बन चुका था।

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शेख अहमद बिन तालिब हमीद की यह नई कामयाबी आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान के लिए सीखने और आगे बढ़ने की कोई उम्र नहीं होती है। दुनिया के सबसे पवित्र और बड़े पदों पर रहने के बावजूद अपनी पढ़ाई को जारी रखना और अकादमिक जगत के सर्वोच्च शिखर को छूना यह साबित करता है कि वे ज्ञान के प्रति कितने समर्पित हैं।

आज जब यह खबर दुनिया के सामने आई है तो सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ लोग उनके इस जज्बे को सलाम कर रहे हैं। इस्लाम में भी ज्ञान हासिल करने को सबसे बड़ा दर्जा दिया गया है और शेख अहमद ने इसे खुद अमल में लाकर पूरी दुनिया के सामने एक शानदार उदाहरण पेश किया है।

किंग अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी से मिली यह पीएचडी डिग्री इस बात का भी सबूत है कि सऊदी अरब के धार्मिक नेतृत्व में सिर्फ पारंपरिक ज्ञान ही नहीं बल्कि आधुनिक रिसर्च और उच्च शिक्षा को भी बहुत ज्यादा तवज्जो दी जाती है।

मक्का और मदीना के इमामों का चयन बेहद सख्त और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होता है जिसमें मजहबी समझ के साथ-साथ इंसान की तालीमी काबिलियत भी देखी जाती है। शेख अहमद बिन तालिब हमीद की यह डॉक्टरेट की उपाधि दुनिया भर के उन तमाम लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो यह मानते हैं कि धार्मिक गुरु आधुनिक शिक्षा और रिसर्च के काम से दूर रहते हैं। उनकी यह कामयाबी हमेशा आने वाली नस्लों को प्रेरित करती रहेगी।