मलिक असगर हाशम/ नई दिल्ली
आज के समय में जब समाज में नफरत और सांप्रदायिकता फैलाकर अपना उल्लू सीधा करने का खेल चरम पर है, तब उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक ऐसी हकीकत सामने आई है जो इंसानियत का सिर गर्व से ऊंचा कर देती है। यह सच्ची कहानी किसी आम इंसान की नहीं बल्कि गंगा रक्षक लाल मोहम्मद बादशाह की है। उन्होंने मां गंगा की निस्वार्थ सेवा के लिए अपनी अच्छी-भली सरकारी नौकरी को लात मार दी। इतना ही नहीं, उन्होंने पैरों में चप्पल पहनना तक छोड़ दिया है।
गंगा नदी का सफाई अभियान कभी प्रभावित न हो, इसके लिए उन्होंने जीवन भर कुंवारे रहने का एक बेहद कठिन और अटूट प्रण भी लिया है।लाल मोहम्मद बादशाह पिछले पैंतीस सालों से कानपुर के पास बसे ऐतिहासिक और धार्मिक शहर बिठूर में मां गंगा की दिन-रात सेवा कर रहे हैं।
इस दौर में जहां लोग धर्म के नाम पर दूरियां बढ़ाते हैं, वहीं लाल मोहम्मद बादशाह ने मजहब की रूढ़िवादी दीवारों को तोड़कर पर्यावरण संरक्षण और आपसी सौहार्द की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है जिसकी गूंज अब सोशल मीडिया से लेकर देश के कोने-कोने तक सुनाई दे रही है।

बिठूर की पावन धरती और लाल मोहम्मद का अटूट संकल्प
धार्मिक और पौराणिक इतिहास के नजरिए से बिठूर का अपना एक बहुत बड़ा और पावन महत्व है। सनातन मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री राम के पुत्र लव और कुश का जन्म इसी पावन धरती पर हुआ था। आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने अमर ग्रंथ रामायण की रचना भी इसी स्थान पर की थी।
आज भी बिठूर में माता सीता की रसोई मौजूद है, जिसे देखने के लिए देश-दुनिया से सैलानियों का आना जाना लगा रहता है। गंगा नदी के बावन घाटों से घिरे इस बेहद पवित्र क्षेत्र में साल भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। इसी पावन भूमि को लाल मोहम्मद बादशाह ने अपनी भक्ति और कर्म का केंद्र बनाया है।
लाल मोहम्मद ने अपनी आपबीती साझा करते हुएआवाज द वाॅयस कोबताया, “पहले वह एक सरकारी खाद बनाने वाली फैक्ट्री में अच्छी-खासी नौकरी किया करते थे। उनका जीवन पूरी तरह से सुरक्षित और आरामदायक था।
लेकिन उनके दिल में मां गंगा के प्रति एक ऐसा गहरा लगाव और श्रद्धा पैदा हुई कि उन्होंने उस सरकारी नौकरी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।“नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन गंगा नदी की स्वच्छता और उसकी रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
गंगा सुरक्षा दल का गठन और बिना चंदे की सेवा
गंगा की सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लाल मोहम्मद बादशाह ने अपने आठ-दस स्थानीय साथियों को साथ लेकर 'गंगा सुरक्षा दल' नाम से एक टीम बनाई है। वे बताते हैं कि हर रविवार को उनके नेतृत्व में गंगा के विभिन्न घाटों पर एक विशेष सफाई अभियान चलाया जाता है। उनके इस निस्वार्थ अभियान का असर इतना व्यापक है कि पड़ोसी जिले उन्नाव से भी बड़ी संख्या में लोग हर रविवार को बिठूर आते हैं और इस सफाई कार्य में स्वेच्छा से भाग लेते हैं।
लाल मोहम्मद और उनकी टीम का काम केवल नदी से प्लास्टिक और कचरा निकालना ही नहीं है। वे बिठूर के सभी बावन घाटों पर मछलियों की सुरक्षा का जिम्मा भी बखूबी निभाते हैं। वे अवैध रूप से मछली पकड़ने वाले शिकारियों पर कड़ी नजर रखते हैं और नदी के जलीय जीवों को बचाते हैं।
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि लाल मोहम्मद बादशाह या उनकी संस्था इसके लिए किसी भी व्यक्ति या सरकारी विभाग से कोई चंदा नहीं लेती है। वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर होकर अपने दम पर इस पुनीत कार्य को अंजाम दे रहे हैं।

पांच वक्त की नमाज, मुस्लिम पहचान और गंगा मैया की जय
पैंतालीस साल के लाल मोहम्मद बादशाह अपनी धार्मिक पहचान को लेकर पूरी तरह से अडिग हैं। वह हमेशा सिर पर पारंपरिक मुस्लिम टोपी पहनते हैं और चेहरे पर लंबी दाढ़ी रखते हैं। वे एक सच्चे और पांच वक्त के पक्के नमाजी मुसलमान हैं। पहले वह पास की एक मस्जिद में ही रहा करते थे, लेकिन अब उन्होंने अपना एक अलग आशियाना बना लिया है। सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद अब उनके जीवन और जीविकोपार्जन का एकमात्र सहारा एक छोटी सी नाव है।
उन्होंने अपनी इस नाव पर पर्यटकों की सुविधा के लिए तकिए और गद्दे लगा रखे हैं। वे बिठूर आने वाले सैलानियों को इस नाव के जरिए गंगा की सैर कराते हैं। इस नौका विहार से उन्हें जो भी थोड़े-बहुत पैसे मिलते हैं, उसी से वे अपना गुजारा करते हैं और अपने इस अभियान का खर्च भी उठाते हैं। लाल मोहम्मद की एक और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब भी वे अपने किसी परिचित या अजनबी से मिलते हैं, तो उनका अभिवादन 'गंगा मैया की जय' बोलकर ही करते हैं।
समाज का शुरुआती विरोध और आज की हकीकत
आमतौर पर गंगा नदी को हिंदू धर्म में बेहद पवित्र और पूजनीय मां का दर्जा दिया गया है, जबकि आम मुस्लिम समाज में इसे सिर्फ एक नदी के रूप में देखा जाता है। जब लाल मोहम्मद ने गंगा की रक्षा का संकल्प लिया, तो उनके अपने ही समाज की प्रतिक्रिया कैसी थी?
आवाज द वाॅयस के इस सवाल पर लाल मोहम्मद बहुत ही शांत और परिपक्व लहजे में कहते हैं,“यह पूरी तरह से व्यक्तिगत श्रद्धा और आंतरिक लगाव की बात है। उनका गंगा से एक आत्मिक और रूहानी जुड़ाव है।“वे खुलकर बताते हैं,“शुरुआत में उनके इलाके के मुस्लिम समुदाय के लोगों की प्रतिक्रिया उनके इस काम को लेकर बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी। लोग उन पर तरह-तरह के तंज कसते थे और सवाल उठाते थे। लेकिन समय के साथ-साथ जब लोगों ने उनकी निस्वार्थ सेवा, ईमानदारी और समर्पण को देखा, तो समाज की सोच पूरी तरह बदल गई। आज बिठूर का बच्चा-बच्चा उन्हें बेहद सम्मान और आदर की नजर से देखता है।“

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस: लोगों ने कहा 'बादशाहों के बादशाह'
पिछले आठ-दस सालों में जब से देश में सोशल मीडिया का जोर बढ़ा है, तब से लाल मोहम्मद बादशाह की कहानी इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही है। लोग उनकी इस अनूठी भक्ति और सेवा भाव की जमकर तारीफ कर रहे हैं। फेसबुक और यूट्यूब पर लोग उनके वीडियो देखकर तरह-तरह की सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
एफ एस परमार नामक एक यूजर ने लिखा है कि जो मां गंगा का सच्चा सेवक है, वह वास्तव में बादशाहों का भी बादशाह है। वहीं मनोज कुमार नामक यूजर का कहना है कि शरीर जल से, मन सत्य से, बुद्धि ज्ञान से और आत्मा धर्म से पवित्र होती है। आशीष शर्मा लिखते हैं कि मां की भक्ति में ही असली शक्ति होती है और इससे इंसान का व्यवहार पूरी तरह सात्विक हो जाता है। राजेंद्र चौहान ने उन्हें दिल और कर्म दोनों से बादशाह बताया है।
बकरे रजत नामक एक यूजर ने दुआ करते हुए लिखा कि अल्लाह आपको लंबी उम्र दे और गंगा मैया आपको हमेशा अपने पास सुरक्षित रखे। पंकज थपलियाल का मानना है कि गंगा कोई धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हर इंसान के जीवन के लिए एक जीवनदायिनी नदी है। सुनीता कुमारी ने लाल मोहम्मद की तुलना इतिहास के महान कवि रसखान और रहीम से की है, जो मुस्लिम होकर भी भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त हुए थे।
बेशक कुछ लोग सोशल मीडिया पर उनकी मुस्लिम टोपी और दाढ़ी को लेकर सवाल भी उठाते हैं, लेकिन लाल मोहम्मद इन नकारात्मक बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। वे बिना किसी भेदभाव के हर इंसान को गले लगाते हैं।
आज के समय में जब समाज में नफरत और सांप्रदायिकता फैलाकर अपना उल्लू सीधा करने का खेल चरम पर है, तब उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक ऐसी हकीकत सामने आई है जो इंसानियत का सिर गर्व से ऊंचा कर देती है। यह सच्ची कहानी किसी आम इंसान की नहीं बल्कि गंगा रक्षक लाल मोहम्मद बादशाह की है। उन्होंने… pic.twitter.com/79QiI6zGgn
— Awaz -The Voice हिन्दी (@AwazTheVoiceHin) June 10, 2026
बिठूर में रहने वाले और बाहर से आने वाले श्रद्धालु लाल मोहम्मद को पलकों पर बिठाते हैं। वे बेहद प्यार से कहते हैं कि जब भी आप बिठूर आएं, तो किसी से भी उनके बारे में पूछ लें, लोग सीधे आपको उन तक पहुंचा देंगे। आजकल बिठूर का प्रसिद्ध रानी लक्ष्मी घाट लाल मोहम्मद बादशाह का स्थायी ठिकाना बन चुका है। वे दिन भर इसी घाट पर रहते हैं और उनसे मिलने आने वाले तमाम लोग भी वहीं पहुंचते हैं।
इसी घाट के किनारे उनकी वह नाव भी बंधी रहती है जो उनके जीवन का मुख्य आधार है। इसी नाव के सहारे वे गंगा की लहरों पर तैरते हुए हर रोज नदी को स्वच्छ रखने का अपना पवित्र संकल्प पूरा करते हैं। लाल मोहम्मद बादशाह का यह जीवन हमें सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण और मानवता की सच्ची सेवा किसी एक जाति या मजहब के दायरे में नहीं बंधी होती, बल्कि यह हर सच्चे इंसान का सबसे पहला और परम कर्तव्य है।