जिस चीज का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ वह है धर्म : जावेद अख्तर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] • 2 Months ago
The thing that has been misused the most is religion: Javed Akhtar
The thing that has been misused the most is religion: Javed Akhtar

 

मंसूरुद्दीन फरीदी  /नई दिल्ली

उर्दू पहला नाम है. हिंदू धर्म था. उर्दू धर्मनिरपेक्ष लोगों का धर्म है. यह एक मिश्रित भाषा है. इसका किसी भी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन उन्हें दाढ़ी और टोपी दी गई है. भाषा क्षेत्रीय है, केवल क्षेत्रीय है. किसी भाषा को दाएं से बाएं लिखें तो उर्दू और बाएं से दाएं लिखें तो हिंदी, दरअसल, भाषा की कोई लिपि नहीं होती. लिपि से कोई भाषा नहीं होती, हिन्दी और उर्दू का व्याकरण एक ही है.

सत्तर से अस्सी प्रतिशत शब्द एक जैसे हैं.ये विचार प्रमुख शायर और बुद्धिजीवी जावेद अख्तर ने जश्न रेख्ता 2023 के दूसरे दिन व्यक्त किये. महफिल खाना मंडप में 10,000 से अधिक दर्शकों ने एक घंटे तक धर्मनिरपेक्षता और उर्दू शायरी पर जावेद अख्तर को सुना. 
 
जावेद अख्तर ने अपने अनोखे अंदाज में धर्मनिरपेक्षता का मतलब समझाया और उर्दू शायरी की पृष्ठभूमि और बारीकियों को समझाया, जिसका हर शब्द एक संदेश दे रहा था और हर वाक्य एक सबक बन रहा था.
जश्न रेख्ता महफिल में सैफ महमूद ने धर्मनिरपेक्षता और उर्दू शायरी के विषय पर जावेद अख्तर से बात की.
 
जावेद अख्तर ने इस बात पर जोर दिया कि भाषा को धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, जबकि भाषा केवल क्षेत्रीय होती है, कौन से देश या समाज सफल होते हैं. उनकी भाषाओं को दुनिया के एक बड़े क्षेत्र द्वारा अपनाया जाता है. अंग्रेजी इसका उदाहरण है. ऐसा एक बार फारसियों के साथ भी हुआ था.
 
जावेद अख्तर ने कहा कि दुनिया में अगर सबसे ज्यादा दुरुपयोग किसी चीज का होता है तो वह धर्म है, लेकिन इंसान उसे नहीं छोड़ता.जावेद अख्तर ने शायरी पर धार्मिक प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि उर्दू शायरी की शुरुआत नास्तिकता से हुई. मुझे आश्चर्य है कि यह उल्टी कैसे हो रही है.
 
धर्मनिरपेक्षता और हम

जब धर्मनिरपेक्षता की बात आई तो जावेद अख्तर ने इसे अपने तरीके से समझाया. उन्होंने कहा कि मैं इसका जवाब देने से पहले एक चुटकुला सुनाता हूं. दरअसल, एक सज्जन ने पूछा, "क्या आप अपनी नौकरी से खुश हैं ?"
 
उन्होंने कहा हां, मैं खुश हूं. दूसरा सवाल यह है कि क्या आप अपने दोस्तों के साथ खुश हैं ? उन्होंने ये जवाब दिया. हाँ मै खुश हूँ. उन्होंने पूछा कि आपने यह घर लिया है, क्या आपको यह पसंद है ? उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें यह बहुत पसंद है.
 
फिर उन्होंने पूछा कि क्या आप अपने बच्चों के साथ खुश हैं. . तो जवाब मिला कि मैं खुश हूं. फिर सवाल था कि क्या आप अपनी पत्नी से खुश हैं? उन्होंने जवाब दिया कि. देखिये ख़ुशी क्या है. यह एक दर्शन है, इसे समझना नहीं चाहिए.
 
यह स्पष्ट है कि जब आप किसी प्रश्न का उत्तर देने में झिझकेंगे तो ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होंगी. धर्मनिरपेक्षता के मामले में भी कुछ ऐसा ही होता है.अब धर्मनिरपेक्षता क्या है यह तो सभी जानते हैं, कोई भी ऐसा नहीं है जो नहीं जानता हो.। यदि आप इस पर विश्वास नहीं करना चाहते तो इसकी समीक्षा करने का कष्ट करें.
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जावेद अख्तर ने उर्दू और धर्मनिरपेक्षता विषय पर एक सवाल के जवाब में कहा. इसलिए जहां तक ​​उर्दू का सवाल है, उर्दू धर्मनिरपेक्ष दिमाग से ही बनाई और विकसित की गई भाषा है. यदि सेक्युलर न होते तो उर्दू का अस्तित्व ही न होता.
 
उर्दू का असली नाम 'हिन्दू' है, इसका अर्थ है भारत की भाषा. उन्होंने कहा कि आप 'रिख्ता' का नाम जो सुनते हैं उसका क्या मतलब होता है ? इसका मतलब है 'हाई ब्रेड'. अर्थात जो एक से अधिक चीजों के मिलने से बनता है. जो भाषा उच्च-संस्कृति वाली हो वह इतनी धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकती है ? इसे इसलिए बनाया गया क्योंकि कुछ लोग धर्मनिरपेक्ष थे. अन्यथा, यह कोई भाषा नहीं है.
 
 अब प्रश्न यह है कि भाषा क्या है?

आइये सबसे पहले इसे समझते हैं. बहुत समय पहले, प्लेटो ने बहुत सी महान बातें कही थीं, बहुत सारी अच्छी बातें कही थीं, अच्छी बातों में से एक यह है कि आप बात करने से पहले शब्दों का अर्थ निर्धारित कर लें, ऐसा नहीं है कि मैं कोई अर्थ समझ रहा हूं, आप कुछ हैं और.
 
क्या भाषा की अपनी लिपि होती है. यदि भाषा की अपनी लिपि है, तो अधिकांश यूरोपीय भाषाएँ लैटिन हैं, क्योंकि लिपियाँ लैटिन हैं. अंग्रेजी लिपि मूल लिपि नहीं है. फ़्रेंच लिपि मूल लिपि नहीं है . जर्मन लिपि मूल लिपि नहीं है. यह लैटिन से आती है. लेकिन भाषा अलग है. अत: यह ज्ञात होता है कि लिपि कोई भाषा नहीं है.
 
मैंने यह कहा , मुझे यह कहने दीजिए. यह एक महान त्योहार है. तो मैंने चार शब्दों का प्रयोग किया है. यह पर्व महान है. उनमें से दो, जो महत्वपूर्ण शब्द हैं, अंग्रेजी में हैं. उत्सव और महान. तो क्या मैं अंग्रेजी बोल रहा हूँ ? नहीं ! क्योंकि 'यहाँ' 'यहाँ' है और 'यहाँ' 'यहाँ' है. इस कारण अंग्रेजी नहीं तो कौन सी भाषा है ?
 
भाषा उसका वाक्य-विन्यास और उसका व्याकरण है. उर्दू का व्याकरण क्या है ? उर्दू का व्याकरण वही है जो हिन्दी का है. उनका व्याकरण एक ही है. और कुछ नहीं तो 75 से 80 फीसदी तक उनके शब्द एक जैसे ही होते हैं.
 
उदाहरण के तौर पर मैं आपको बता दूं, यूपी का एक आदमी है जो पढ़ना-लिखना नहीं जानता. ऐसे बहुत से लोग हैं वह कहते हैं मुझे भूख लग रही है. मैं घर जा रहा हूं. तुम पानी पिओगे. अब आप ही बताएं कि यह क्या कह रहा है. यदि यह लिखना सीख जाए, यदि यह दाएं से बाएं ओर लिखे तो आप कहेंगे कि यह उर्दू है और यदि यह बाएं से दाएं लिखता है तो यह हिंदी है.
 
यह कहना कि यह उनकी भाषा है, वह उनकी भाषा है. ऐसा कहना उचित नहीं है. अब यदि आप यह कहें कि अंग्रेजी ईसाइयों की भाषा है, तो यह कोई बहुत बुद्धिमानी भरा कथन नहीं होगा. अंग्रेजी अंग्रेजों की भाषा है. उसी तरह फ़ारसी.
 
उस समय मध्य एशिया और भारत में इसकी वही स्थिति थी जो आज अंग्रेजी की है. वास्तव में होता यह है कि जब साम्राज्य बड़े होते हैं, जब लोग सफल होते हैं, तो उनकी भाषाएँ भी अच्छी लगने लगती हैं.एक समय था जब ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट पर सभी दुकानों के साइन अरबी में होते थे. आज अमेरिका में लोग चीनी भाषा पढ़ रहे हैं, इसलिए सफल समाज की अपनी भाषाएँ थीं. लेकिन फ़ारसी उनकी राजभाषा थी.
 
उन्होंने आगे कहा कि फारसी मुगलों की मातृभाषा नहीं थी. यहां तक ​​कि उनके पहले जो राजा हुए, उनकी मातृभाषा फ़ारसी नहीं थी. पठानों की भाषा फ़ारसी भी नहीं थी, लेकिन यह सम्मान की बात थी. पेशवा मराठी उनकी राजभाषा फ़ारसी थी. स्पष्ट है कि चूंकि यह लिपि लोकप्रिय थी इसलिए इसका बहुत सम्मान किया जाता था.
 
जावेद अख्तर कहते हैं कि उर्दू पहले नाम था. हिंदू धर्म. बाद में इसके और भी नाम आये जिनमें रेख्ता है. उर्दू एक तुर्की शब्द है जिसका अर्थ सेना या फ़ौज है. अब भाषा फ़ौज या फ़ौज नहीं हो सकती. अब नाम बदला तो यह भाषा उर्दू हो गई अन्यथा मूल नाम हिंदुई था।यह शुद्ध भारतीय भाषा है.
 
हम कितनी भाषाएँ बोल रहे हैं? तो अब जो शब्द हैं वो ज्यादा हैं, कभी कम हो जाते हैं, कभी जो शब्द है वो हटा दिया जाता है. एक नया शब्द आता है. इसके अपने सामाजिक-आर्थिक कारण भी होते हैं कि शब्द क्यों आते हैं.
 
क्यों बाहर जाते हैं. यह भी एक अजीब कहानी है, तो बस यही है. इसका अस्तित्व मिश्रित है. एक बोली बोलने वाले लोग फ़ारसी बोल रहे हैं और फ़ारसी लिपि लिखने वाले लोग एक बोली ले रहे हैं. इसलिए इसकी शुरुआत धर्मनिरपेक्ष है.
 
 धर्मनिरपेक्ष का क्या मतलब है?

आजकल यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण हो गया है. दरअसल सेक्युलर का मतलब है कि हम एक हैं, तो इसमें दुःख किस बात का है ? क्या आपमें इतनी क्षमता और निष्पक्षता है या नहीं कि आप देख सकें कि दूसरों में बंदूक है ?
 
उनकी सभ्यता में, उनकी संस्कृति में, उनकी भाषा में, उनके रीति-रिवाजों में, यही सुंदरता है. जिसका आप आदर करते हैं. जिसे तुम प्यार करते हो या सिर्फ मैं . यह उनके खिलाफ सेक्युलर है. आपकी आंखें सिर्फ अंदर देख सकती हैं, बाहर नहीं. यह धर्मनिरपेक्षता की कमी है तो फिर धर्मनिरपेक्षता को बुरा कहने का क्या मतलब है ?
 
यदि इसका गलत प्रयोग हुआ है तो यह धर्मनिरपेक्षता का दोष नहीं है. यह दुरुपयोग का दोष है. दुनिया में ऐसी कौन सी चीज है जिसका दुरुपयोग नहीं हुआ है ? जिस चीज का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है वह धर्म है. तो भाई, यदि दुरुपयोग के कारण कुछ छोड़ना हो तो धर्म छोड़ दो. अब आप धर्मनिरपेक्षता क्यों छोड़ रहे हैं ?
 
उन्होंने कहा कि उर्दू मेरी मातृभाषा है. मुझे इस पर गर्व है. दुनिया की हर भाषा धार्मिक अनुष्ठानों से शुरू हुई है, इसमें आपको हम्ज़ मिलेगा, आप इसे देवताओं की स्तुति में दे सकते हैं या खुदा की स्तुति में दे सकते हैं. आपको मिलेगा पैगंबर की प्रशंसा में गाने.
 
आपको कविताएं मिलेंगी जो मंदिरों, मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों में गाई गईं थीं. फिर धीरे-धीरे वह दूसरे विषय पर आ गये. उर्दू जो पहले दिन से ही धर्मनिरपेक्ष रही है. उसकी शायरी पहले दिन से ही रूढ़ि-विरोधी और कट्टरवाद-विरोधी रुख के साथ उभरी है.
 
जावेद अख्तर ने कहा कि कुछ जगहों पर यह सही है, यह नास्तिक कविता है जहां से इसकी शुरुआत हुई थी. आज अगर कोई किसी गायन में ऐसी कविता सुना दे तो श्रोता उसे मंच से उतार देंगे, लेकिन उस्ताद कवियों ने लिखी.
 
उन्होंने आगे कहा कि मेरे चाचा भी एक महान कवि थे. मेरे पिता भी एक महान कवि थे. मैं गर्व से कह सकता हूं कि इन दोनों को अपने जीवन में अविश्वास के फतवे मिले. यही उर्दू शायरी की परंपरा है और यही इसका रुख रहा है, लेकिन केवल धर्म से या धार्मिक लोगों से या जाहिद और मुल्ला और शेख से. यह धर्मनिरपेक्ष नहीं है . यह उससे परे है.
 
अब क्या होता है कि आपने कहा कि एक हिंदू कवि ने नात पढ़ी है और मौलवी कवियों ने भगवान कृष्ण और राम पर कविताएं लिखी हैं. हिंदुओं ने अली पर भी लिखा है. रसूल पर भी लिखा है. एकता पर कविताएं हैं. यह कर्बला और हिंदू कवियों पर लिखा गया है. इसी प्रकार मुस्लिम कवियों ने शिवजी, राधा और पार्वतीजी पर भी अपार काव्य लिखा है. जिसकी कोई सीमा नहीं है.
 
उन्होंने कहा कि उर्दू शायरी की वजह से मेरे पास जैन तेवर है चमावली है. नज़ीर अकबर अल्लाह आबादी की शायरी पढ़कर पता चला कि ऐसा भी कोई त्यौहार होता है.नज़ीर अकबराबादी ने गुरु नानक पर एक बहुत अच्छी और उत्कृष्ट कविता लिखी है. वे लंबी कविताएँ हैं. उस समय फुरसत का समय था, लोग सुनते थे, कवि भी जल्दी ख़त्म नहीं कर पाते थे.
 
  जावेद अख्तर ने कहा कि मैं उन सेक्युलर नारों के बारे में बात करूंगा जो परम आंतरिक सेक्युलर नारे हैं, जिसमें हम एक आदमी हैं और हमारे बीच कोई अंतर नहीं है और आपका धर्म अच्छा है और हमारा धर्म भी सही है. ऐसे नारे एक हैं.। नाटक है, बाह्य प्रयास है. धर्मनिरपेक्षता अब उससे आगे निकल चुकी है. 
 
उर्दू में दाढ़ी रख दी गई और टोपी लगा ली गई

जावेद अख्तर ने कहा कि आप इतिहास में देखेंगे, पता लगाएंगे. उस समय जो विद्वान थे, जो उत्कृष्ट थे, उन्होंने बेवफाई का फतवा दिया. 1798 में, शाह अब्दुल कादिर, जो स्वयं एक महान विद्वान थे, ने पवित्र कुरान का उर्दू में अनुवाद किया.
 
आपने इसे उर्दू में अनुवाद करने की हिम्मत कैसे की ? लेकिन अब एक समय था जब असीज़बान दाढ़ी रखता था और सिर पर टोपी रखता था क्योंकि वह कांप रहा था. इसी तरह हिंदी हिंदुओं की भाषा बन गई. लेकिन कौन सा हिंदू ?
 
आप तमिलनाडु में जाकर कहते हैं कि आपकी भाषा हिंदी है, हमें समझना होगा कि भाषा क्षेत्रों की है, हिंदी हमारी भाषा है, वहां के लोगों की भाषा है. उत्तर भारत में हिन्दी बोली जाती है इसलिए यह गलतफहमी दूर कर लें कि भाषा किसी धर्म की होती है, लेकिन भाषा क्षेत्रीय ही होती है.
 
(यह उर्दू से अनुवाद है. इसमें त्रुटियां हो सकती हैं.)