ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
घाटी की खूबसूरत वादियों में जहाँ कभी बंदिशों का शोर गूँजता था, वहाँ आज एक ऐसी आवाज़ गूँज रही है जिसने रूढ़ियों की हर दीवार को अपने सुरों से ढहा दिया। यह कहानी है शाही मुमताज़ की, जिन्हें आज पूरा संगीत जगत और उनके प्रशंसक बेहद सम्मान और प्यार से "कश्मीर की लता मंगेशकर" कहते हैं। अपनी भावपूर्ण, मखमली और सुरीली गायकी के दम पर उन्होंने न केवल कश्मीरी लोक संगीत (Folk) और सूफियाना कलाम को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया, बल्कि उस रूढ़िवादी ढर्रे को भी तोड़ा जो महिलाओं को संगीत की दुनिया से दूर रखता था।
शाही मुमताज़ ने आवाज द वॉयस को बताया कि मुस्लिम समुदाय और विशेष रूप से कश्मीर के पारंपरिक परिवेश में महिलाओं के लिए संगीत को अपनाना कभी आसान नहीं रहा। शाही मुमताज़ के परिवार या पूरे खानदान में दूर-दूर तक संगीत का कोई नामोनिशान नहीं था। न तो कोई सिखाने वाला था और न ही संगीत के अनुकूल कोई माहौल।
लेकिन कुदरत ने उन्हें एक ऐसी अनमोल आवाज़ दी थी, जिसे छुपना मंजूर नहीं था। बचपन में वे संगीत की तकनीकी बारीकियों से अनजान थीं, लेकिन भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर उनके दिल में बसती थीं। मुमताज़ घंटों घर के वॉशरूम में बंद होकर हाथ में स्टील का गिलास थामे उसे माइक समझकर लता जी के गानों को गुनगुनाती रहती थीं। स्कूल के दिनों में जब दोस्तों के साथ अंताक्षरी खेलती थीं, तो उनकी सहेलियाँ हैरान रह जातीं और कहती थीं, "तुम्हारी आवाज़ साधारण नहीं है, तुम्हें तो मुंबई जाना चाहिए।" यहीं से मुमताज़ के भीतर एक सपना अंकुरित हुआ।

जब शाही मुमताज़ ने संगीत को एक पेशेवर करियर के रूप में चुनने का फैसला किया, तो समाज का एक क्रूर चेहरा उनके सामने आ खड़ा हुआ। उस दौर के कश्मीरी समाज में एक महिला का मंच पर आकर गाना कई लोगों को गवारा नहीं था। शाही मुमताज़ ने आवाज द वॉयस को बताया कि "मुझे समाज, रिश्तेदारों और यहाँ तक कि अपने करीबियों के तीखे विरोध और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। स्थिति इतनी बदतर हो गई थी कि कुछ करीबी रिश्तेदारों ने मुझसे बातचीत तक बंद कर दी थी। अपनी कला को जिंदा रखने के लिए मुझे अपनों से ही एक लंबी मानसिक और भावनात्मक लड़ाई लड़नी पड़ी।"
कलाकारों को अक्सर अपने हुनर को "छुप-छुप कर" संवारना पड़ता था, और एक महिला होने के नाते मुमताज़ के लिए यह संघर्ष दोगुना था। लेकिन वे पीछे नहीं हटीं; उन्होंने समाज के तानों को अपनी साधना का हिस्सा बना लिया।
मुमताज़ के जीवन में सबसे खूबसूरत और सकारात्मक मोड़ तब आया जब उनकी शादी कश्मीर के मशहूर संगीतकार और म्यूजिक डायरेक्टर राजा बिलाल से हुई। शादी से पहले मुमताज़ अक्सर मज़ाक में कहती थीं कि उन्होंने संगीत से ही शादी कर ली है और वे कभी किसी इंसान से विवाह नहीं करेंगी। लेकिन किस्मत उन्हें उनके सबसे बड़े संबल के पास ले आई। विवाह के बाद उनका ससुराल ही उनकी "म्यूजिक फैमिली" बन गया। राजा बिलाल ने न केवल एक पति बल्कि एक सच्चे गुरु का फर्ज निभाया। जब भी सामाजिक दबाव से टूटकर मुमताज़ गायन छोड़ने का विचार करतीं, राजा बिलाल उनकी ढाल बन जाते। वे हमेशा कहते, "तुम बेहद पाकीजगी और दिल की सच्चाई से गाती हो, यह खुदा की दी हुई नियामत (वरदान) है, इसे कभी मत छोड़ना।"

शाही मुमताज़ को "कश्मीर की लता मंगेशकर" की यह प्रतिष्ठित उपाधि ऐसे ही नहीं मिली। इसके पीछे एक बेहद भावुक किस्सा है। रेडियो कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारी और दिवंगत दिग्गज संगीतकार मरहूम गुलाम नबी शेख साहब ने जब पहली बार मुमताज़ की गायकी को सुना, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने बेहद भावुक होकर कहा था कि: "कश्मीर में तुम्हें गाते हुए देखकर ऐसा महसूस होता है मानो स्वयं लता मंगेशकर ने कश्मीर की वादियों में दूसरा जन्म ले लिया हो।" इस सम्मान को याद करते हुए आज भी मुमताज़ जब लता जी का कालजयी गीत "तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है, अंधेरों से भी मिल रही रोशनी है..." गाती हैं, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
शाही मुमताज़ कश्मीर की पहली ऐसी व्यावसायिक महिला कलाकार बनीं जिन्होंने बच्चों के लिए पारंपरिक और आधुनिक कश्मीरी लोरियों को रिकॉर्ड किया। प्रसिद्ध कश्मीरी कवि सागर नजीर की लिखी एक लोरी को जब मुमताज़ ने अपनी माँ जैसी ममतामयी आवाज़ दी, तो वह पूरे कश्मीर की धड़कन बन गई। आज भी घाटी में जब कोई दुखद घटना या सड़क दुर्घटना होती है, तो लोग सोशल मीडिया पर पृष्ठभूमि संगीत (Background Score) के रूप में इसी लोरी का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि इसमें एक माँ का गहरा दर्द और तड़प समाहित है।
इसके अलावा, राजा बिलाल के साथ गाया उनका गीत "रावण यशोदन..." और शहीद शबनम की कविताओं पर आधारित उनके गीत सोशल मीडिया पर लगातार ट्रेंड कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अमेरिका के लेखक सैयद अमीर जाफर के उर्दू गज़ल एल्बम "बहरे तरन" और कश्मीर के पहले रिमिक्स एल्बम "सदा" में उनकी आवाज़ ने धूम मचा दी।
एक बेहद निजी इंसान होने के नाते शाही मुमताज़ अपनी जन्मतिथि या शैक्षणिक योग्यताओं जैसी व्यक्तिगत जानकारियों को लाइमलाइट से दूर रखती हैं। उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी कला पर केंद्रित है। आज उनके दोनों बच्चे उनके सबसे बड़े प्रशंसक हैं। उनका बेटा रोज़ रात को अपनी माँ की आवाज़ में लोरी सुनकर सोता है, जिसे मुमताज़ दुनिया के किसी भी बड़े पुरस्कार से बढ़कर मानती हैं। आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बशर जोगियारी, डॉ. अमीन ताबिश और सागर नजीर जैसे दिग्गज शायरों के कलाम मुमताज़ की आवाज़ में रिलीज होने के लिए तैयार हैं। शाही मुमताज़ की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे बुलंद हों और कला के प्रति पाकीजगी हो, तो समाज की रूढ़िवादिता के अंधेरे को सुरों की रोशनी से मिटाया जा सकता है।