What happens to the tazias after Muharram from Delhi to UP-Bihar?
अर्सला खान/नई दिल्ली
मुहर्रम के 10 दिनों में रोज़ा, मजलिस, जुलूस और खास तौर पर शिया मुसलमानों के जरिए मातम किया जाता है। आशूरा यानी 10वें दिन इमाम हुसैन की याद में ताजिए बनाकर जुलूस निकाले जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जुलूस खत्म होने के बाद इन ताजियों का क्या किया जाता है? क्या इन्हें संभालकर रखा जाता है, दफनाया जाता है या फिर किसी नदी में विसर्जित कर दिया जाता है? आइए विस्तार से जानते हैं ताजियों से जुड़ी इस परंपरा के बारे में।
दिल्ली सहित कई जगह ताजियों के साथ क्या किया जाता है?
दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में ताजियों को न तो फेंका जाता है और न ही जलाया जाता है। उन्हें पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ विदाई दी जाती है। यह प्रक्रिया धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मूल भावना एक ही होती है—इमाम हुसैन की याद और सम्मान को कायम रखना।
दिल्ली में मुहर्रम के बाद ताजियों को दफनाने की परंपरा काफी पुरानी है। राजधानी के ऐतिहासिक करबला स्थलों और दरगाहों में आशूरा के दिन ताजियों को ले जाकर दफन किया जाता है। जोर बाग स्थित शाह-ए-मर्दान दरगाह और उससे जुड़े करबला परिसर इस परंपरा के प्रमुख केंद्रों में गिने जाते हैं। यहां बड़ी संख्या में लोग अपने ताजियों को लेकर पहुंचते हैं और धार्मिक रस्मों के बाद उन्हें मिट्टी में सुपुर्द कर दिया जाता है। इसे प्रतीकात्मक रूप से करबला की याद से जोड़कर देखा जाता है।
दिल्ली के करबला का मंजर
दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 स्थित करबला में भी हर वर्ष बड़ी संख्या में ताजियों को दफनाया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां यह व्यवस्था अशरा-ए-मजलिस-ए-अज़ा के तहत की जाती है। इस पूरे आयोजन की निगरानी मौलाना मोहसिन तकवी करते हैं। मुहर्रम के दौरान यहां विशेष इंतजाम किए जाते हैं ताकि विभिन्न इलाकों से आने वाले लोग सम्मानपूर्वक अपने ताजियों को दफन कर सकें। ताजियों को दफनाने से पहले मजलिस और दुआ का आयोजन भी किया जाता है।
हालांकि ताजियों के सम्मानजनक अंतिम प्रबंधन का तरीका केवल दफनाने तक सीमित नहीं है। दिल्ली और देश के कुछ अन्य हिस्सों में कुछ छोटे ताजियों या अस्थायी ढांचों को नदियों और जलाशयों में विसर्जित भी किया जाता है। यमुना नदी में ताजियों का विसर्जन लंबे समय से चली आ रही एक परंपरा रही है। यह प्रक्रिया कुछ हद तक गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन जैसी दिखाई देती है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व और उद्देश्य अलग होता है। विसर्जन के दौरान भी पूरी सावधानी और सम्मान का ध्यान रखा जाता है।
कुछ परिवारों और ताजिया कमेटियों की परंपरा इससे अलग है। वे अपने विशेष ताजियों को नष्ट नहीं करते बल्कि सुरक्षित रख लेते हैं। बांस और लकड़ी से बने मजबूत ढांचों को संभालकर रखा जाता है और अगले वर्ष फिर से उन्हें सजाकर जुलूस में शामिल किया जाता है। ऐसे ताजिए अक्सर किसी परिवार या मोहल्ले की वर्षों पुरानी विरासत का हिस्सा बन जाते हैं। कई जगहों पर एक ही ताजिया पीढ़ियों तक इस्तेमाल किया जाता है, जिसे हर साल नई सजावट के साथ तैयार किया जाता है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में क्या किया जाता है
दिल्ली की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार में भी ताजियों को लेकर गहरी आस्था जुड़ी हुई है। इन राज्यों के कई शहरों और कस्बों में स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके यहां ताजियों को दफनाने की परंपरा अधिक प्रचलित है। गांवों और छोटे कस्बों में अक्सर किसी निर्धारित स्थान को करबला के रूप में विकसित किया गया होता है, जहां मुहर्रम के बाद ताजियों को दफनाया जाता है। यह स्थान स्थानीय समुदाय के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।
वहीं कुछ क्षेत्रों में पुरानी परंपराओं के अनुसार ताजियों को कुओं या बहते पानी में डालने का भी रिवाज रहा है। बुजुर्गों के अनुसार यह प्रथा कई दशकों से चली आ रही है। हालांकि समय के साथ पर्यावरण संबंधी जागरूकता बढ़ने के कारण कई जगहों पर इन तरीकों में बदलाव भी आया है और अब दफनाने या सुरक्षित रखने की परंपरा को प्राथमिकता दी जा रही है।
ताजियों का महत्व
दिलचस्प बात यह है कि ताजियों को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं होने के बावजूद सभी जगह एक बात समान है सम्मान। ताजिया केवल एक ढांचा नहीं माना जाता, बल्कि वह करबला की याद, इमाम हुसैन की कुर्बानी और इंसाफ के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक होता है। यही वजह है कि मुहर्रम समाप्त होने के बाद भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाता है जैसा किसी पवित्र धार्मिक प्रतीक के साथ किया जाता है।
भारत की गंगा-जमुनी तहजीब में मुहर्रम और ताजियों की परंपरा एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। कई स्थानों पर विभिन्न धर्मों के लोग भी ताजिया जुलूसों में भाग लेते हैं और उनके सम्मान में सहयोग करते हैं। यही कारण है कि ताजियों का दफनाना, विसर्जन या संरक्षण केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक बन गया है।
आज जब मुहर्रम के जुलूस समाप्त होते हैं और ताजियों को अंतिम विदाई दी जाती है, तब यह केवल एक रस्म नहीं होती। यह करबला की उस अमर कहानी को याद करने का अवसर भी होता है, जिसने सत्य, न्याय और इंसानियत के लिए कुर्बानी की मिसाल कायम की। दिल्ली से लेकर यूपी और बिहार तक, ताजियों को सम्मानपूर्वक दफनाने या सुरक्षित रखने की परंपरा इसी संदेश को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रही है।
'जग-ए-अहद' की झलक
दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 स्थित करबला की अपनी एक अलग पहचान है। यहां मुहर्रम के दौरान ताजियों को दफनाने की परंपरा के साथ-साथ "जग-ए-अहद" (या जगह-ए-अहद) की प्रतीकात्मक झलक भी तैयार की जाती है।
यह झलक करबला की ऐतिहासिक घटनाओं और इमाम हुसैन व उनके साथियों की कुर्बानी की याद को जीवंत करने का प्रयास होती है। मुहर्रम के दिनों में बड़ी संख्या में अकीदतमंद यहां पहुंचते हैं, मजलिस में शामिल होते हैं और करबला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आशूरा के दिन ताजियों को पूरे सम्मान के साथ यहां लाया जाता है और धार्मिक रस्मों के बाद उन्हें दफन किया जाता है।
यह पैराग्राफ आपकी स्टोरी में मयूर विहार फेज-1 करबला वाले हिस्से के बाद जोड़ा जा सकता है, जिससे रिपोर्ट और अधिक समृद्ध व स्थानीय संदर्भों से जुड़ी हुई लगेगी।