
रूही ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वैश्विक नेताओं को पत्र लिखकर पेड़ों के संरक्षण के लिए पासपोर्ट पेपर रीसाइक्लिंग की वकालत की है। उन्होंने वायनाड में भूस्खलन रोकने के लिए भी वृक्षारोपण किया। उनका मानना है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र में अपने भावुक संबोधन के दौरान रूही ने कहा कि वह केवल अपनी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहीं, बल्कि धरती माता की आवाज बनकर खड़ी हैं। उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता, अब्दुल गनी और डॉ. अनीसा मुहम्मद ने बचपन से ही उन्हें सिखाया है कि पृथ्वी हमारा पहला घर है। वे उनकी पढ़ाई के लिए पुनर्चक्रित कागज से बनी किताबों का उपयोग करते हैं, ताकि पेड़ों को बचाया जा सके।
रूही ने अपने भाषण में कहा, “पृथ्वी ने हमें सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी और जीने के लिए सुंदर दुनिया दी है। क्या हम उसके लिए थोड़े दयालु नहीं बन सकते?” उन्होंने बताया कि एक छात्र अपनी पढ़ाई पूरी होने तक लगभग 30 पेड़ों के बराबर कागज उपयोग कर चुका होता है। यदि हम पुनर्चक्रित कागज का उपयोग करें, तो हम इस नुकसान को कम कर सकते हैं।

उन्होंने नन्ही हमिंगबर्ड की कहानी सुनाते हुए कहा कि भले ही हम छोटे हों, लेकिन अपनी पूरी कोशिश करना ही सच्ची जिम्मेदारी है। उनका संदेश साफ था—जब प्रकृति को कष्ट होता है, तो मानवता भी सुरक्षित नहीं रह सकती।
रूही मोहज्जाब जैसी नन्ही बच्चियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि बदलाव की कोई उम्र नहीं होती। आज के बच्चे ही कल के नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, प्रशासक और विश्व नेता बनेंगे। यदि वे बचपन से ही पर्यावरण के महत्व को समझेंगे, तो भविष्य की नीतियाँ भी प्रकृति के अनुकूल बनेंगी।
युवाओं को चाहिए कि वे:
पेड़ लगाएँ और उनकी देखभाल करें
कागज, पानी और बिजली की बचत करें
प्लास्टिक के उपयोग को कम करें
अपने परिवार और स्कूल में पर्यावरण संरक्षण की चर्चा शुरू करें

हर बड़ा परिवर्तन एक छोटे कदम से शुरू होता है। अगर छह साल की रूही दुनिया के नेताओं को प्रेरित कर सकती हैं, तो हम और आप भी अपने स्तर पर बहुत कुछ कर सकते हैं। आइए, हम सब अपने भीतर की “हमिंगबर्ड” को जगाएँ और पृथ्वी की रक्षा का संकल्प लें—क्योंकि यही बच्चे कल की नीतियाँ बनाएँगे और वही तय करेंगे कि हमारी धरती कितनी सुरक्षित और हरी-भरी रहेगी।
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