रूही मोहज्जाब को 2026 संयुक्त राष्ट्र एसडीजी सम्मान

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 18-02-2026
Ruhi Mohazzab awarded 2026 UN SDG Award
Ruhi Mohazzab awarded 2026 UN SDG Award

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

क्या बदलाव के लिए हमेशा उम्र, पद और शक्ति की जरूरत होती है — या सिर्फ एक जागरूक दिल और सच्चा इरादा ही काफी है? दुनिया जब जलवायु संकट, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों से जूझ रही है, तब एक अप्रत्याशित आवाज अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजती है। यह आवाज अनुभव के वर्षों से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और साहस से मजबूत बनी है। यह कहानी केवल एक उपलब्धि की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो हमें आईना दिखाती है — कि हम अपनी धरती के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। यह उस नई पीढ़ी की झलक है जो केवल भविष्य की वारिस नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदार भागीदार भी है। जब एक नन्हा मन दुनिया को पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद दिलाता है, तो सवाल हम सबके सामने खड़ा होता है — क्या हम सच में सुन रहे हैं?
 
 
केरल की छह वर्षीय छात्रा रूही मोहज्जाब आज केवल एक बच्ची नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक सशक्त आवाज बन चुकी हैं। हाल ही में उन्हें बैंकॉक स्थित संयुक्त राष्ट्र एशिया-प्रशांत मुख्यालय में 2026 का प्रतिष्ठित एसडीजी इम्पैक्ट अवॉर्ड प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें भूटान की शिक्षा मंत्री महामहिम यीज़ांग दे थापा द्वारा दिया गया। इतनी कम उम्र में वैश्विक मंच पर खड़े होकर जलवायु परिवर्तन पर अपनी बात रखना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है।
 
रूही कालीकट की कॉमन ग्राउंड इंटरनेशनल एकेडमी की छात्रा हैं। उनकी पहल ‘रूहीज़ ट्री बैंक नर्सरी’ का उद्देश्य तीन वर्षों में भारत के 10,000 स्कूलों में एक करोड़ पेड़ लगाना है। नवंबर 2025 में केरल के राज्यपाल विश्वनाथ अर्लेकर ने इस परियोजना का उद्घाटन और अभिनंदन किया था। यह पहल केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों और युवाओं में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना जगाने का प्रयास है।

रूही ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वैश्विक नेताओं को पत्र लिखकर पेड़ों के संरक्षण के लिए पासपोर्ट पेपर रीसाइक्लिंग की वकालत की है। उन्होंने वायनाड में भूस्खलन रोकने के लिए भी वृक्षारोपण किया। उनका मानना है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र में अपने भावुक संबोधन के दौरान रूही ने कहा कि वह केवल अपनी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहीं, बल्कि धरती माता की आवाज बनकर खड़ी हैं। उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता, अब्दुल गनी और डॉ. अनीसा मुहम्मद ने बचपन से ही उन्हें सिखाया है कि पृथ्वी हमारा पहला घर है। वे उनकी पढ़ाई के लिए पुनर्चक्रित कागज से बनी किताबों का उपयोग करते हैं, ताकि पेड़ों को बचाया जा सके।

रूही ने अपने भाषण में कहा, “पृथ्वी ने हमें सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी और जीने के लिए सुंदर दुनिया दी है। क्या हम उसके लिए थोड़े दयालु नहीं बन सकते?” उन्होंने बताया कि एक छात्र अपनी पढ़ाई पूरी होने तक लगभग 30 पेड़ों के बराबर कागज उपयोग कर चुका होता है। यदि हम पुनर्चक्रित कागज का उपयोग करें, तो हम इस नुकसान को कम कर सकते हैं।

उन्होंने नन्ही हमिंगबर्ड की कहानी सुनाते हुए कहा कि भले ही हम छोटे हों, लेकिन अपनी पूरी कोशिश करना ही सच्ची जिम्मेदारी है। उनका संदेश साफ था—जब प्रकृति को कष्ट होता है, तो मानवता भी सुरक्षित नहीं रह सकती।

युवाओं के लिए प्रेरणादायक संदेश

रूही मोहज्जाब जैसी नन्ही बच्चियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि बदलाव की कोई उम्र नहीं होती। आज के बच्चे ही कल के नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, प्रशासक और विश्व नेता बनेंगे। यदि वे बचपन से ही पर्यावरण के महत्व को समझेंगे, तो भविष्य की नीतियाँ भी प्रकृति के अनुकूल बनेंगी।

युवाओं को चाहिए कि वे:

  • पेड़ लगाएँ और उनकी देखभाल करें

  • कागज, पानी और बिजली की बचत करें

  • प्लास्टिक के उपयोग को कम करें

  • अपने परिवार और स्कूल में पर्यावरण संरक्षण की चर्चा शुरू करें

हर बड़ा परिवर्तन एक छोटे कदम से शुरू होता है। अगर छह साल की रूही दुनिया के नेताओं को प्रेरित कर सकती हैं, तो हम और आप भी अपने स्तर पर बहुत कुछ कर सकते हैं। आइए, हम सब अपने भीतर की “हमिंगबर्ड” को जगाएँ और पृथ्वी की रक्षा का संकल्प लें—क्योंकि यही बच्चे कल की नीतियाँ बनाएँगे और वही तय करेंगे कि हमारी धरती कितनी सुरक्षित और हरी-भरी रहेगी।

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