Women are creating their own identity through social media: Dr. Amna Mirza
मंसूरूद्दीन फरीदी
परिवर्तन संसार का शाश्वत नियम है। समय की धारा के साथ समाज, संस्कृति और तकनीक के स्वरूप बदलते रहते हैं। आज के दौर में मीडिया और समाज के अंतर्संबंधों में जो सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव आया है, उसका नाम है 'सोशल मीडिया'। कभी सूचनाओं का एकमात्र स्रोत अखबार हुआ करते थे, लेकिन आज मोबाइल ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने सूचना के प्रवाह को 'रियल-टाइम' बना दिया है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय की सुप्रसिद्धप्रोफेसर डॉ. आमना मिर्ज़ा ने पॉडकास्ट "दीन और दुनिया" में विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने न केवल सोशल मीडिया के समाज पर प्रभाव को रेखांकित किया, बल्कि डिजिटल युग में महिलाओं की बदलती भूमिका और चुनौतियों पर भी बेबाक राय साझा की।
बदलाव की शुरुआत: खुद से समाज तक
डॉ. आमना मिर्ज़ा का मानना है कि बदलाव एक प्राकृतिक और अनिवार्य प्रक्रिया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सूचना क्रांति ने हमारे जीवन जीने के ढंग को पूरी तरह बदल दिया है। पहले खबरें हम तक पहुँचने में घंटों लेती थीं, मगर अब हम हर पल पूरी दुनिया से जुड़े हुए हैं। इस संदर्भ में उन्होंने पवित्र कुरान की सूरह अर-रअद की आयत 11 का एक बेहद प्रासंगिक हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अल्लाह किसी भी कौम या देश के हालात तब तक नहीं बदलता, जब तक कि लोग स्वयं अपने हालात बदलने की कोशिश नहीं करते।
यह आध्यात्मिक सीख आज के डिजिटल युग पर भी उतनी ही सटीक बैठती है। डॉ. मिर्ज़ा के अनुसार, यदि हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन देखना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी। टेक्नोलॉजी केवल एक उपकरण है; उसकी दिशा को समझना और उसका मानवता के हित में सही उपयोग करना हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी है।
सोशल मीडिया: एक दोधारी तलवार और महिलाओं का उत्थान
सोशल मीडिया की प्रकृति को समझाते हुए डॉ. मिर्ज़ा ने इसे 'दोधारी तलवार' करार दिया। उनके अनुसार, यह मंच जितना विनाशकारी हो सकता है, उतना ही रचनात्मक भी। विशेष रूप से महिलाओं के लिए, डिजिटल दुनिया ने संभावनाओं के बंद दरवाजे खोल दिए हैं। आज महिलाएं घर की चारदीवारी के भीतर रहते हुए भी शिक्षा, व्यवसाय, फैशन, और कला जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बना रही हैं।
डिजिटल युग ने 'स्वावलंबन' की नई परिभाषा गढ़ी है। अब एक महिला को अपना हुनर दिखाने के लिए भारी निवेश या बड़े दफ्तरों की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया ने उन्हें कम लागत में अपना खुद का प्लेटफॉर्म बनाने और अपनी आवाज़ को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने की शक्ति दी है। डॉ. मिर्ज़ा इसे महिलाओं के लिए एक 'नई शुरुआत' मानती हैं, जो उन्हें न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र बना रही है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास का संचार भी कर रही है।
जेंडर रेजिस्टेंस और धार्मिक कट्टरता की चुनौती
हालांकि, यह रास्ता इतना आसान भी नहीं है। डॉ. आमना मिर्ज़ा ने सोशल मीडिया पर व्याप्त 'जेंडर रेजिस्टेंस' (लिंग आधारित विरोध) के कड़वे सच को भी उजागर किया। उन्होंने चिंता जताई कि आज भी महिलाओं, विशेषकर मुस्लिम लड़कियों को, उनके पहनावे, तस्वीरों या सामाजिक मेलजोल के आधार पर धर्म के नाम पर निशाना बनाया जाता है। उन्हें अक्सर यह कहकर जज किया जाता है कि वे क्या पोस्ट कर रही हैं या किसके साथ दिख रही हैं।
इस रूढ़िवादिता पर कड़ा प्रहार करते हुए डॉ. मिर्ज़ा ने कहा कि धर्म के नाम पर दूसरों की नैतिकता का फैसला करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपनी गरिमा के साथ अपनी जिंदगी जी रहा है, वह गलत नहीं हो सकता। वास्तव में गलत वे लोग हैं जो धर्म की संकीर्ण व्याख्या करते हैं और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं।
ट्रोलिंग का मानसिक प्रभाव और 'मजबूत मन' की आवश्यकता
आज के दौर में 'ट्रोलिंग' एक बड़ी मानसिक समस्या बनकर उभरी है। डॉ. मिर्ज़ा ने बताया कि महिलाओं पर ट्रोलिंग का मनोवैज्ञानिक असर बहुत गहरा होता है। भद्दे कमेंट्स और बिना वजह की आलोचना कई बार महिलाओं को इस कदर हतोत्साहित कर देती है कि वे सोशल मीडिया से दूरी बना लेती हैं।
इस समस्या का समाधान उन्होंने 'मानसिक सुदृढ़ता' में बताया। उन्होंने महिलाओं को सलाह दी कि वे अपने इरादे नेक रखें और पूरी ईमानदारी के साथ अपने काम पर ध्यान केंद्रित करें। नकारात्मकता से पीछे हटने के बजाय, उसे नजरअंदाज करना और सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना ही सफलता की कुंजी है।
पुरुष प्रधान सोच और जिम्मेदारी का संतुलन
एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा करते हुए डॉ. मिर्ज़ा ने समाज के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाए। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि सोशल मीडिया की वजह से महिलाएं अपनी घरेलू जिम्मेदारियों की अनदेखी कर रही हैं। डॉ. मिर्ज़ा ने इसे शुद्ध रूप से एक 'पुरुष प्रधान सोच' करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब एक पुरुष घंटों स्क्रीन पर समय बिताता है, तो उसे उसकी व्यस्तता या मनोरंजन मान लिया जाता है, लेकिन वही काम जब एक महिला करती है, तो उसे 'लापरवाह' घोषित कर दिया जाता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि हकीकत इसके उलट है। टेक्नोलॉजी ने दरअसल महिलाओं को 'मल्टी-टास्किंग' में मदद की है। आज डिजिटल टूल्स की मदद से महिलाएं समय प्रबंधन सीख रही हैं और घर के साथ-साथ अपने करियर को भी बखूबी संभाल रही हैं। यह उनके लिए आत्मनिर्भर बनने का एक सुनहरा अवसर है, न कि जिम्मेदारियों से भागने का रास्ता।
इतिहास से वर्तमान तक: ज्ञान ही असली शक्ति
इतिहास के झरोखे से बात करते हुए डॉ. मिर्ज़ा ने याद दिलाया कि पहली औद्योगिक क्रांति के दौरान महिलाओं को मुख्यधारा से काफी हद तक पीछे रखा गया था। लेकिन वर्तमान 'डिजिटल क्रांति' में तस्वीर बदल चुकी है। आज ज्ञान ही सबसे बड़ी मुद्रा है, और इंटरनेट ने इस ज्ञान तक सबकी समान पहुँच सुनिश्चित की है। महिलाएं अब अपनी पढ़ाई, स्टार्टअप और अन्य गतिविधियों के माध्यम से दुनिया भर में अपनी धाक जमा रही हैं।
दीन और दुनिया: संतुलन की कला
पॉडकास्ट के अंत में डॉ. आमना मिर्ज़ा ने 'दीन' (धर्म) और 'दुनिया' के बीच संतुलन पर एक बहुत ही गहरा दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यह संतुलन कोई रेडीमेड चीज़ नहीं है जो हमें मिल जाएगी, बल्कि इसे हमें खुद अपनी प्राथमिकताओं से बनाना पड़ता है।
उन्होंने इबादत की परिभाषा को विस्तार देते हुए कहा कि इबादत केवल नमाज या रोज़े तक सीमित नहीं है। यदि आपकी नीयत साफ है, तो दूसरों की मदद करना, सोशल मीडिया पर सकारात्मक जानकारी साझा करना और ईमानदारी से अपना काम करना भी इबादत का ही एक हिस्सा है। यदि इंसान का इरादा नेक हो, तो वह अपनी आधुनिक जीवनशैली और अपनी धार्मिक पहचान के बीच एक सुंदर सामंजस्य स्थापित कर सकता है।
सकारात्मकता का संदेश
डॉ. आमना मिर्ज़ा के इस पॉडकास्ट का सार यही है कि सोशल मीडिया दिखावे या समय नष्ट करने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक विकास का एक सशक्त माध्यम होना चाहिए। 2010 से सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के बावजूद, डॉ. मिर्ज़ा ने कभी किसी अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं किया, जिसका श्रेय वे अपनी सकारात्मक सोच और स्पष्ट उद्देश्य को देती हैं।
उनका संदेश स्पष्ट है: "अपनी नीयत साफ रखें, आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान बनाएं, और धर्म व आधुनिकता के बीच अपनी सकारात्मक भूमिका निभाएं।" यही वह संतुलन है जो न केवल व्यक्तिगत जीवन को सफल बनाएगा, बल्कि एक प्रगतिशील समाज की नींव भी रखेगा।