भक्ति चालक
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस के दिग्गज नेता अजित पवार का बुधवार की सुबह बारामती में हुए विमान हादसे में बेहद दुखद निधन हो गया। उनके अचानक चले जाने से महाराष्ट्र की सियासत में ऐसा खालीपन पैदा हो गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। एक आक्रामक नेता, साफ बोलने वाले और सख्त प्रशासक के तौर पर उनकी पहचान थी। लेकिन, इससे आगे बढ़कर अजित पवार की पहचान एक 'सेक्युलर लीडर' की भी थी। मुस्लिम समाज के साथ उनका रिश्ता बेहद करीबी और भरोसे का था।

अल्पसंख्यकों के लिए लड़ने वाला नेता
अजित पवार ने अपने पूरे सियासी सफर में मुस्लिम समाज का हमेशा मजबूती से साथ दिया। वे अक्कलियती समाज के विकास और उनके हक़ के लिए हमेशा डटे रहे। सत्ता में रहते हुए उन्होंने मुस्लिम समाज के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं। वक्फ जमीनों की सुरक्षा हो या उर्दू स्कूलों का विकास, अजित पवार ने उसके लिए दिल खोलकर फंड मुहैया कराया। मौलाना आज़ाद आर्थिक विकास महामंडल को ताकत देने का काम उन्होंने प्राथमिकता से किया। मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर भी उन्होंने हमेशा सकारात्मक और मज़बूत भूमिका अपनाई थी। यही वजह थी कि मुस्लिम समाज में उनके प्रति अटूट भरोसा और इज़्ज़त थी।
May God forgive the lost soul#AjitPawar #AjitPawarPlaneCrash #AjitPawarDeath pic.twitter.com/S85ud9nwgD
— Abel David Opeyemi (@AbelDav1914) January 28, 2026
मुस्लिमों के खिलाफ बोलने वाले विधायक को लगाई थी फटकार
राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक संग्राम जगताप जब मुस्लिम समाज के खिलाफ विवादित बयान दे रहे थे, तब उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने अपने ही विधायक को अच्छी-खासी खरी-खोटी सुनाई थी।उस वक्त उन्होंने कहा था कि, "संग्राम जगताप ने बेहद गलत बयान दिया है। एक बार पार्टी की नीतियां तय हो जाने के बाद, अगर कोई सांसद, विधायक या जिम्मेदार व्यक्ति पार्टी की विचारधारा के खिलाफ इस तरह के बयान देता है, तो यह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को बिल्कुल मंजूर नहीं है।"
हर साल की तरह रमजान के महीने में उन्होंने एक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। उस वक्त बोलते हुए उन्होंने साफ लफ्ज़ों में चेतावनी दी थी। "आपका यह भाई अजित पवार आपके साथ है। अगर किसी ने भी मुस्लिम भाइयों को डराने या दो गुटों में झगड़ा लगाने की कोशिश की, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। सामने वाला शख्स चाहे कोई भी हो, उसे छोड़ा नहीं जाएगा," यह उन्होंने ठोक बजाकर कहा था।
जब 'इंडिया' गठबंधन हिचकिचाया, तब दादा ने दी उम्मीदवारी
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत हुई और मोदी सरकार बनी। उसके बाद भारतीय राजनीति में मुस्लिम समाज से बनाई गई दूरी साफ दिखाई देने लगी। कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना लगभग बंद कर दिया था। साल 2025 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 'इंडिया' गठबंधन भी मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने में हिचकिचा रहा था। ऐसे वक्त में अजित पवार ने अपनी पार्टी की तरफ से दो मुस्लिम उम्मीदवारों को नामजद किया।
ऐसे माहौल में अजित पवार ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने खुले तौर पर ऐलान किया कि उनकी पार्टी 10 फीसदी टिकट मुस्लिम समाज को देगी। मुंबई महानगर पालिका चुनाव में भी उन्होंने मुस्लिम समाज को नुमाइंदगी देने का वादा पूरा किया और कई मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा।
आरक्षण के लिए बीजेपी से भी लिया पंगा
देश के कई राज्यों में मुस्लिम आरक्षण को लेकर सियासी चर्चाएं गर्म थीं। बीजेपी शासित और गैर-बीजेपी सरकारों पर दबाव डाला जा रहा था। ऐसे तनाव के माहौल में भी अजित पवार मुस्लिम समाज के आरक्षण के लिए बीजेपी से भिड़ गए। उन्होंने खुलकर मुस्लिम समाज का पक्ष रखा। उन्होंने मांग की कि महाराष्ट्र में मुस्लिम समाज को 5 फीसदी आरक्षण मिलना ही चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह राय जाहिर की कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े मुसलमानों को उनका हक़ मिलना चाहिए।
अजित पवार की सेक्युलर भूमिका
अजित पवार ने कई बार अपनी सेक्युलर और सबको साथ लेकर चलने वाली भूमिका साफ की है। इससे पहले मत्स्य पालन मंत्री नितेश राणे ने दावा किया था कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में मुसलमानों की भागीदारी नहीं थी। इस पर अजित पवार ने नितेश राणे को फटकार लगाई थी। साथ ही उस वक्त उन्होंने सत्ताधारी और विपक्षी दलों के नेताओं को संयम बरतने की सलाह दी थी।
अजित पवार ने कहा था कि, "सत्ताधारी हों या विपक्ष, राजनेताओं को ऐसे किसी भी बयान से बचना चाहिए जिससे कानून और व्यवस्था का सवाल खड़ा हो। इतिहासकारों ने सबूतों के साथ यह साबित किया है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में और उनके साथ मुस्लिम मावळे (सैनिक) जरूर थे। नितेश राणे ने ऐसा बयान क्यों दिया, यह मुझे नहीं पता। लेकिन एक बात तय है कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं।"

सियासी सफर
अजित पवार का सियासी सफर बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण रहा। सहकार महर्षि और चाचा शरद पवार के मार्गदर्शन में उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा। 1982 में एक चीनी मिल के डायरेक्टर पद से उनके सफर की शुरुआत हुई। उसके बाद वे पुणे जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। 1991 में वे बारामती से लोकसभा के लिए चुने गए। लेकिन शरद पवार के लिए उन्होंने सांसदी से इस्तीफा दे दिया और राज्य की राजनीति में सक्रिय हो गए।
बारामती विधानसभा सीट से उन्होंने लगातार कई चुनाव रिकॉर्ड मतों से जीते। राज्य के जल संसाधन मंत्री, वित्त मंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में उनके किए गए काम आज भी लोगों को याद हैं। प्रशासन पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। सुबह जल्दी काम शुरू करना और फाइलों का तुरंत निपटारा करना उनकी कार्यशैली थी। 2023 में उन्होंने पार्टी में बगावत कर सत्ता में जाने का फैसला किया, फिर भी उनकी काम करने की शैली और लोगों में घुलने-मिलने की आदत कायम थी। आज उनके जाने से महाराष्ट्र ने एक धाकड़ और सबको साथ लेकर चलने वाला नेता खो दिया है।