रामपुर के गरारे: शैला खान की पहल से जीवित हुई नवाबी विरासत और कारीगरों की नई उम्मीद

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 19-04-2026
Rampur’s Ghararas: A Nawabi Legacy Revived Through Shaila Khan’s Initiative and New Hope for Artisans
Rampur’s Ghararas: A Nawabi Legacy Revived Through Shaila Khan’s Initiative and New Hope for Artisans

 

ओनिका माहेश्वरी / नई दिल्ली  

रामपुर, जो कभी उत्तर प्रदेश की एक शाही रियासत हुआ करता था, आज भले ही एक सामान्य जिला बन चुका हो, लेकिन उसकी नवाबी तहज़ीब, खान-पान और परिधानों की शान आज भी अपनी अलग पहचान रखती है। इसी विरासत को जीवित रखने की एक अनोखी कोशिश कर रही हैं फैशन डिजाइनर, एडवोकेट और सोशल एक्टिविस्ट शैला खान, जिन्होंने “रामपुर के गरारे” नाम से अपने ब्रांड के जरिए न केवल एक पारंपरिक परिधान को पुनर्जीवित किया है, बल्कि सैकड़ों कारीगरों के जीवन में नई उम्मीद भी जगाई है।

शैला खान बताती हैं कि “गरारा” सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि एक पूरी तहज़ीब और विरासत का प्रतीक है। यह परिधान कभी रामपुर की नवाबज़ादियों द्वारा पहना जाता था, जो उन्हें रॉयल और खूबसूरत बनाता था। इसी शाही पहचान को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने ब्रांड का नाम “रामपुर के गरारे” रखा। उनके अनुसार, यह परिधान एक दौर में लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका था, क्योंकि इसके कारीगर धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे थे।

इस सफर की शुरुआत एक सामाजिक अनुभव से हुई। जब शैला खान चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न इलाकों में गईं, तो उन्होंने देखा कि गरारा बनाने वाले कारीगर बेहद गरीबी में जीवन जी रहे हैं और अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं खिला पा रहे। इस स्थिति ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्होंने ठान लिया कि वे इन कारीगरों के लिए कुछ करेंगी, भले ही उनके पास उस समय कोई बिज़नेस प्लान नहीं था।

परिवार और समाज से विरोध के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक राजनीतिक परिवार से होने के कारण उन्हें इस काम को शुरू करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लोगों को लगा कि यह कदम उनकी सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन उनकी नीयत और दृढ़ता के आगे धीरे-धीरे सबने उनका साथ देना शुरू किया। उन्होंने इंस्टाग्राम के जरिए अपने काम की शुरुआत की, जहां से उन्हें ऑर्डर मिलने लगे और उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया।

गरारे की बनावट और उसकी कला के बारे में बताते हुए शैला खान कहती हैं कि यह परंपरा 18वीं सदी में नवाब फैजुल्ला खान के समय से जुड़ी है, जब विभिन्न कारीगरों को रामपुर लाया गया था। समय के साथ यह कला लगभग समाप्त हो गई थी और एक समय ऐसा भी आया जब केवल एक ही कारीगर बचा था। शैला खान ने प्रशासन को इस स्थिति से अवगत कराया, जिसके बाद इस कला को बचाने के लिए कदम उठाए गए। यहां तक कि जेल के कैदियों को भी यह कला सिखाई गई ताकि वे रिहा होने के बाद अपना जीवनयापन कर सकें।

उन्होंने इस कला को “वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट” योजना में शामिल करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अब इसे जीआई टैग दिलाने की कोशिशें जारी हैं। पहले गरारे सोने-चांदी के तारों से बनाए जाते थे, जो आम लोगों की पहुंच से बाहर थे, लेकिन आज इन्हें स्टील और अन्य धातुओं से बनाकर सस्ती कीमतों में उपलब्ध कराया जा रहा है। उनके ब्रांड में 15 से 20 हजार रुपये तक में दुल्हन का जोड़ा तैयार किया जाता है, जिससे यह आम लोगों के लिए भी सुलभ हो गया है।

आज उनके ग्राहक केवल भारत ही नहीं, बल्कि कनाडा, अमेरिका, दुबई, लंदन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी हैं। खास बात यह है कि उनके ग्राहक हर धर्म और समुदाय से आते हैं। वे कहती हैं कि कपड़ों का कोई धर्म नहीं होता और उनके गरारे हिंदू, मुस्लिम, सिख सभी समुदायों में लोकप्रिय हैं, खासकर सिख समुदाय में यह परिधान शादी-ब्याह में खूब पसंद किया जा रहा है।

शैला खान के ग्राहक सूची में कई नामी हस्तियां भी शामिल हैं, जिनमें फिल्म अभिनेत्री रुखसार रहमान, जरीन खान और राजनेता उद्धव ठाकरे जैसे लोग शामिल हैं। सोशल मीडिया ने उनके काम को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जहां लाखों लोग उनके डिज़ाइनों को देखते और सराहते हैं।

गरारा और शरारा के अंतर पर बात करते हुए वे बताती हैं कि 2018 से पहले जहां लहंगे का चलन ज्यादा था, वहीं उनके प्रयासों के बाद गरारे का जबरदस्त कमबैक हुआ है। आज यह हर तरह के समारोहों—चाहे शादी हो, माता की चौकी या निकाह में पहना जा रहा है।

उनकी प्रदर्शनियां देश के कई शहरों जैसे कश्मीर, अजमेर और चंडीगढ़ में लगती हैं, जहां उन्हें लोगों से भरपूर प्यार और समर्थन मिलता है। वे अपने उत्पादों की कीमतें बेहद वाजिब रखती हैं, हालांकि उनके डिज़ाइनों की नकल भी बाजार में होने लगी है। इस पर वे कहती हैं कि कोई भी उनके डिज़ाइन की कॉपी कर सकता है, लेकिन उनके पीछे की सोच कारीगरों को रोजगार देना और उनके जीवन को बेहतर बनाना को कोई कॉपी नहीं कर सकता।

शैला खान अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को देती हैं, जिन्होंने बचपन से ही उन्हें गरारा बनाना सिखाया और हर काम खुद सीखने की प्रेरणा दी। उनके परिवार, पति और बच्चों ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया। उनके बच्चे आज उनके सोशल मीडिया को संभालते हैं और उनके काम को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं।

भविष्य की योजनाओं के बारे में वे कहती हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दी है। चाहे कारीगरों को रोजगार दिलाना हो या समाज में महिलाओं को सशक्त बनाना, वे हर क्षेत्र में सक्रिय रहना चाहती हैं। एक एडवोकेट के रूप में वे खास तौर पर महिला सशक्तिकरण से जुड़े केस लेती हैं और चाहती हैं कि देश की हर लड़की आत्मनिर्भर बने और अपने सपनों को पूरा करे।

ALSO WATCH:

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

A post shared by Shaila Khan (@rampur_ke_ghararey)

अपने व्यक्तित्व के बारे में वे कहती हैं कि वे खुद को किसी एक पहचान में नहीं बांधतीं। उनके अनुसार, एक महिला के भीतर कई रूप होते हैं. मां, पेशेवर, सामाजिक कार्यकर्ता और वे हर भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाने में विश्वास रखती हैं। रामपुर की इस बेटी की कहानी न केवल एक परिधान की पुनर्स्थापना की है, बल्कि यह संघर्ष, संवेदना और समाज सेवा की एक प्रेरणादायक मिसाल भी है, जिसने एक लुप्त होती कला को फिर से दुनिया के सामने गर्व से खड़ा कर दिया है।