कोलकाता से लंदन : उर्दू अदब और समाज सेवा की अनूठी मिसाल, शायर फ़हीम अख़्तर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 24-10-2026
From Kolkata to London: Poet Fahim Akhtar—a unique example of Urdu literature and social service.
From Kolkata to London: Poet Fahim Akhtar—a unique example of Urdu literature and social service.

 

जावेद अख़्तर/ कोलकाता

कोलकाता की बहुसांस्कृतिक गलियों में जन्मा एक शायर आज लंदन की साहित्यिक दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुका है। उनकी कलम में बंगाल की मिट्टी की खुशबू भी है और ब्रिटेन की जिंदगी के अनुभव भी। वह शख्स हैं फ़हीम अख़्तर, जो शायरी, अफसाना, कॉलम लेखन और सामाजिक सेवा के जरिए उर्दू अदब की दुनिया में सक्रिय हैं।

फ़हीम अख़्तर की पहचान केवल एक शायर के रूप में नहीं। उनके लेखन में इंसानी रिश्तों की जटिलता, प्रवासी जीवन की चुनौतियां, वतन की याद और समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों की जिंदगी दिखाई देती है। कोलकाता से लंदन तक फैला उनका सफर बताता है कि साहित्य किसी एक शहर या देश तक सीमित नहीं रहता। इंसानी अनुभव उसे दुनिया के अलग अलग हिस्सों तक पहुंचाते हैं।

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कोलकाता में जन्म, लंदन में बनी पहचान

फ़हीम अख़्तर का जन्म 11 जनवरी 1966 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता सूफी जमील अख़्तर थे। कोलकाता की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक जिंदगी ने बचपन से ही उनकी सोच और अनुभवों को प्रभावित किया। बाद में ब्रिटेन में रहने का अनुभव उनके लिए एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया को समझने का अवसर बना।

उन्होंने 1988 में मौलाना आजाद कॉलेज, कोलकाता से बीए ऑनर्स किया। इसके बाद 1991 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की। वर्ष 1993 में वह ब्रिटेन चले गए और वहां सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र से जुड़ गए।

उनकी जिंदगी का यह पहलू खास महत्व रखता है। उन्होंने समाज को केवल किताबों और विचारों के जरिए नहीं समझा, बल्कि उन लोगों के बीच रहकर भी जाना, जिनकी समस्याओं पर अक्सर सार्वजनिक चर्चा कम होती है।

वर्ष 2005 में लंदन बरो ऑफ मर्टन ने उन्हें सोशल वर्क की पेशेवर ट्रेनिंग के लिए प्रायोजित किया। इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन में पंजीकृत सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम किया।

समाज के अनुभवों ने लेखन को दी नई दिशा

फ़हीम अख़्तर ने सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में कई तरह के लोगों के साथ काम किया। इनमें बेघर लोग, बुजुर्ग, युवा, गोद लेने और फोस्टर केयर से जुड़े बच्चे तथा परिवार, मस्तिष्क की चोट से प्रभावित लोग और डिमेंशिया से पीड़ित मरीज शामिल थे।

इन अनुभवों ने उन्हें जिंदगी को करीब से देखने का अवसर दिया। समाज के अलग अलग वर्गों के बीच काम करने से इंसानी व्यवहार, रिश्तों, अकेलेपन और उम्मीद को समझने की उनकी क्षमता विकसित हुई।

उनके साहित्य में जीवन किसी काल्पनिक दुनिया की तरह सामने नहीं आता। उसमें रोजमर्रा की परेशानियां, रिश्तों की तल्खियां, भावनाओं की उलझनें और बेहतर भविष्य की उम्मीद शामिल हैं। यही वजह है कि उनके लेखन को केवल प्रेम और रूमान की शायरी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।

उनकी रचनाओं में प्रवासी जीवन के अनुभव भी हैं और अपने शहर तथा लोगों से जुड़े रहने की भावना भी। लंदन में रहते हुए भी कोलकाता उनकी यादों और साहित्यिक संवेदना का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

‘एक गुरेज़ाँ लम्हा’ से मिली साहित्यिक पहचान

फ़हीम अख़्तर के साहित्यिक सफर में उनका पहला प्रकाशित अफसाना संग्रह ‘एक गुरेज़ाँ लम्हा’ महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह किताब वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई थी। पुस्तक अभिलेखों के अनुसार, इसे मुंबई के किताबदार ने प्रकाशित किया। इसमें 161 पृष्ठ हैं।इसी वर्ष भारतीय उच्चायोग के नेहरू कल्चर सेंटर में इसका लोकार्पण भी हुआ।

यह संग्रह उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनके अफसानों में जिंदगी के छोटे छोटे घटनाक्रम, रिश्तों के बीच पैदा होने वाली दूरियां और इंसान के भीतर चलने वाली भावनात्मक हलचल दिखाई देती है।

फ़हीम अख़्तर के लिए अफसाना केवल कल्पना की उड़ान नहीं है। वह अपने आसपास की जिंदगी को समझने और उसके उन पहलुओं को सामने लाने का जरिया है, जिन पर आमतौर पर लोगों की नजर नहीं जाती।

‘लंदन की डायरी’ में प्रवासी जिंदगी की झलक

वर्ष 2018 में अस्मा पब्लिकेशंस, कोलकाता से प्रकाशित ‘लंदन की डायरी’ उनके साहित्यिक सफर की एक और महत्वपूर्ण किताब है। 356 पृष्ठों की इस पुस्तक में पत्रकारिता, डायरी, लेख और व्यक्तिचित्रों से जुड़ी सामग्री शामिल है।

इस किताब में लंदन केवल एक शहर नहीं, बल्कि प्रवासी जीवन को समझने की खिड़की बनकर सामने आता है। इसके माध्यम से पाठक विदेश में रहने वाले लोगों की भावनाओं, उनकी सामाजिक परिस्थितियों और अपने वतन से दूर होने के अनुभवों को समझ सकता है।

विदेश में रहने से इंसान का पता बदल सकता है, लेकिन उसकी यादें इतनी आसानी से नहीं बदलतीं। अपने लोग, अपनी भाषा और अपने शहर की गलियां उसके भीतर बनी रहती हैं।

फ़हीम अख़्तर की शायरी में भी इसी भावनात्मक खिंचाव के अलग अलग रंग दिखाई देते हैं। उनके अशआर में रिश्तों का बोझ, भरोसे की कमी, जिंदगी की तलाश और टूटने के बाद फिर संभलने की कोशिश जैसे विषय सामने आते हैं।

उनकी शायरी की खासियत यह है कि वह बड़ी बात कहने के लिए हमेशा कठिन शब्दों का सहारा नहीं लेते। साधारण अनुभवों के माध्यम से भी गहरी भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश करते हैं।

‘गर्द ए सफर’ में शहरों से ज्यादा इंसानों की कहानी

फ़हीम अख़्तर की साहित्यिक यात्रा किताबों तक सीमित नहीं रही। उनकी ई पुस्तकों में ‘एक गुरेज़ाँ लम्हा’, ‘लंदन की डायरी’ और ‘गर्द ए सफर’ जैसे शीर्षक शामिल हैं।वर्ष 2021 में प्रकाशित ‘गर्द ए सफर’ में 166 पृष्ठ हैं। इसे उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक यात्रा वृत्तांतों के संग्रह के रूप में पेश किया गया है।

उनके लिए सफर केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का नाम नहीं है। यात्रा नए लोगों से मिलने, अलग अलग संस्कृतियों को समझने और जीवन के नए अनुभव हासिल करने का अवसर भी है।

इसी दृष्टि से उनके यात्रा लेखन में रास्तों और मंजिलों के साथ इंसान भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों और सड़कों से नहीं बनती। वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी, उनके विचार और उनकी संस्कृति भी उस शहर को समझने का आधार बनते हैं।

उनकी अन्य पुस्तकों और ई पुस्तकों में ‘खामोश लम्हें’, ‘ये इश्क नहीं आसान या रब’, ‘ख्वाब पलकों पे’, ‘ब्रित्तोरिखा’, ‘लफ्जों का सफर’ और ‘देवदासी’ जैसे शीर्षक भी शामिल हैं। उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक उनकी 15 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

लंदन में रहकर कोलकाता से कायम रखा रिश्ता

फ़हीम अख़्तर ने वर्ष 2013 से ‘लंदन की डायरी’ के नाम से नियमित कॉलम लिखना शुरू किया। उनके लेख कोलकाता के अखबार ए मशरिक, पाकिस्तान के दैनिक दुनिया और नॉर्वे के कारवां सहित अलग अलग प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं।

उनकी कॉलम लेखन की यात्रा यह भी दिखाती है कि प्रवास किसी लेखक को अपने मूल समाज से अलग करने के बजाय उसके साथ रिश्ता बनाए रखने का माध्यम बन सकता है। लंदन में रहते हुए वह कोलकाता के पाठकों तक अपनी बात पहुंचाते रहे। उनके लेखन में भारत, ब्रिटेन और व्यापक दक्षिण एशियाई समाज के अनुभवों को जगह मिली। इस तरह उनकी कलम अलग अलग देशों में रहने वाले पाठकों के बीच साहित्यिक संवाद का माध्यम बनी।

उनके लेखन की भाषा सहज है। विषय गंभीर होने के बावजूद वह पाठक से दूरी नहीं बनाती। कोलकाता की यादें, लंदन की रोजमर्रा जिंदगी और प्रवासी समाज के अनुभव उनके साहित्य में अलग अलग रंगों में दिखाई देते हैं।

साहित्य से आगे सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान

फ़हीम अख़्तर की गतिविधियां केवल लेखन तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2007 में कोलकाता में सूफी जमील अख़्तर लिटरेरी सोसाइटी की स्थापना की गई। संस्था का उद्देश्य उर्दू भाषा और साहित्य को बढ़ावा देना, शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना तथा जरूरतमंद लोगों की मदद करना है।

वर्ष 2014 से फ़हीम अख़्तर इस संस्था के संरक्षक हैं। संस्था की गतिविधियों में मुशायरे, साहित्यिक सेमिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, रचनात्मक लेखन कार्यशालाएं, प्रकाशन संबंधी सहयोग, छात्रवृत्तियां और जरूरतमंद साहित्यकारों की सहायता शामिल हैं। वर्ष 2026 में संस्था की वेबसाइट पर साप्ताहिक मुफ्त भोजन वितरण जैसी सामाजिक गतिविधियों का भी उल्लेख मिलता है।

संस्था की प्रमुख पहलों में सूफी जमील अख़्तर मेमोरियल अवॉर्ड भी शामिल है। यह पुरस्कार उर्दू भाषा और साहित्य में उल्लेखनीय योगदान देने वाली हस्तियों को दिया जाता है। इसके रिकॉर्ड में शम्सुर्रहमान फारूकी, मुज्तबा हुसैन, मलिकजादा मंजूर अहमद, अहमद सईद मलिहाबादी, अनीस रफी और अजीज बर्नी सहित कई साहित्यिक हस्तियों के नाम दर्ज हैं।

इस पहल का महत्व केवल पुरस्कार देने तक सीमित नहीं है। यह उर्दू साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का प्रयास भी है। फ़हीम अख़्तर को वर्ष 2011 में लंदन बरो ऑफ मर्टन की ओर से सामुदायिक योगदान के लिए सिविक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2012 में उन्हें महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के डायमंड जुबली समारोह में आमंत्रित किया गया और वहां उनका परिचय कराया गया।

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कोलकाता से लंदन तक, साहित्य और इंसानियत का सफर

फ़हीम अख़्तर की जिंदगी को केवल एक प्रवासी शायर की कहानी कहना उनके व्यक्तित्व के व्यापक पहलुओं को नजरअंदाज करना होगा। उनकी यात्रा शिक्षा से सामाजिक सेवा तक, सामाजिक अनुभवों से साहित्य तक और निजी यादों से व्यापक मानवीय सरोकारों तक फैली हुई है।

कोलकाता ने उन्हें बहुसांस्कृतिक समाज को समझने का शुरुआती अनुभव दिया। लंदन ने उस अनुभव को एक नए परिवेश में परखने का अवसर दिया। दोनों शहरों के बीच की दूरी को उन्होंने अपने लेखन, अनुभव और सामाजिक गतिविधियों के जरिए जोड़ने की कोशिश की।

उनकी किताबें, कॉलम और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी गतिविधियां एक ऐसी शख्सियत की तस्वीर पेश करती हैं, जिसके लिए कलम और समाज अलग अलग नहीं हैं। उनके लिए साहित्य केवल अपनी भावनाएं व्यक्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि इंसान और उसकी जिंदगी को समझने का रास्ता भी है।

यही फ़हीम अख़्तर के सफर की खास पहचान है। शहर बदलते हैं, परिवेश बदलता है और जीवन के अनुभव भी नए रूप लेते हैं। लेकिन भाषा, यादों और रिश्तों से जुड़ा लेखक का रिश्ता बना रहता है। कोलकाता से लंदन तक फैला उनका साहित्यिक सफर इसी निरंतरता की कहानी कहता है।