कंधार में चार घंटे हिरासत, फिर तालिबानियों ने भारतीय यात्री को दिया तोहफा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 24-10-2026
Four hours in custody in Kandahar, then the Taliban gave an Indian passenger a gift
Four hours in custody in Kandahar, then the Taliban gave an Indian passenger a gift

 

भक्ति चालक

अफ़ग़ानिस्तान का नाम सुनते ही सबसे पहले ज़ेहन में क्या आता है? हाथों में बड़ी-बड़ी बंदूकें लिए तालिबानी लड़ाके, जगह-जगह होते बम धमाके और खौफ के साये में जीते लोग। न्यूज़ चैनल हों या पश्चिमी मीडिया, कई सालों से दुनिया के सामने अफ़ग़ानिस्तान की यही तस्वीर पेश की जा रही है। लेकिन क्या अफ़ग़ानिस्तान की यह तस्वीर पूरी तरह सच है? वहां की असल 'ग्राउंड रियलिटी' आखिर क्या है? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए नासिक के एक 39 साला निडर ट्रैवेलर ने सीधे अफ़ग़ानिस्तान का रुख किया और वहां 22 दिन गुज़ारे।

नासिक के रहने वाले विशाल चव्हाण पेशे से एक आईटी कंसल्टेंट हैं। पिछले 18 सालों से अपना बिज़नेस संभालते हुए उन्होंने दुनिया के 16 देशों की सैर की है। घूमने-फिरने का यह शौक उन्हें अपने घर से ही विरासत में मिला है।

उनके माता-पिता को भी घूमने का बहुत शौक था। बचपन से ही उन्होंने पूरे भारत की सैर शुरू कर दी थी। पूरा देश घूमने के बाद उन्होंने इंटरनेशनल ट्रैवल शुरू किया। हाल ही में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान का एक बेहद दिलचस्प सफर किया है। 'आवाज़-द वॉयस' को दिए गए एक खास इंटरव्यू में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में बिताए 22 दिनों की असल हक़ीक़त का हैरान करने वाला तज़ुर्बा साझा किया।

gg

अफ़ग़ानिस्तान का अचानक बना प्लान

साल 2017 में सिंगापुर, थाईलैंड और मलेशिया के सफर के साथ विशाल का पहला विदेशी टूर हुआ था। उसके बाद आए कोविड के दौर में दो-तीन साल सभी लोग घरों में ही कैद रहे। कोविड के बाद 2021 में उन्होंने वियतनाम का पहला सोलो ट्रिप किया और तब से वह लगातार विदेश यात्राएं कर रहे हैं। अब तक वह 16 देश देख चुके हैं। उनका यह शौक अब धीरे-धीरे यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिए 'ट्रैवल व्लॉगिंग' और 'कंटेंट क्रिएशन' के रूप में लोगों के सामने आ रहा है।

साल 2025 में विशाल ईरान गए थे। उस वक्त ईरान ने भारतीयों के लिए 14 दिनों का सफर वीज़ा-फ्री कर दिया था। मुंबई से फ्लाइट लेकर विशाल ईरान के बॉर्डर टाउन 'मशहद' में लैंड हुए। वहां घूमने के बाद जब वह होटल के कमरे में अपने लैपटॉप पर रिसर्च कर रहे थे, तब उन्हें एहसास हुआ कि वह जिस शहर में हैं, उसकी सरहद सीधे अफ़ग़ानिस्तान से लगती है।

दरअसल, विशाल की आगे की ट्रिप पहले से ही पूरी तरह प्लान थी। वह ईरान से अज़रबैजान, आर्मेनिया और जॉर्जिया होते हुए भारत लौटने वाले थे। उनके एयर टिकट, वीज़ा और पूरी आइटनरी फाइनल थी। लेकिन सरहद पर खड़े होकर उनके दिमाग में खयाल आया कि जब यहां तक आ ही गए हैं, तो एक बार अफ़ग़ानिस्तान होकर आने में क्या हर्ज है।

विशाल ने मशहद में मौजूद अफ़ग़ानिस्तान काउंसलेट का रुख किया। उन्होंने वहां के अधिकारियों से अफ़ग़ानिस्तान जाने के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि वह एक ट्रैवेलर हैं और वहां की ज़मीनी हक़ीक़त दुनिया को दिखाना चाहते हैं।

लेकिन वहां पिछले साढ़े चार सालों से तालिबान की हुकूमत होने और विशाल के अकेले होने की वजह से अधिकारियों ने शुरू में मना कर दिया। हालांकि, विशाल अपनी बात पर अड़े रहे। और उनके इसी भरोसे की वजह से आखिरकार उन्हें इजाज़त मिल ही गई।

अगर आप भारत से सीधे अफ़ग़ानिस्तान में एंट्री करते हैं तो भारतीय पासपोर्ट के लिए वीज़ा फ्री होता है, लेकिन ईरान की तरफ से मैनेजमेंट अलग था। तालिबान हुकूमत में कई अलग-अलग गुट हैं, यह वहां जाने पर ही पता चलता है।

आखिरकार वहां 11 हज़ार रुपये देकर विशाल ने महज़ दो घंटे में अपने पासपोर्ट पर स्टीकर वीज़ा हासिल कर लिया। वीज़ा हाथ में आते ही उन्होंने अज़रबैजान और जॉर्जिया के आगे के सभी प्लान और टिकट कैंसिल कर दिए और घर पर फोन करके अफ़ग़ानिस्तान जाने की जानकारी दे दी।

विशाल के घरवालों को यह सुनकर गहरा धक्का लगा। उन्होंने पत्नी को पहले ही बता दिया था, लेकिन वीज़ा मिलने तक कुछ भी तय नहीं था। अब उनके हाथ में सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान का वीज़ा था, वापसी का कोई टिकट नहीं था। ईरान में 10-15 दिन रहकर तेहरान और मशहद कवर करने के बाद उन्होंने ज़मीनी रास्ते से एक टैक्सी पकड़ी और अफ़ग़ानिस्तान के एक अहम शहर 'हेरात' की तरफ निकल पड़े।

ff

अफ़ग़ान के नाज़िम भाई

ईरान बॉर्डर से अफ़ग़ानिस्तान जाने वाली टैक्सी में विशाल बैठ गए। उनके साथ एक महिला और एक पुरुष यात्री भी थे। सफर के दौरान बगल में बैठे शख्स से बातचीत शुरू होने पर विशाल को लगा कि वह किस्मत वाले हैं क्योंकि उनके बगल वाले शख्स को बहुत अच्छी हिंदी आती थी।

गाड़ी के उस वाकये के बारे में विशाल बताते हैं, “मेरे साथ सफर कर रहे नाज़िम भाई भी हेरात जा रहे थे। चूंकि मैं बहुत अच्छी हिंदी-उर्दू बोल रहा था, इसलिए उन्हें लगा कि मैं पाकिस्तानी हूं। लेकिन जब मैंने उन्हें बताया कि मैं भारत से आया हूं, तो उन्हें बहुत खुशी हुई। उसके बाद हमारी बातचीत और भी दिलचस्प हो गई। वह अफ़ग़ानिस्तान के ही थे और कारोबार के सिलसिले में ईरान आए हुए थे।”

नाज़िम भाई के साथ अच्छी दोस्ती हो गई और विशाल के दिल का डर भी थोड़ा कम हो गया। बॉर्डर पर पहुंचने पर वहां का इमिग्रेशन काउंटर हमारे यहां के टोल नाके जैसा ही सादा था। लेकिन अंदर बैठे दो तालिबानी लड़ाके अपनी रिवायती पोशाक पहने और कंधों पर बड़ी-बड़ी AK-47 बंदूकें लटकाए बैठे थे। उन्हें सिर्फ पश्तो और फ़ारसी ज़बान ही आती थी।

इमिग्रेशन काउंटर के उस ना भूलने वाले वाकये को बताते हुए विशाल ने कहा, “वे दोनों तालिबानी बंदूकें लेकर बैठे थे, एकदम खूंखार दिख रहे थे। उनके हाव-भाव से मुझे समझ में आया कि उन्होंने अपनी ज़बान में मुझसे पूछा कि कहां के हो? तो मैंने कहा, 'अल हिंद'। क्योंकि मिडिल ईस्ट या इस्लामिक देशों में भारत को 'हिंद' के नाम से ही जाना जाता है।”

वह आगे बताते हैं, “हिंद सुनते ही अचानक उनके चेहरों पर मुस्कान आ गई। वे बोले, 'हिंद? शाहरुख खान, सलमान खान, अमिताभ बच्चन!' और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। दो मिनट तक मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पूछा, कहां जाओगे, कितने दिन रुकोगे, कुछ भी नहीं। सीधा एंट्री स्टैम्प लगाया और बोले- खुदा हाफिज़!”

ff

कंधार में खौफनाक चार घंटे

बॉर्डर क्लियर होने के बाद नाज़िम भाई ने विशाल को होटल जाने ही नहीं दिया और उन्हें अपने घर आने की ज़िद की। एक अनजान देश में डर लगने के बावजूद विशाल ने एक निडर फैसला लिया। वह नाज़िम भाई के चार मंज़िला आलीशान घर गए। घर के नीचे तीन-चार गाड़ियां खड़ी थीं। यानी नाज़िम भाई उस इलाके के कोई रसूखदार इंसान लग रहे थे।

पिछले कई दशकों से चल रही जंग की वजह से वहां के आम लोगों तक बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतें भी नहीं पहुंची हैं, लेकिन अमीर लोगों के पास जनरेटर और बाकी सभी सहूलियतें थीं। वहां विशाल को एक अलग कमरा दिया गया, कड़ाके की ठंड होने की वजह से हीटर और बेहतरीन खाने-पीने का इंतज़ाम किया गया। नाज़िम भाई ने अपनी खुद की गाड़ी से उन्हें तीन दिनों तक पूरा हेरात शहर घुमाया।

दरअसल, अफ़ग़ानिस्तान में घूमने के लिए किसी भी विदेशी टूरिस्ट को वहां की हुकूमत से एक खास परमिट लेना पड़ता है। इसमें आपको यह पूरी जानकारी देनी होती है कि आप कितने दिन, किस शहर में और किसके पास रुकेंगे। पहले तीन दिनों तक विशाल के पास कोई परमिट नहीं था। हेरात के बाद नाज़िम भाई से विदा लेकर विशाल रात की बस से कंधार के लिए निकल पड़े।

ff

तालिबानियों से मिला अनपेक्षित तोहफ़ा

कंधार को तालिबान का मुख्य गढ़ माना जाता है। वहां पहुंचते ही विशाल को एक बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ा। कंधार के बस स्टैंड पर हुए उस खौफनाक वाकये के बारे में बताते हुए विशाल ने कहा, “कंधार पहुंचने पर सुबह-सुबह ही मुझे तालिबानियों ने रोक लिया। उन्हें लगा कि मैं कोई पाकिस्तानी जासूस हूं और वहां रेकी करने आया हूं।”

वह आगे कहते हैं, “मेरे चेहरे के नैन-नक्श, जींस-टीशर्ट और जैकेट का पहनावा वहां एकदम अलग लग रहा था, इसलिए उन्हें लगा कि मैं पाकिस्तानी हूं। वहां कौन फौजी है और कौन आम नागरिक, यह पहचानना ही मुश्किल होता है क्योंकि सब सिविल ड्रेस में होते हैं। उन्होंने मुझे चार घंटे तक कंधार के बस स्टैंड पर डिटेन कर रखा था।”

उन चार घंटों में विशाल के लैपटॉप, कैमरा, माइक, बैग की एक-एक चीज़, आधार कार्ड, पैन कार्ड और यहां तक कि भारत में भरे गए आईटीआर की रसीद की फोटो खींचकर बड़े अधिकारियों को भेजी गई। चार घंटे की कड़ी पूछताछ के बाद यह साफ हो गया कि वह एक भारतीय टूरिस्ट हैं।

रिहाई के बाद तालिबानियों ने विशाल को एक तोहफ़ा दिया, जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी। इस बारे में वह बताते हैं, “पूछताछ के चार घंटे बाद वो लड़ाके वापस आए और उन्होंने मुझे रिहा कर दिया। लेकिन शायद उनके मन में कुछ पछतावाथा।

हमारे नासिक में गोदावरी के किनारे बैठने वाले अंगूठी बेचने वालों जैसा एक आदमी वहां घूम रहा था। उन तालिबानियों ने उसे बुलाकर मुझे वहीं से एक अंगूठी और इत्र की शीशी गिफ्ट की। मेरे लिए यह वाकई एक कल्चरल शॉक था।”

हिंदुस्तान से प्यार और पाकिस्तान से नफरत

विशाल ज़ोर देकर कहते हैं कि पश्चिमी मीडिया में जो अफ़ग़ानिस्तान दिखाया जाता है और जो वहां की असल हक़ीक़त है, उसमें ज़मीन-आसमान का फर्क है। वह कहते हैं, “अफ़ग़ान लोग और तालिबानी लड़ाके हिंदुस्तानियों को दिल से मानते हैं।

पाकिस्तान को लेकर उनके मन में बहुत नफरत है। इसलिए मैं जहां भी जाता, पहले ही बता देता कि मैं हिंदुस्तान से आया हूं। कई जगहों पर दुकानदारों और होटल वालों ने मुझसे पैसे तक नहीं लिए। वे यही कहते कि आप हमारे मेहमान हैं।”

तालिबानी राज में महिलाओं की आज़ादी और तालीम को लेकर कुछ सख्त नियम हैं। किसी भी महिला की फोटो या वीडियो नहीं बनाना, उन्हीं नियमों में से एक है। विशाल ने इस नियम का पूरा पालन किया, लेकिन व्लॉगिंग करते वक्त कैमरे में कैद हुए फुटेज में हेरात और काबुल जैसे बड़े शहरों में कई महिलाएं और युवतियां बाज़ार में बिना हिजाब के घूमती, खरीदारी करती और काम पर जाती हुई दिखाई दीं।

बेशक, काबुल, हेरात और मज़ार-ए-शरीफ जैसे बड़े शहरों को छोड़कर बाकी जगहों पर आज भी लड़कियों को सिर्फ सातवीं तक ही तालीम की इजाज़त है। लेकिन धीरे-धीरे तालिबानी हुकूमत ने नियमों में कुछ ढील दी है। नतीजतन, वहां लोगों के अधिकार पहले जैसे बहाल हो रहे हैं।

hh

सज़ा के खौफ से ज़ीरो क्राइम

विशाल अपने तज़ुर्बे और वहां मिली जानकारी के बिनाह पर बताते हैं कि जब से तालिबान की हुकूमत आई है, तब से भ्रष्टाचार, चोरी और किडनैपिंग पूरी तरह से बंद हो गई है। कहा जाता है कि पिछले साढ़े चार सालों में पूरे देश में सिर्फ दो अपराध हुए हैं। उनमें से एक साइकिल चोरी और दूसरा छेड़छाड़ का मामला था।

साइकिल चोरी करने वाले के दोनों हाथ बीच सड़क पर ही काट दिए गए, जिसकी वजह से कानून का ज़बरदस्त खौफ पैदा हो गया है। इसकी मिसाल देते हुए विशाल बताते हैं, “काबुल के एक पब्लिक हमाम (बाथरूम) में मैं तालिबानियों की दी हुई वही अंगूठी भूल गया था। वह अंगूठी मेरे लिए बहुत अनमोल थी। दो-तीन घंटे बाद याद आने पर जब मैं उसे वापस लेने के लिए वहां गया, तो वह बिल्कुल वहीं पर महफूज़ मिली।”

gg

22 दिनों का राज़

अफ़ग़ानिस्तान का खान-पान पूरी दुनिया में मशहूर है। वहां का काबुली पुलाव, काबुली चने से बनने वाली 'शोर्नखोर' नाम की शाकाहारी डिश और चपली कबाब वहां की खास पहचान हैं। हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों में शाकाहारी लोगों के लिए विकल्प थोड़े कम ही होते हैं।

बिना किसी प्लानिंग के निकले विशाल चव्हाण आखिर 22 दिनों तक अफ़ग़ानिस्तान में क्यों रुके रहे? उन्होंने मज़ार-ए-शरीफ से 40 किलोमीटर अंदर एक दूर-दराज़ के गांव में बाइक से आखिर क्या तलाशा? और इन 22 दिनों में उन्होंने जो भी एक-एक पल जिया, वहां की जो भी हक़ीक़त देखी, उसे उन्होंने अपनी किताब 'नासिककर इन अफ़ग़ानिस्तान' में बड़ी तफ्सील से बयां किया है।

अफ़ग़ानिस्तान की बंदूकों और दहशत वाली छवि से परे जाकर वहां की तहज़ीब, हिंदुस्तानियों के प्रति उनके प्यार को दुनिया के सामने लाने वाले नासिक के इस ट्रैवेलर का यह तज़ुर्बा वाकई जानने लायक है।