मस्जिद पर हिंदुओं ने बरसाया प्यार, मंदिर उत्सव में मुस्लिमों ने की सेवा

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 24-10-2026
Hindus presented gifts at the inauguration of a mosque
Hindus presented gifts at the inauguration of a mosque

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

जब देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी-कभी धर्म के नाम पर तनाव और विवाद की खबरें सामने आती हैं, ऐसे समय में तमिलनाडु के मदुरै जिले के थेनूर गांव से आई एक घटना ने आपसी भाईचारे और धार्मिक सद्भाव की खूबसूरत तस्वीर पेश की है। यहां एक नई बनी मस्जिद के उद्घाटन समारोह में हिंदू समुदाय के लोग पारंपरिक उपहारों के साथ पहुंचे और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक स्थल के उद्घाटन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच वर्षों से चले आ रहे प्रेम, सम्मान और साझी संस्कृति का प्रतीक बन गया।

मदुरै के समायनल्लूर के पास स्थित थेनूर गांव में मस्जिद के उद्घाटन के दौरान हिंदू ग्रामीणों ने पारंपरिक 'सीर-वरिसै' यानी शुभ अवसर पर भेंट किए जाने वाले उपहार लेकर समारोह में हिस्सा लिया। ग्रामीणों ने पटाखे फोड़ते हुए जुलूस निकाला और गांव की सवाड़ी से मस्जिद तक पहुंचे। वहां मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उनका स्वागत किया और इस तरह पूरे आयोजन में आपसी सद्भाव की भावना देखने को मिली।
 
मस्जिद के उद्घाटन पर हिंदुओं ने निभाई पारंपरिक रस्म

थेनूर गांव में नवनिर्मित मस्जिद के उद्घाटन समारोह को स्थानीय लोगों ने आपसी एकता के उत्सव के रूप में मनाया। हिंदू समुदाय के लोग पारंपरिक उपहारों के साथ मस्जिद पहुंचे और मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ अपनी खुशियां साझा कीं। eeस्थानीय विवरणों के अनुसार, उपहारों में कुरान, धातु के बर्तन, रैक, मदरसे के लिए एक अलमारी और दस प्रकार के फल शामिल थे। इन भेंटों के जरिए ग्रामीणों ने मस्जिद के उद्घाटन के अवसर पर अपनी शुभकामनाएं और अपनापन व्यक्त किया।
 
गांव के सवाड़ी से निकले जुलूस में पटाखे भी फोड़े गए। जब ग्रामीण मस्जिद पहुंचे, तो मुस्लिम समुदाय के बुजुर्गों और प्रबंधन से जुड़े लोगों ने उनका स्वागत किया। इस्लामी पदाधिकारियों ने हिंदू समुदाय के बुजुर्गों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। \
 
मुस्लिम बच्चों ने उन्हें उपहार दिए, जबकि युवाओं ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और मस्जिद के भीतर लेकर गए। धार्मिक पहचान अलग होने के बावजूद एक-दूसरे के समारोहों में इस तरह शामिल होना गांव की आपसी एकजुटता को दर्शाता है। समारोह में शामिल लोगों के लिए यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वर्षों से कायम सामाजिक रिश्तों को आगे बढ़ाने का अवसर भी था।
 
 
200 साल से अधिक पुरानी है भाईचारे की परंपरा

थेनूर गांव की इस घटना की सबसे खास बात यह है कि यहां हिंदू-मुस्लिम एकता की परंपरा नई नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव में करीब 200 वर्षों से अधिक समय से धार्मिक सौहार्द से जुड़ी ऐसी परंपराएं निभाई जाती रही हैं।
 
ग्रामीणों का कहना है कि हिंदू मंदिरों के उत्सवों में मुस्लिम समुदाय के लोग सहयोग करते हैं, जबकि मस्जिद से जुड़े आयोजनों में हिंदू समुदाय के लोग भी योगदान देते हैं। दोनों समुदायों के बीच धार्मिक आयोजनों के लिए आर्थिक सहयोग देने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है।
 
इस व्यवस्था में केवल एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होना ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक आयोजनों को सामुदायिक जिम्मेदारी के रूप में देखना भी शामिल है। गांव के लोगों के मुताबिक, मंदिर के उत्सव हों या मस्जिद के आयोजन, दोनों समुदाय अपनी भागीदारी से उन्हें सफल बनाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि थेनूर में मस्जिद के उद्घाटन के दौरान हिंदुओं का सीर-वरिसै लेकर पहुंचना ग्रामीणों के लिए कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। यह उस सामाजिक परंपरा का हिस्सा था, जिसमें एक समुदाय की खुशी को दूसरा समुदाय भी अपनी खुशी समझता है।
 
करीब 80 लाख रुपये के योगदान से हुआ मस्जिद का पुनर्निर्माण

गांव की सदियों पुरानी जुम्मा मस्जिद का पुनर्निर्माण स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। गांव के निवासी पी. सिराजुद्दीन के अनुसार, मस्जिद के पुनर्निर्माण के लिए ग्रामीणों ने मिलकर लगभग 80 लाख रुपये का योगदान दिया। पुनर्निर्माण के बाद रविवार को मस्जिद का उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर सामुदायिक भोज का भी आयोजन हुआ, जिसमें करीब 3,000 लोगों ने हिस्सा लिया।
 
इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एक साथ जुटना इस आयोजन के सामाजिक महत्व को भी रेखांकित करता है। धार्मिक स्थल के पुनर्निर्माण में स्थानीय लोगों का योगदान और उद्घाटन समारोह में विभिन्न समुदायों की भागीदारी गांव के सामूहिक जीवन की तस्वीर पेश करती है। इस आयोजन में हिंदू ग्रामीणों द्वारा पारंपरिक उपहार भेंट करना और मुस्लिम समुदाय द्वारा उनका सम्मानपूर्वक स्वागत करना समारोह के सबसे भावुक और उल्लेखनीय पहलुओं में शामिल रहा।
 
सुंदरवल्ली अम्मन मंदिर के उत्सव में मुस्लिम समुदाय भी करता है सहयोग

थेनूर में आपसी सद्भाव केवल मस्जिद के उद्घाटन तक सीमित नहीं है। गांव के लोग बताते हैं कि हिंदू मंदिर के वार्षिक उत्सवों में भी मुस्लिम समुदाय के लोग सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। गांव के निवासी एस. कार्तिगई कुमारन के अनुसार, सुंदरवल्ली अम्मन मंदिर में हर साल तमिल महीने पुरट्टासी के दौरान आयोजित होने वाले पोंगल उत्सव में मुस्लिम समुदाय के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। वे मंदिर के लिए आर्थिक सहयोग भी देते हैं।
 
स्थानीय परंपरा के अनुसार, पुरट्टासी महीने में हिंदू समुदाय के कई लोग धार्मिक मान्यताओं के कारण मांसाहार से परहेज करते हैं। कार्तिगई कुमारन के मुताबिक, इस दौरान गांव के मुस्लिम लोग भी हिंदू पड़ोसियों की इस परंपरा का सम्मान करते हुए मांसाहार से परहेज करते हैं। यह परंपरा इस बात को रेखांकित करती है कि धार्मिक आस्थाएं अलग होने के बावजूद लोग एक-दूसरे की मान्यताओं को समझने और उनका सम्मान करने की कोशिश करते हैं। गांव में सामाजिक रिश्ते केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन और आपसी व्यवहार में भी दिखाई देते हैं।
 
मंदिर के उत्सव में मुस्लिमों ने बांटा था शरबत और मट्ठा

थेनूर गांव में धार्मिक सौहार्द की एक और मिसाल हाल ही में सुंदरवल्ली अम्मन मंदिर के उत्सव के दौरान देखने को मिली थी। पुरट्टासी महीने में आयोजित मंदिर के उत्सव में पालकुड़म और अग्नि सट्टी जैसे धार्मिक कार्यक्रम हुए। इस दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने श्रद्धालुओं के बीच शरबत और मट्ठा वितरित किया। इस पहल के जरिए उन्होंने मंदिर के उत्सव में शामिल लोगों की सेवा की और धार्मिक आयोजन के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया।
 
अब मस्जिद के उद्घाटन पर हिंदू समुदाय के लोगों द्वारा सीर-वरिसै लेकर पहुंचना इसी आपसी सहयोग की परंपरा की दूसरी तस्वीर बनकर सामने आया है। एक अवसर पर मुस्लिम समुदाय मंदिर के उत्सव में शामिल लोगों की सेवा करता है, तो दूसरे अवसर पर हिंदू समुदाय मस्जिद के उद्घाटन में उपहार लेकर पहुंचता है। दोनों घटनाएं इस बात को सामने लाती हैं कि धार्मिक सद्भाव केवल बड़े भाषणों या औपचारिक संदेशों से नहीं बनता। यह छोटे-छोटे व्यवहारों, साझा जिम्मेदारियों और एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होने से मजबूत होता है।
 
कभी शराब और तंबाकू की बिक्री पर प्रतिबंध के लिए भी चर्चा में रहा गांव

उपलब्ध विवरणों के अनुसार, थेनूर गांव पहले शराब और तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध जैसी सामुदायिक व्यवस्था के कारण भी चर्चा में रहा है। गांव की पहचान केवल धार्मिक सद्भाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्थानीय स्तर पर सामाजिक नियमों और सामुदायिक जीवन को लेकर भी रही है। आज मस्जिद के उद्घाटन पर हिंदू समुदाय की भागीदारी और मंदिर के उत्सवों में मुस्लिम समुदाय के सहयोग की चर्चा गांव को धार्मिक एकता के उदाहरण के रूप में सामने ला रही है।
 
हालांकि, इस तरह की परंपराओं की असली ताकत किसी एक आयोजन में नहीं, बल्कि उन्हें पीढ़ियों तक बनाए रखने में होती है। थेनूर के लोगों के मुताबिक, यहां धार्मिक आयोजनों में एक-दूसरे का सहयोग करना लंबे समय से सामाजिक जीवन का हिस्सा रहा है।
 
अलग-अलग आस्थाएं, लेकिन खुशियां साझा

भारत की सांस्कृतिक विविधता की खूबसूरती यही है कि यहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से जुड़े लोग एक ही समाज का हिस्सा बनकर रहते हैं। कई गांवों में स्थानीय परंपराएं धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर लोगों को आपस में जोड़ती हैं। थेनूर की घटना भी इसी भावना को सामने लाती है। मस्जिद के उद्घाटन पर हिंदू ग्रामीणों का उपहार लेकर पहुंचना, मुस्लिम समुदाय द्वारा उनका स्वागत करना, बुजुर्गों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित करना और बच्चों का उपहार देना ये सभी दृश्य आपसी सम्मान और अपनत्व को दर्शाते हैं।
 
इसी तरह सुंदरवल्ली अम्मन मंदिर के उत्सव में मुस्लिम समुदाय द्वारा शरबत और मट्ठा बांटना बताता है कि धार्मिक आयोजनों में सेवा और सहयोग की भावना किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती। गांव में लंबे समय से निभाई जा रही इन परंपराओं का संदेश साफ है—लोग अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखते हुए भी दूसरों की आस्थाओं का सम्मान कर सकते हैं और सामुदायिक जीवन को मजबूत बना सकते हैं।
 
 
धार्मिक सद्भाव की मिसाल बना थेनूर गांव

आज के दौर में थेनूर की यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाती है कि सामाजिक एकता का आधार एक-दूसरे की धार्मिक मान्यताओं को मिटाना नहीं, बल्कि उनका सम्मान करना है। हिंदू समुदाय ने मस्जिद के उद्घाटन में अपनी परंपरा के अनुसार सीर-वरिसै भेंट की, जबकि मुस्लिम समुदाय ने उन्हें सम्मान और आत्मीयता के साथ स्वीकार किया।
 
करीब 80 लाख रुपये के सामुदायिक योगदान से मस्जिद का पुनर्निर्माण, उद्घाटन में लगभग 3,000 लोगों की भागीदारी, मंदिर के उत्सव में मुस्लिम समुदाय का सहयोग और 200 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही भाईचारे की परंपरा—ये सभी बातें इस गांव की सामाजिक पहचान को सामने लाती हैं।
 
थेनूर की कहानी किसी एक धर्म की जीत या किसी दूसरे धर्म की उदारता की कहानी नहीं, बल्कि साथ रहने, एक-दूसरे का सम्मान करने और खुशियां साझा करने की कहानी है। मदुरै के पास स्थित यह गांव याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और उस विविधता के बीच पनपने वाले आपसी विश्वास में है। जब मंदिर के उत्सव में एक समुदाय दूसरे की सेवा करता है और मस्जिद के उद्घाटन पर दूसरा समुदाय पारंपरिक उपहार लेकर पहुंचता है, तो यही दृश्य धार्मिक सद्भाव और सामाजिक एकता को जीवंत बनाते हैं।