राजस शेख: सुरागों से अपराधियों तक पहुंचने वाले पुलिस अफसर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 20-09-2026
Major honor from the Government of India for Rajas Shaikh's 32-year unblemished police service.
Major honor from the Government of India for Rajas Shaikh's 32-year unblemished police service.

 

भक्ति चालक

एक अंधेरी रात और बोपदेव घाट का बेहद सुनसान इलाका, जहां मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं था। वहीं पर वह खौफनाक गैंगरेप का जुर्म हुआ था। सिर्फ पूरे महाराष्ट्र की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की नज़रें इस केस की जांच पर टिकी हुई थीं। जब तफ्तीशका कोई भी सुराग हाथ नहीं लग रहा था, तब सिर्फ आरोपी की टी-शर्ट से सीधे मुजरिम को दबोचा गया था।
 
और इस केस को सुलझाया था पुणे शहर पुलिस महकमे के असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर राजस शेख ने। राजस शेख ने अपनी 32 साल की ईमानदार सर्विस में कई शानदार काम किए हैं। उनके इसी काम को सराहते हुए भारत सरकार के गृह विभाग ने हाल ही में राजस शेख को ‘अति उत्कृष्ट सेवा पदक’ से नवाज़ा है। इस अवार्ड से पुणे पुलिस का सिर फख्र से ऊंचा हो गया है।

'आवाज़-द-वॉयस' से बातचीत करते हुए राजस शेख ने अपने जज़्बात ज़ाहिर किए। उन्होंने कहा, “उस दिन अचानक मेरे दोस्त का फोन आया और उसने मुझे भारत सरकार का अति उत्कृष्ट सेवा पदक मिलने की खबर दी। दो मिनट के लिए मेरा दिल भर आया और आंखों में आंसू आ गए। मेरी आज तक की मेहनत और खिदमत का कहीं न कहीं सिला मिल गया।”
 
खेल के शौक से पुलिस महकमे में एंट्री

राजस शेख 1995 में पुणे शहर पुलिस महकमे में भर्ती हुए थे। खाकी वर्दी का ज़बरदस्त क्रेज़ और वर्दी में रहकर समाज और देश के लिए कुछ शानदार करने की चाहत उन्हें पुलिस महकमे की तरफ खींच लाई। ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज से बुलावा आया और उन्होंने पुलिस भर्ती में जाने का फैसला किया। और अपनी पहली ही कोशिश में उनका सिलेक्शन पुलिस महकमे में हो गया।
 
राजस खुद एक बेहतरीन खिलाड़ी हैं। एथलेटिक्स में लॉन्ग जंप, हाई जंप और ट्रिपल जंप में तो वह माहिर थे ही, साथ ही वह नेशनल लेवल के वॉलीबॉल खिलाड़ी भी रहे हैं। खेल के इस बैकग्राउंड की वजह से उन्हें फिजिकल टेस्ट में कोई परेशानी नहीं हुई। पढ़ाई के दम पर उन्होंने इम्तिहान में शानदार नंबर हासिल किए और मेरिट में अपनी जगह बनाई।
 
शुरुआत में पुलिस हेडक्वार्टर के स्टोर रूम और रिज़र्व आर्मरी रूम में उन्होंने एक मददगार के तौर पर काम किया। पुणे शहर के सभी हथियारों, गोला-बारूद और पुलिस की वर्दियों का हिसाब-किताब रखने और उनकी सप्लाई का काम उन्होंने वहां संभाला। आगे चलकर 2002 में उनका ट्रांसफर ट्रैफिक ब्रांच में हो गया। उस दौर में पुलिस महकमे में प्रीपेड ऑटो रिक्शा का नया कॉन्सेप्ट शुरू हुआ था। ग्रेजुएट होने की वजह से उन्हें वहां ज़िम्मेदारी मिली। बाद में उन्होंने डीसीपी ऑफिस में प्रशासनिक कामकाज भी संभाला।
 
इन्वेस्टिगेशन टीममें एंट्री

हर पांच साल में होने वाले ट्रांसफर के नियम के मुताबिक, राजस शेख का ट्रांसफर वानवड़ी पुलिस स्टेशन में हो गया। वहीं से सही मायनों में उनके क्राइम डिटेक्शन करियर की शुरुआत हुई। अपनी पुलिस सर्विस के दौरान उन्होंने समाज में बढ़ रहे जुर्म पर लगाम कसने का फैसला किया। शुरुआत में ही उन्हें कुछ बहुत अच्छे सीनियर पुलिस अफसर गुरु के तौर पर मिले और उनकी रहनुमाई में राजस शेख का आगे का सफर शुरू हुआ।
 
वानवड़ी पुलिस स्टेशन में रहते हुए उन्होंने मर्डर, घर में चोरी और किडनैपिंग जैसे कई जुर्म के मामलों में मुजरिमों को पकड़ा। इसमें सबसे ज़्यादा मशहूर और चैलेंजिंग केस एक मसलकर नाम के शख्स द्वारा किया गया ट्रिपल मर्डर था। उसने अपनी सगी मां, पत्नी और छोटी सी बच्ची का बड़ी बेरहमी से कत्ल कर दिया था। मीडिया की इस केस पर पूरी नज़र थी। परिवार के दुख को देखकर हर किसी को लग रहा था कि यह इंसान मुजरिम हो ही नहीं सकता। लेकिन राजस शेख की पैनी नज़र ने उसकी संदिग्ध हरकतों को पकड़ लिया।
 
सीनियर अफसरों के सामने अपना शक ज़ाहिर करते वक्त हुए तजुर्बे के बारे में राजस शेख बताते हैं, “शुरुआत में सीनियर ने कहा कि जिसकी मां, बीवी और बच्ची चली गई है, उसकी क्या जांच कर रहे हो? लेकिन मुझे अंदर से शक था। हमने सख्ती से जांच की और यह खुलासा हुआ कि अपनी सहेली से शादी करने के लिए उसने ही यह साज़िश रची थी, और अदालत ने आगे चलकर इस मुजरिम को सख्त सज़ा सुनाई।”
 
 
 
 
'वीर' के मेले में छोटे बच्चे की तलाश

वानवड़ी के बाद कोंढवा पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर होने पर वहां भी उन्होंने इन्वेस्टिगेशन टीम में ही काम किया। वहां एक बेहद गरीब राजमिस्त्री के छोटे बच्चे को किडनैप कर लिया गया था। कुछ लोगों ने उस छोटे बच्चे को चुरा लिया था। राजस शेख और उनकी टीम ने इस सोच को गलत साबित कर दिया कि पुलिस सिर्फ बड़े लोगों के लिए काम करती है। दिन-रात तलाश करके महज़ दो दिनों में उस छोटे बच्चे का पता लगा लिया गया। पुणे ज़िले के वीर गांव में म्हस्कोबा के बड़े मेले में उस बच्चे को भीख मांगने के लिए ले जाया गया था। पुलिस ने वहां जाकर बच्चे को सही-सलामत कब्ज़े में लिया और उसकी मां को सौंप दिया। उस जज़्बाती पल के बारे में बात करते हुए राजस कहते हैं, “उस मां ने जिस तरह अपने बच्चे को सीने से लगाया और वह रोने लगी, वह पल मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सुकून देकर गया। किसी भी बड़े जुर्म को सुलझाने से ज़्यादा वह सुकून मेरे लिए बहुत बड़ा था।”
 
एटीएम चोरी का अंतरराज्यीय नेटवर्क

साल 2017 के दिसंबर महीने में एक ही जगह से दो बार एटीएम मशीन चोरी होने की घटना हुई। एक ही जगह से दो बार चोरी होने पर सीनियर अफसरों ने नाराज़गी ज़ाहिर की। इस बड़े चैलेंज को कुबूल करते हुए राजस शेख और उनकी टीम ने जांच शुरू की।
 
मिली हुई जानकारी के आधार पर पुणे से लेकर सांगली ज़िले के किर्लोस्करवाड़ी तक पूरे नौ दिनों तक सीसीटीवी फुटेज का पीछा किया गया। नौवें दिन एक मुजरिम के बारे में पता चला और उसकी लोकेशन ट्रैक करते हुए वे उस्मानाबाद पहुंच गए। उसे हिरासत में लेकर जब और जांच की गई, तो पता चला कि उसके बाकी साथी कर्नाटक-महाराष्ट्र बॉर्डर पर बेलगाम में हैं। वहां जाकर पूरी गैंग को हथकड़ी पहनाई गई।
 
इन चोरों का तरीका देखकर पुलिस भी हैरान रह गई थी। उन्होंने अपनी खुद की ट्रॉली, पुल्ली और स्लाइडर बनाया हुआ था। पुल्ली से एटीएम मशीन को पैक करते, आगे टायर डालकर झटका देते, जिससे वह मशीन स्लाइडर से सीधे गाड़ी में गिर जाती। गाड़ी में सिर्फ ड्राइवर और साइड की एक सीट छोड़कर बाकी पूरा हिस्सा खाली रखा जाता था।
 
इस गैंग द्वारा सतारा, सांगली, कोल्हापुर और उस्मानाबाद इलाकों में किए गए पूरे 19 जुर्म राजस शेख की टीम ने उजागर किए। बाद में क्राइम ब्रांच में ट्रांसफर होने के बाद, एंटी-नारकोटिक्स सेल (अमली पदार्थ विरोधी पथक) में काम करते हुए उन्होंने एमडी ड्रग्स, गांजा तस्करों और उनकी बड़ी गैंग का पर्दाफाश किया। नाइजीरियन फ्रॉड और एटीएम क्लोनिंग के मुजरिमों को भी उन्होंने सलाखों के पीछे पहुंचाया।
 
आईपीएस अफसर ने लगाया गले

बोपदेव घाट में हुए गैंगरेप) की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। घाट में फोन नहीं लग रहे थे, कोई सीसीटीवी नहीं था और मुजरिमों ने अपने और पीड़ितों के मोबाइल फ्लाइट मोड पर डाल दिए थे।
 
जांच का कोई भी सुराग हाथ में नहीं था। राजस शेख ने दिन-रात एक करके फुटेज खंगाले। एक धुंधली फोटो में मुजरिम की टी-शर्ट पर एक होटल का खास लोगो दिखाई दिया। बस उसी एक लिंक को पकड़कर उन्होंने तुरंत वह होटल खोज निकाला और मालिक से पूछताछ की। मालिक ने अपने नौकर को पहचान लिया और पुलिस ने मुजरिम को दबोच लिया। उसने अपने दो साथियों के साथ जुर्म करने की बात कुबूल कर ली।
 
इस कामयाब तफ्तीश की यादों के बारे में राजस शेख बताते हैं, “यह तफ्तीश पूरी होने पर एक बहुत सीनियर आईपीएस लेवल के अफसर ने मुझे कसकर गले लगाया और बधाई दी। सीनियर अफसर आमतौर पर किसी को गले नहीं लगाते, लेकिन उस दिन मेरे काम की सही मायनों में कदर होने का सुकून मिला।”
 
‘ग़रीबों का अमिताभ’

राजस शेख का पैतृक गांव पुरंदर तालुका का भिवड़ी है। इस गांव का इंकलाब और खुद्दारी का बड़ा इतिहास है। पहले क्रांतीवीर उमाजी नाइक द्वारा अंग्रेज़ों के खिलाफ किए गए विद्रोह में यह पूरा गांव शामिल हुआ था, इसीलिए इस गांव को ‘बंडाची भिवड़ी’ (विद्रोह की भिवड़ी) कहा जाता है।
 
अपने गांव की मिट्टी के प्रति आभार जताते हुए राजस शेख कहते हैं, “मेरे भिवड़ी की मिट्टी में एक अलग ही तेवर है। वही तेवर लेकर मैं आज तक पुलिस महकमे में निडर होकर काम करता आ रहा हूं।”
 
उनके इसी काम करने के तरीके की वजह से रिटायर सीनियर अफसर उन्हें प्यार से ‘ग़रीबों का अमिताभ बच्चन’ बुलाते थे। खुद नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं करनी और किसी पर नाइंसाफी होने नहीं देनी, इस उसूल का उन्होंने अपनी सर्विस में अब तक पालन किया है और आगे भी उम्र भर पालन करने की बात उन्होंने कही। क्राइम सीन का मुआयना करते वक्त उनके काम करने का एक तय तरीका है।
 
वे कहते हैं, “जुर्म की जगह पर जाकर अगर बारीकी से मुआयना किया जाए, तो 100% कोई न कोई सुराग ज़रूर मिलता है। उसी एक सुराग को पकड़कर काम किया जाए तो कामयाबी पक्की मिलती है, यह मेरा तजुर्बा है।”
 
मां ने दिया तालीम का तोहफा

राजस शेख का परिवार बेहद गरीब था। छह भाई-बहनों का यह परिवार। मां-बाप ने खेतों में मज़दूरी करके सभी बच्चों को पढ़ाया। आज पांचों भाई-बहन ग्रेजुएट हैं। बड़ी बहन की शादी जल्दी हो गई, लेकिन बाकी सभी को मां ने बड़ी मेहनत से कामयाब बनाया। उनके बड़े भाई दिलावर मुलानी टाटा मोटर्स में थे, बहन आबेदा मुलानी हेडमास्टर के पद से रिटायर हुईं, दूसरी बहन जमीला मुंबई महानगरपालिका (BMC) में थीं और भाई कादर मुलानी पुणे ज़िला शिक्षण मंडल में टीचर के पद से रिटायर हुए हैं।
 
मां की तालीम के प्रति ज़िद को याद करते हुए वे कहते हैं, “मेरी मां अनपढ़ थीं, लेकिन हाथ में छड़ी लेकर हमें पढ़ने बिठाती थीं। वह कहती थीं कि तालीम के बिना कोई चारा नहीं है। पैरेंट्स मीटिंग का कॉन्सेप्ट तो अब आया है, लेकिन मेरी मां उस वक्त हर सोमवार सासवड के बाज़ार आने पर हमारे स्कूल जाकर टीचरों से हमारी प्रोग्रेस पूछती थीं।” आज भी राजस शेख अपने भाई-बहनों के साथ जॉइंट फैमिली में रहते हैं। उनकी पत्नी नज़मा वाडिया कॉलेज से ग्रेजुएट हैं। बड़ी बेटी ने एमआईटी से बी.टेक किया है, जबकि छोटी बेटी 12वीं में है और वह भी पुलिस अफसर बनना चाहती है।
 
 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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लाइफस्टाइल और काम का बैलेंस

32 साल की लंबी सर्विस में राजस शेख को पूरे 280 से ज़्यादा इनाम मिले हैं। उन्हें डीजीपी का ‘गुणवत्तापूर्ण सेवा पदक’ और महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री की तरफ से दो सम्मान पत्र मिले हैं।
 
इसके अलावा 15 से 25 साल की बेदाग सर्विस के लिए मिलने वाला ‘उत्कृष्ट सेवा पदक’ और 25 साल से ऊपर की सर्विस के लिए मिलने वाला केंद्र सरकार का ‘अति उत्कृष्ट सेवा पदक’ देकर उन्हें सम्मानित किया गया है।
 
अपने बेदाग सफर पर बात करते हुए वे पूरे यकीन के साथ कहते हैं, “मेरी आज तक की सर्विस में कोई एक इंसान भी यह कह दे कि मैंने रिश्वत ली है। लोगों के काम कायदे से और हंसते हुए किए जाएं, तो कोई तनाव नहीं आता। हर किसी को अपने काम का हमेशा मज़ा लेना चाहिए।”
 
पुलिस के काम के घंटे तय न होने की वजह से उनकी लाइफस्टाइल तनाव से भरी होती है। लेकिन अपनी नौकरी और सेहत का खयाल रखते हुए, मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए राजस रोज़ाना घर का ही खाना खाते हैं। सुबह 40-45 मिनट एक्सरसाइज़, प्राणायाम और मेडिटेशन करते हैं।
 
नई पीढ़ी को एक कीमती सलाह देते हुए राजस आखिर में कहते हैं, “अपना लक्ष्य (टारगेट) तय करें और लगातार उस दिशा में कोशिश करते रहें। लगातार और दिल से की गई कोशिशें आपको यकीनन मंज़िल तक पहुंचाएंगी।”