कलाम बच्चों में क्यों तलाशते थे महाभारत के विदुर?

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 15-10-2026
Why did Kalam seek the Vidura of the Mahabharata among children?
Why did Kalam seek the Vidura of the Mahabharata among children?

 

ddमलिक असगर हाशमी

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को बच्चों से बेहद लगाव था। वे जब भी स्कूलों में जाते, विद्यार्थियों से खुलकर बातचीत करते। उनके सवाल सुनते, उनके सपनों को समझते और उन्हें बड़े लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित करते। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मिसाइल मैन के नाम से मशहूर डॉ. कलाम बच्चों के बीच इतना समय क्यों बिताते थे? क्या इसकी वजह सिर्फ शिक्षा और विज्ञान के प्रति उनका प्रेम था, या इसके पीछे कोई गहरा विचार भी था?

इस सवाल का जवाब उनकी चर्चित पुस्तक इग्नाइटेड माइंड्स में मिलता है। इस पुस्तक में डॉ. कलाम ने एक ऐसे भारत की कल्पना की है, जहां राजनीति में नैतिकता हो, सत्ता में सेवा का भाव हो, विज्ञान के साथ आध्यात्मिकता हो और विकास का उद्देश्य केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि मानवीय जीवन को बेहतर बनाना भी हो।

वे बच्चों में महाभारत के उस किरदार को तलाशते थे, जो अन्याय के सामने झुकने को तैयार नहीं था। वह किरदार था विदुर। डॉ. कलाम के लिए विदुर केवल महाभारत का एक बुद्धिमान पात्र नहीं थे। वे साहस, विवेक, नैतिकता और सत्ता के सामने सच बोलने की हिम्मत के प्रतीक थे।

आज जब सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों, राजनीतिक संवाद और सामाजिक सद्भाव को लेकर सवाल उठते हैं, तब कलाम के ये विचार और भी प्रासंगिक लगते हैं। उनकी चिंता केवल भारत के भविष्य को लेकर नहीं थी। वे इस बात से भी परेशान थे कि ज्ञान, विज्ञान और विकास में इतनी प्रगति करने के बावजूद मनुष्य अपने भीतर की अच्छाई को क्यों नहीं पहचान पा रहा है।

जब एक बच्चे ने कलाम से पूछा, महाभारत में आपका पसंदीदा पात्र कौन था?

डॉ. कलाम ने इग्नाइटेड माइंड्स में एक बच्चे के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया है। बच्चे ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने महाभारत पढ़ी है और अगर पढ़ी है, तो उसमें उनका पसंदीदा पात्र कौन है।

कलाम ने जवाब दिया कि उन्हें विदुर का चरित्र विशेष रूप से पसंद है। महाभारत के अनेक पात्र मानवीय स्वभाव के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। उनमें अच्छाई भी है और बुराई भी। लेकिन विदुर की विशेषता यह थी कि उन्होंने सत्ता और प्रभावशाली लोगों के गलत कामों के खिलाफ आवाज उठाने का साहस दिखाया। जब दूसरे लोग अधर्म के सामने झुक गए, तब भी उन्होंने विवेक और नैतिकता का साथ नहीं छोड़ा।

कलाम की नजर में यही एक सच्चे नेता की पहचान होनी चाहिए। नेता वह नहीं जो केवल सत्ता हासिल करे, बल्कि वह है जो गलत को गलत कह सके। वह अपने पद, प्रतिष्ठा और निजी हितों से ऊपर उठकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।

कलाम ने अपनी पुस्तक में निराशा व्यक्त करते हुए लिखा है:

“आज, हमारे लिए अपने नेताओं में एक सच्चा विदुर ढूंढना मुश्किल है। हमारे लिए ऐसे ज्ञानी इंसान की कल्पना करना मुश्किल है और ऐसे ज्ञान को पाने का लक्ष्य रखना और भी मुश्किल है। आज की पब्लिक लाइफ की क्वालिटी, बातचीत का घटिया लेवल और इतना ज़्यादा ईगो, गुस्सा, लालच, जलन, नफ़रत, क्रूरता, हवस, डर, चिंता और उथल-पुथल इससे भी ज़्यादा निराशाजनक है! मुझे लगा कि मेरे अंदर एक नया पक्का इरादा जाग रहा है।”

यह केवल एक वैज्ञानिक या पूर्व राष्ट्रपति की निराशा नहीं थी। यह उस व्यक्ति की चिंता थी, जिसने भारत की अपार संभावनाओं को करीब से देखा था और जो जानता था कि किसी देश की असली ताकत उसके संसाधनों, हथियारों या आर्थिक उपलब्धियों में ही नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र में भी होती है।

बच्चों में भारत का असली भविष्य तलाशने का संकल्प

डॉ. कलाम के लिए यह एहसास एक नए संकल्प की शुरुआत बना। उन्होंने तय किया कि वे भारत के बच्चों में देश के वास्तविक स्वरूप को तलाशने की कोशिश करेंगे। उनका वैज्ञानिक करियर, उनकी उपलब्धियां, उनकी टीमें और उन्हें मिले पुरस्कार उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे, लेकिन अब वे इससे आगे बढ़कर कुछ करना चाहते थे।

वे उस जीवंत चेतना से जुड़ना चाहते थे, जिसे वे भारत की आत्मा मानते थे। उन्हें विश्वास था कि बच्चों के साथ बातचीत करते हुए वे न केवल उनके भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान सकते हैं, बल्कि अपने भीतर के उच्चतर स्वरूप को भी बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

इसीलिए उनके लिए स्कूलों के दौरे महज औपचारिक कार्यक्रम नहीं थे। वे विद्यार्थियों से मिलकर उनके सपनों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं को समझते थे। विज्ञान के प्रति उनकी रुचि जगाना और उन्हें विकसित भारत के निर्माण के मिशन से जोड़ना उनके उद्देश्य का हिस्सा था।

डॉ. कलाम ने अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि कई राज्यों, विशेष रूप से पूर्वोत्तर के असम और त्रिपुरा, झारखंड तथा तमिलनाडु के विभिन्न क्षेत्रों में स्कूलों के दौरों के दौरान उन्होंने हजारों विद्यार्थियों से संवाद किया। उनके अनुसार, उस समय तक वे लगभग 40,000 छात्रों को संबोधित कर चुके थे।

वे मानते थे कि बच्चों के साथ उनका सहज जुड़ाव उन्हें उनकी कल्पनाओं और आकांक्षाओं को समझने में मदद करता है। उन्हें लगता था कि बातचीत के माध्यम से बच्चों के मन में विज्ञान के प्रति प्रेम जगाया जा सकता है और इस प्रेम को राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा में बदला जा सकता है।

उनके लिए विकसित भारत का सपना केवल आधुनिक प्रयोगशालाओं, बड़ी परियोजनाओं और तकनीकी उपलब्धियों तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि देश के बच्चे वैज्ञानिक सोच के साथ जिम्मेदार नागरिक भी बनें। उनके भीतर सवाल पूछने की क्षमता हो, दूसरों के विचारों का सम्मान हो और अन्याय के सामने खड़े होने का साहस हो।

गांधी, आइंस्टीन, अशोक, लिंकन और खलीफा उमर का सपना

कलाम की सोच का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनकी वह कल्पना है, जिसमें वे पांच ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को एक साथ देखते हैं। ये व्यक्तित्व हैं महात्मा गांधी, वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन, सम्राट अशोक, अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन और इस्लामी इतिहास के महत्वपूर्ण शासक खलीफा उमर।

इन पांचों के जीवन, विचारों और योगदान में अलग-अलग विशेषताएं थीं। फिर भी कलाम को लगता था कि इनके अनुभवों से मानवता के सामने खड़े कई बड़े सवालों का जवाब खोजा जा सकता है।

उन्होंने एक ऐसे दृश्य की कल्पना की, जो सामान्य सपने से कहीं अधिक गहरा और स्पष्ट था। उन्हें अपने सामने दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान दिखाई दिया। पूर्णिमा का चांद चमक रहा था और उसकी रोशनी में पूरा रेगिस्तान नहाया हुआ था। इसी चांदनी के बीच पांचों महान व्यक्तित्व एक घेरे में खड़े थे। उनके वस्त्र हवा में लहरा रहे थे।

कलाम इस कल्पना के माध्यम से यह समझना चाहते थे कि जब मनुष्य के पास बुद्धि, ज्ञान, शक्ति और रचनात्मकता है, तब भी वह हिंसा, घृणा और संघर्ष में क्यों उलझा हुआ है। आखिर ऐसी कौन-सी कमी है, जो इंसान को अपनी ही उपलब्धियों का इस्तेमाल विनाश के लिए करने पर मजबूर कर देती है?

यह सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विज्ञान ने मनुष्य को अभूतपूर्व क्षमताएं दी हैं, लेकिन इन क्षमताओं का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाएगा, इसका फैसला अंततः मनुष्य के विवेक और नैतिकता को ही करना है।

कलिंग की धरती पर अशोक का हृदय परिवर्तन

कलाम अपनी कल्पना में स्वयं को सम्राट अशोक के पास खड़ा पाते हैं। अशोक ने अपने जीवन में दो बिल्कुल अलग रूप देखे थे। एक ओर वह विजेता थे, जिन्होंने साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध किए। दूसरी ओर वही अशोक थे, जिन्होंने युद्ध की विभीषिका देखने के बाद दया, करुणा और अहिंसा का रास्ता अपनाया।

कलाम के वर्णन में अशोक अभी-अभी कलिंग युद्ध से लौटे हैं। युद्ध में हुई तबाही ने उन्हें भीतर तक हिला दिया है। धरती पर बिखरे शव, घायलों की पीड़ा और चारों ओर फैला विनाश उन्हें अपनी विजय की असली कीमत का एहसास कराते हैं।

कलाम लिखते हैं कि अशोक घुटनों के बल गिर पड़ते हैं। वे अपना कवच और मुकुट उतार देते हैं। उनका चेहरा उस त्रासदी को देखकर पीला पड़ जाता है, जिसे उनकी विजय ने जन्म दिया था। वे ऊपर देखते हैं। चांदनी से नहाया आकाश उन्हें दिखाई देता है, लेकिन नीचे धरती पर दर्द, खून और तबाही फैली हुई है।

प्रकृति की सुंदरता और युद्ध की भयावहता के बीच खड़े अशोक को अपनी गलती का एहसास होता है। कलाम इस क्षण को अहिंसा के सिद्धांत की ओर अशोक के ऐतिहासिक परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जिस शासक ने कभी विजय को अपनी शक्ति का प्रमाण माना था, वह अब समझता है कि वास्तविक जीत दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में शांति लाने में है।

कलाम की कल्पना में अशोक कहते हैं:

“दोस्तों, एक बात मैंने समझी है, दुख देने से कोई जीत नहीं होती। जीत तो एक शांतिपूर्ण राज में होती है।”

यह वाक्य सत्ता और शासन के उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या किसी शासक की सफलता उसके अधिकार क्षेत्र के विस्तार से तय होनी चाहिए, या इस बात से कि उसके राज्य में रहने वाले लोग कितने सुरक्षित और खुशहाल हैं? क्या विकास का अर्थ केवल शक्ति बढ़ाना है, या लोगों के जीवन से भय और दुख कम करना भी है?

अशोक के जीवन का यह परिवर्तन बताता है कि मनुष्य अपनी गलतियों से सीख सकता है। लेकिन इसके लिए उसे अपने अहंकार से बाहर निकलकर अपने कर्मों के परिणामों को स्वीकार करना पड़ता है।

खलीफा उमर की नजर में सत्ता एक पवित्र अमानत

कलाम की कल्पना में खलीफा उमर भी मानवता, समानता और जिम्मेदारी का संदेश देते हैं। उनके लिए सत्ता कोई व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं थी। वह एक ऐसी अमानत थी, जिसकी रक्षा करना शासक का नैतिक दायित्व है।

कलाम ने उनके विचारों को इन शब्दों में प्रस्तुत किया है:

“खलीफा उमर ने कहा, यरूशलेम में घुसने के बाद सुना कि सभी इंसान बराबर हैं। दूसरों को अपने रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करने का कोई मतलब नहीं है। तुम्हें वही मिलेगा जो तुम्हारे लिए तय है। सिर्फ भगवान ही सबसे बड़ा है।”

इसके बाद कलाम खलीफा उमर के शासन संबंधी दृष्टिकोण की व्याख्या करते हैं। वे लिखते हैं कि खलीफा उमर ने कभी अपने पद को उससे जुड़े विशेष अधिकारों के नजरिए से नहीं देखा। उनके लिए सरकार एक पवित्र भरोसा थी और उन्होंने पूरी कोशिश की कि उस भरोसे को किसी भी तरह टूटने न दिया जाए।

यह विचार आज के सार्वजनिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में चुने गए प्रतिनिधि हों या किसी अन्य व्यवस्था में जिम्मेदारी संभालने वाले लोग, उनकी असली परीक्षा इस बात से होती है कि वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल किसके हित में करते हैं।

जब सत्ता सेवा के बजाय निजी लाभ का माध्यम बन जाती है, तब जनता और शासन के बीच विश्वास कमजोर होने लगता है। इसके उलट, जब शासक अपने पद को जिम्मेदारी मानता है, तब न्याय और सामाजिक विश्वास की नींव मजबूत होती है।

कलाम की कल्पना में खलीफा उमर का संदेश धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। उसमें सत्ता की नैतिकता, इंसानी बराबरी और दूसरों पर अपने विचार थोपने से बचने की सीख भी शामिल है।
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आइंस्टीन का जहाज और दिशा खोजती मानवता

इसके बाद कलाम की कल्पना में अल्बर्ट आइंस्टीन अपनी बात रखते हैं। वे अपने मित्र वर्नर हाइजेनबर्ग के विचार का उल्लेख करते हैं। यह विचार आधुनिक सभ्यता की एक बड़ी कमजोरी की ओर ध्यान दिलाता है।

आइंस्टीन के शब्दों में:

“आप जानते हैं, पश्चिम में हमने एक बड़ा, सुंदर जहाज़ बनाया है। इसमें सभी आराम हैं, लेकिन एक चीज़ गायब है: इसमें कोई कंपास नहीं है और यह नहीं जानता कि कहाँ जाना है। टैगोर और गांधी जैसे लोगों और उनके आध्यात्मिक पूर्वजों को कंपास मिल गया था। यह कंपास इंसानी जहाज़ में क्यों नहीं लगाया जा सकता ताकि दोनों अपना मकसद पूरा कर सकें?”

यहां जहाज आधुनिक विज्ञान, तकनीक और भौतिक प्रगति का प्रतीक है। कंपास नैतिकता, आध्यात्मिक चेतना और जीवन के उद्देश्य की ओर संकेत करता है। मनुष्य ने बीमारियों के इलाज, अंतरिक्ष की खोज, संचार और औद्योगिक विकास में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन केवल तकनीकी प्रगति यह तय नहीं कर सकती कि इन उपलब्धियों का इस्तेमाल मानवता के हित में होगा या उसके विनाश के लिए।

परमाणु ऊर्जा बिजली भी पैदा कर सकती है और विनाशकारी हथियारों का आधार भी बन सकती है। वैज्ञानिक ज्ञान जीवन बचाने वाली दवाएं विकसित कर सकता है, लेकिन वही ज्ञान विनाश के साधन बनाने में भी इस्तेमाल हो सकता है।

इसलिए सवाल विज्ञान का विरोध करने का नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देने का है। कलाम विज्ञान और आध्यात्मिकता को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते थे। उनकी चिंता यह थी कि ज्ञान के साथ विवेक और क्षमता के साथ जिम्मेदारी भी विकसित होनी चाहिए।

आइंस्टीन के माध्यम से वे यही सवाल उठाते हैं कि आधुनिक सभ्यता ने सुविधाओं से भरा जहाज तो बना लिया है, लेकिन क्या उसे सही दिशा देने वाला नैतिक कंपास भी दिया है?

अब्राहम लिंकन ने खुशी को नैतिक मूल्यों से जोड़ा

कलाम की कल्पना में अब्राहम लिंकन भी अपनी बात रखते हैं। अमेरिका में गुलामी के खिलाफ संघर्ष और मानव समानता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें कलाम के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व बनाती है।

लिंकन के विचारों को प्रस्तुत करते हुए कलाम लिखते हैं:

“एक बात है जो मैं कहना चाहूंगा: खुशी परिवार की अलग-अलग लेवल पर खुशहाली से आती है। भगवान की कृपा इंसानी जीवन को खुशी देती है। खुशी और आनंद धरती पर भगवान जैसी ज़िंदगी के दो ज़रूरी हिस्से हैं। शायद लोगों और देशों के बीच इतना झगड़ा इसलिए है क्योंकि खुशहाली और ताकत की चाहत में हमने नैतिक मूल्यों को नज़रअंदाज़ कर दिया है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि हमारी भूमिका क्या है?

इंसानी चेतना? क्या इसका पॉलिटिकल सोच, साइंटिफिक सोच और थियोलॉजिकल सोच में कोई रोल है? क्या ज़िंदगी के काम में स्पिरिचुअलिटी एक्सेप्टेबल है?”इन सवालों में एक ऐसी दुनिया की चिंता छिपी है, जहां सफलता और ताकत की दौड़ में मानवीय संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही हैं।

व्यक्तिगत जीवन में भी लोग अक्सर अधिक धन, प्रतिष्ठा और अधिकार हासिल करने को सफलता मान लेते हैं। देश भी आर्थिक और सामरिक शक्ति बढ़ाने की होड़ में लगे रहते हैं। लेकिन यदि इस दौड़ में न्याय, करुणा और समानता की उपेक्षा होने लगे, तो विकास का मानवीय उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

लिंकन के विचारों के माध्यम से कलाम यह समझाने की कोशिश करते हैं कि खुशी को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। परिवार, समाज और राष्ट्र के स्तर पर खुशहाली के लिए नैतिक मूल्यों की जरूरत होती है।

यही कारण है कि वे राजनीतिक, वैज्ञानिक और धार्मिक चिंतन में मानवीय चेतना की भूमिका पर सवाल उठाते हैं। उनके लिए आध्यात्मिकता का अर्थ केवल पूजा या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने आचरण और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होना भी है।

गांधी का संदेश: इंसानियत की भलाई सबसे ऊपर

महात्मा गांधी इस कल्पना में उन सभी विचारों को जोड़ते दिखाई देते हैं, जिनका उद्देश्य हिंसा के स्थान पर शांति और शोषण के स्थान पर मानवीय गरिमा को स्थापित करना है।

कलाम की कल्पना में गांधी कहते हैं:

“दोस्तों, हम जो भगवान का संदेश सुन रहे हैं, वह दुनिया बनाने का संदेश है। क्योंकि हम सब धरती ग्रह के ही हैं, इसलिए हम इंसानियत को यह संदेश दे सकते हैं कि अलग-अलग नस्ल, धर्म और भाषा के लोग एक साथ शांति और खुशहाली से कैसे रह सकते हैं।

भगवान ने हम सबको कुछ अनोखा दिया है जो हमने अपने कामों और कोशिशों से इंसानियत को दिया है। क्या वह काम कर रहा है? क्या कोई भगवान का संदेश या सिद्धांत है? भगवान की सुंदरता इंसान की आत्मा में आनी चाहिए और शरीर और मन में खुशी खिलनी चाहिए। क्या यह मुमकिन है?”

इन सवालों का महत्व आज की दुनिया में और बढ़ जाता है। धर्म, नस्ल, भाषा और राष्ट्रीयता के नाम पर पैदा होने वाले संघर्ष बताते हैं कि मनुष्य ने अपनी अलग-अलग पहचानों को कई बार आपसी दूरी का कारण बना लिया है।

जबकि अलग पहचान होना अपने आप में किसी संघर्ष का कारण नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब कोई व्यक्ति या समूह अपनी पहचान को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है और दूसरों के अधिकारों को कमतर समझने लगता है।

गांधी के विचार में शांति केवल युद्ध का न होना नहीं है। शांति का अर्थ ऐसा समाज भी है, जहां लोगों को सम्मान मिले, उनके अधिकार सुरक्षित हों और उन्हें भय के बिना जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो।

कलाम इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए ऋषि अष्टावक्र के कथन का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार, महात्मा गांधी ने अष्टावक्र को याद करते हुए कहा:

“हे मेरे बेटे! तुम ही वो चेतना हो जिसके अंदर यह अनोखी दुनिया पैदा होती है जो तुमसे अलग नहीं है। किसी भी चीज़ के एक्सेप्टेबल या एक्सेप्टेबल होने का सवाल ही कैसे हो सकता है?”

इस कथन का केंद्रीय भाव मनुष्य के भीतर मौजूद चेतना और उसके व्यापक संबंधों को समझने में है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व को केवल निजी हितों तक सीमित नहीं रखता, तब उसके भीतर दूसरों के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित हो सकता है।

कलाम के लिए यह जिम्मेदारी जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देनी चाहिए। राजनीति में न्याय के रूप में, विज्ञान में मानव कल्याण के रूप में, शिक्षा में चरित्र निर्माण के रूप में और समाज में शांति तथा सहयोग के रूप में।

वे इस विचार को एक व्यापक संदेश में बदलते हैं:

“यही हमारा इस धरती के लिए मैसेज है। हम जो कुछ भी करते हैं, कोई भी सिद्धांत जिसे हम मानते हैं, वह इंसानियत की भलाई के लिए होना चाहिए।”

विज्ञान की सफलता तब है, जब किसी का दर्द कम हो

डॉ. कलाम की सोच का एक व्यावहारिक पक्ष भी था। वे केवल बड़े आदर्शों की बात नहीं करते थे। वे यह भी बताते थे कि ज्ञान और तकनीक का सबसे सार्थक उपयोग तब होता है, जब उससे किसी इंसान की तकलीफ कम हो।

कलाम ने बच्चों के साथ बातचीत के अपने अनुभवों में बताया कि जब उनसे पूछा जाता है कि पिछले चालीस वर्षों में किस चीज ने उन्हें सबसे अधिक खुशी दी, तो उनका जवाब उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों से आगे जाता है।

वे कहते हैं कि उन्हें खुशी तब मिलती है, जब हृदय रोगियों की धमनियों में कोरोनरी स्टेंट लगाया जाता है और जब शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चों को हल्के वजन वाले फ्लोर रिएक्शन ऑर्थोसिस यानी एफआरओ कैलिपर्स लगाए जाते हैं। इन उपकरणों से मरीजों और बच्चों की परेशानियां कम करने में मदद मिलती है। कलाम के अनुसार, इन दोनों तकनीकों के विकास में मिसाइल प्रौद्योगिकी से प्राप्त ज्ञान का इस्तेमाल हुआ था।

इस उदाहरण में उनके जीवन का दर्शन साफ दिखाई देता है। जिस तकनीक का इस्तेमाल देश की रक्षा के लिए किया गया, उसी से निकली विशेषज्ञता का उपयोग बीमार लोगों और दिव्यांग बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए भी किया जा सकता है।

यही विज्ञान की मानवीय उपयोगिता है। किसी आविष्कार की अहमियत केवल उसकी जटिलता या तकनीकी श्रेष्ठता से तय नहीं होती। उसका महत्व इस बात से भी तय होता है कि वह किसका जीवन आसान बनाता है।

कलाम बच्चों को विज्ञान पढ़ने के लिए इसलिए प्रेरित नहीं करते थे कि वे केवल बड़े वैज्ञानिक बनें। वे चाहते थे कि उनकी वैज्ञानिक समझ समाज की समस्याओं को हल करने में काम आए। उनके भीतर ऐसी सोच विकसित हो, जो नए आविष्कार करने के साथ यह भी पूछे कि उन आविष्कारों से मानवता को क्या लाभ होगा।

विकास के साथ करुणा भी जरूरी

मानव इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब ज्ञान और शक्ति ने समाज को आगे बढ़ाया है। लेकिन इतिहास यह भी दिखाता है कि इन्हीं क्षमताओं का इस्तेमाल विनाश के लिए किया गया।

कलाम ने गांधी जैसे महापुरुषों और दूसरे महान शिक्षकों के आदर्शों के साथ विश्व युद्धों में हुई तबाही तथा परमाणु बमों के इस्तेमाल को भी इसी विरोधाभास के संदर्भ में देखा। उन्होंने बोस्निया और इजराइल से जुड़े संघर्षों में हुई मौतों और पीड़ा का उल्लेख करते हुए मानवता के सामने मौजूद चुनौती की ओर ध्यान दिलाया।

उनकी चिंता यह थी कि मनुष्य एक तरफ शांति और अच्छे जीवन के सिद्धांत विकसित करता है, दूसरी तरफ ऐसी परिस्थितियां भी पैदा करता है, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की जान चली जाती है।

यह विरोधाभास केवल युद्धों तक सीमित नहीं है। समाज में नफरत, भेदभाव, हिंसा और दूसरों को अपमानित करने की प्रवृत्ति भी इसी समस्या के अलग-अलग रूप हैं। यदि शिक्षा केवल रोजगार हासिल करने का माध्यम बन जाए और उसमें नैतिक जिम्मेदारी के लिए जगह न बचे, तो ज्ञान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। यदि राजनीति केवल सत्ता पाने की लड़ाई बन जाए, तो जनता की समस्याएं पीछे छूट सकती हैं। यदि विज्ञान केवल शक्ति प्रदर्शन का साधन बन जाए, तो उसके मानवीय लाभ सीमित हो सकते हैं।

कलाम जिस शिक्षा की कल्पना करते थे, उसमें विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन था। उनका विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानना चाहिए और अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कामों में लगाना चाहिए।

उन्होंने लिखा:

“शिक्षा में आध्यात्मिकता को शामिल किया जाना चाहिए। आत्म-साक्षात्कार ही मुख्य बात है। हममें से हर किसी को अपने उच्च स्वरूप के बारे में जागरूक होना चाहिए। हम एक शानदार अतीत और एक भव्य भविष्य के बीच की कड़ी हैं। हमें अपनी सोई हुई आंतरिक ऊर्जा को जगाना चाहिए और उसे अपने जीवन का मार्गदर्शन करने देना चाहिए। रचनात्मक कार्यों में लगे ऐसे लोगों की चमक इस देश में शांति, समृद्धि और खुशी लाएगी।”

यहां आध्यात्मिकता को किसी एक धर्म या परंपरा तक सीमित करने के बजाय आत्मबोध, नैतिकता और रचनात्मकता से जोड़कर देखा जा सकता है। व्यक्ति जब अपनी क्षमताओं को पहचानता है और उनका इस्तेमाल दूसरों की भलाई के लिए करता है, तभी उसकी शिक्षा व्यापक सामाजिक अर्थ हासिल करती है।

कलाम का असली सपना: हर बच्चे के भीतर एक बेहतर इंसान

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का बच्चों से लगाव उनके व्यक्तित्व का भावुक पक्ष भर नहीं था। यह उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा था। वे बच्चों में केवल भविष्य के इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक या प्रशासक नहीं देखते थे। वे उनमें ऐसे नागरिकों की संभावना देखते थे, जो भारत को अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और शांतिपूर्ण देश बनाने में योगदान दे सकते हैं।

महाभारत के विदुर में उन्हें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाई देता था। सम्राट अशोक में गलती स्वीकार करने और हिंसा से दूर जाने की क्षमता दिखाई देती थी। खलीफा उमर में सत्ता को अमानत समझने का भाव था। आइंस्टीन के माध्यम से वे विज्ञान को सही दिशा देने वाले नैतिक कंपास की जरूरत समझाते थे। अब्राहम लिंकन के विचारों में उन्हें नैतिक मूल्यों और खुशहाली के बीच संबंध दिखाई देता था। महात्मा गांधी के जरिए वे शांति, सहअस्तित्व और मानवता की साझा जिम्मेदारी का संदेश देते थे।

इन सभी व्यक्तित्वों के जीवन और विचार अलग-अलग थे। उनके ऐतिहासिक संदर्भ भी अलग थे। फिर भी कलाम ने अपनी कल्पना में उन्हें एक साझा प्रश्न के इर्द-गिर्द रखा। वह प्रश्न था कि मनुष्य अपनी बुद्धि, शक्ति और प्रतिभा का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए करे।

यही प्रश्न उनके भारत के सपने का भी केंद्र था। वे ऐसा देश चाहते थे, जहां बच्चों को सपने देखने का अवसर मिले, शिक्षा उन्हें सोचने की स्वतंत्रता दे, विज्ञान उनकी समस्याओं का समाधान करे और राजनीति जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।

वे जानते थे कि बच्चों के भीतर छिपी संभावनाओं को विकसित करने के लिए केवल प्रेरक भाषण पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें बेहतर शिक्षा, समान अवसर, सुरक्षित वातावरण और ऐसे उदाहरण भी चाहिए, जिनसे वे सीख सकें कि कठिन परिस्थितियों में भी नैतिकता का रास्ता चुना जा सकता है।

विदुर की तरह सच बोलना, अशोक की तरह अपनी गलती से सीखना, खलीफा उमर की तरह जिम्मेदारी समझना, आइंस्टीन की तरह सवाल उठाना, लिंकन की तरह समानता के लिए खड़े होना और गांधी की तरह शांति को महत्व देना केवल महान व्यक्तित्वों की जीवनी में दर्ज गुण नहीं रहने चाहिए। इन्हें रोजमर्रा के जीवन में अपनाने की कोशिश भी होनी चाहिए।

डॉ. कलाम के लिए बच्चों के बीच जाना इसी संभावना को जीवित रखने का प्रयास था। वे उनके भीतर विज्ञान के प्रति जिज्ञासा जगाना चाहते थे, लेकिन साथ ही यह उम्मीद भी रखते थे कि ज्ञान उन्हें अधिक संवेदनशील इंसान बनाएगा।

आज भी उनके विचार हमें याद दिलाते हैं कि किसी देश का भविष्य केवल उसकी आर्थिक विकास दर, तकनीकी उपलब्धियों या सैन्य शक्ति से तय नहीं होता। उसका भविष्य इस बात पर भी निर्भर करता है कि आने वाली पीढ़ियां किस तरह के मूल्य अपनाती हैं और अपने ज्ञान का इस्तेमाल किसके हित में करती हैं।

शायद यही वजह थी कि मिसाइल मैन बच्चों में विदुर को तलाशते थे। वे ऐसे बच्चों को देखना चाहते थे, जिनमें सवाल पूछने का साहस हो, अन्याय के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत हो और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव हो।

कलाम का सपना केवल विकसित भारत का सपना नहीं था। वह ऐसा भारत बनाने का सपना था, जहां विकास के साथ विवेक, शक्ति के साथ करुणा और ज्ञान के साथ नैतिकता भी आगे बढ़े।

क्योंकि आखिरकार, किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं है कि वह कितना शक्तिशाली बन गया। उसकी असली सफलता यह भी है कि वह अपनी शक्ति से कितने लोगों का जीवन बेहतर बना पाया और आने वाली पीढ़ियों को कैसी दुनिया सौंपकर गया।

लेखक आवाज द वाॅयस हिंदी के संपादक हैं