2026 की उम्मीद-एक : खनक जोशी ने बनाया सुरों से सौहार्द का पुल

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 01-01-2026
2026 Expectations - Part 1: Khanak Joshi has built a bridge of harmony through music.
2026 Expectations - Part 1: Khanak Joshi has built a bridge of harmony through music.

 

गुजरा हुआ साल 2025 देश के लिए कई मायनों में कड़वाहटों से भरा रहा। धर्म और जाति के नाम पर समाज के ताने-बाने में जो दरारें पड़ीं, उन्होंने हर संवेदनशील मन को बेचैन किया। ऐसे समय में नए साल 2026 की दस्तक एक उम्मीद लेकर आई है,उम्मीद कि आने वाला वक्त नफरत नहीं, बल्कि मोहब्बत की ज़ुबान बोले; दीवारें नहीं, पुल बनाए। इसी भावना के साथ आवाज़ द वॉयस ने नए साल के पहले दिन सौहार्द, मानवीय संवेदना और दिलों की सफ़ाई की दो ऐसी कहानियाँ पाठकों के सामने रखी हैं, जो मन को ठहराव देती हैं। पहली कहानी है सुरों के ज़रिए इन्सानियत का पैग़ाम देने वाली खनक जोशी की और दूसरी मोहम्मद शुजातुल्लाह की,दोनों अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय, लेकिन दोनों का साझा मक़सद एक ही: इंसान के भीतर जमी नफरत की परतों को हटाना।

प्रधान संपादक

मलिक असगर हाशमी, नई दिल्ली

जब भी देश के जाने-माने ज्योतिषी राजेश जोशी से उनकी बेटी खनक जोशी के बारे में पूछा जाता है, तो उनकी आँखों में गर्व और चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान उतर आती है। वे बड़े प्रेम और विस्तार से खनक की वह कहानी सुनाते हैं, जो किसी साधारण पारिवारिक फैसले से शुरू होकर आज सौहार्द और सूफियाना परंपरा की एक अनोखी मिसाल बन चुकी है।

राजेश जोशी बताते हैं कि जब खनक बहुत छोटी थी, तभी उसके भीतर संगीत के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण दिखाई देने लगा था। उसकी आवाज़ में एक अलग सी मिठास थी और सुर पकड़ने की सहज क्षमता। पिता के मन में ख्याल आया कि क्यों न उसे विधिवत संगीत की शिक्षा दिलाई जाए। पास के एक संगीत विद्यालय में उसका दाख़िला कराया गया, जहाँ उसने लंबे समय तक गायन और संगीत का प्रशिक्षण लिया। लेकिन पिता के दिल को कहीं न कहीं यह लग रहा था कि यह रास्ता खनक की असली उड़ान नहीं है।

इसी तलाश के दौरान उनके मन में सूफी संगीत का विचार आया-वह संगीत, जो मज़हब की सीमाओं से परे इंसान के दिल से बात करता है। मगर सूफी संगीत केवल सुरों की साधना नहीं है, उसमें उर्दू और फ़ारसी की गहराई, उनके शब्दों की रूह और उच्चारण की शुद्धता भी शामिल होती है। यही वह मोड़ था, जहाँ एक हिंदू परिवार ने बिना किसी झिझक के अपनी बेटी को मदरसे भेजने का फ़ैसला किया।

 

खनक मदरसे जाने लगी-बुर्के में। यह बुर्का किसी दबाव या सामाजिक डर की वजह से नहीं था, बल्कि इसलिए कि वह वहाँ पढ़ने वाली दूसरी लड़कियों से अलग न दिखे, किसी के लिए असहजता का कारण न बने। मदरसे में उसने उर्दू और फ़ारसी सीखी, उन भाषाओं की तह में छिपी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को समझा। आज वही खनक फ़ारसी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है और एक चर्चित फ़ारसी पुस्तक का अनुवाद भी कर रही है। ईरान के लोग उसकी फ़ारसी पर इतनी पकड़ देखकर उसे किताबें भेंट करते हैं।

लेकिन इन तमाम उपलब्धियों से बढ़कर एक बात यह है कि आज खनक जोशी देश की जानी-मानी सूफी सिंगर और नोहाख़ानी में माहिर एक पहचाना हुआ नाम बन चुकी है।

खनक का

जन्म महाराष्ट्र के शिरडी में हुआ, लेकिन उसकी जड़ें दिल्ली के दरियागंज से जुड़ी हैं। उसके पिता और दादा, दोनों ही ज्योतिष के क्षेत्र में जाने जाते रहे हैं। माँ कोमल जोशी के अनुसार, परिवार में आध्यात्म और धार्मिक सह-अस्तित्व की परंपरा हमेशा से रही है। खनक की शुरुआती पढ़ाई बेंगलुरु के ग्लोबल सिटी इंटरनेशनल स्कूल से हुई, जहाँ उसने बारहवीं तक शिक्षा प्राप्त की।

राजेश जोशी अपनी परवरिश को याद करते हुए बताते हैं कि उनका बचपन हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल रहा है। दरियागंज की जिस सड़क पर उनका घर था, उसके एक ओर हिंदू परिवार रहते थे, दूसरी ओर मुस्लिम। लेकिन कभी धर्म के नाम पर कोई खटास नहीं आई। इसी माहौल में खनक बड़ी हुई। वे हँसते हुए बताते हैं कि जब खनक बुर्के में मदरसे जाया करती थी, तो उनकी माँ मज़ाक में कहती थीं—“कुछ दिन बाद तू अपने नाम के आगे जोशी हटाकर ख़ान लगाने लगेगी।”

 

खनक की पहचान केवल उर्दू-फ़ारसी सीखने या मदरसे में पढ़ने तक सीमित नहीं रही। संगीत की दुनिया में उसे शंकर महादेवन जैसे दिग्गज कलाकारों का आशीर्वाद मिला। उसने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, सूफी संगीत, भजन, कव्वाली और ग़ज़ल,हर विधा में खुद को साधा। पंडित हरिकिशन पाहवा, उस्ताद गुलाम मुर्तुजा ख़ान नियाज़ी और उस्ताद तनवीर अहमद ख़ान जैसे गुरुओं से उसने संगीत की बारीकियाँ सीखी।

तीन साल की उम्र से संगीत सीखने वाली खनक ने इंटर-स्कूल, सिटी लेवल और नेशनल प्रतियोगिताओं में अनेक पुरस्कार जीते। ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन से लेकर देश-विदेश के कई मंचों पर उसने अपनी आवाज़ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। शंकर महादेवन एकेडमी द्वारा आयोजित वर्ल्ड-वाइड टैलेंट हंट प्रतियोगिता जीतने पर उसे न केवल स्कॉलरशिप मिली, बल्कि संगीत की निःशुल्क शिक्षा का अवसर भी।

खनक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपने देवी-देवताओं में आस्था रखने के साथ-साथ पैग़ंबर मोहम्मद साहब को भी उतनी ही श्रद्धा से मानती है। वह भजन भी उतने ही मन से गाती है, जितने समर्पण से कव्वाली और नोहाख़ानी। उसके पिता बताते हैं कि नोहाख़ानी करते-करते हज़रत हसन और हज़रत हुसैन कब उसके दिल में उतर गए, यह उन्हें भी पता नहीं चला।

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इमाम हुसैन और हज़रत अली की याद में होने वाली नोहाख़ानी के लिए जब भी खनक को बुलाया जाता है, तो वह आने-जाने के ख़र्च के अलावा कोई मेहनताना नहीं लेती। उसके लिए यह मंच प्रदर्शन नहीं, बल्कि इबादत है,एक ऐसी इबादत, जो इंसानियत के नाम होती है।

आज जब समाज धर्म और जाति के नाम पर बँटने की कगार पर खड़ा दिखाई देता है, तब खनक जोशी की कहानी यह याद दिलाती है कि संगीत, भाषा और संवेदना की कोई सरहद नहीं होती। वह सुरों के ज़रिए वह काम कर रही है, जो शायद बड़े-बड़े भाषण और नारे भी नहीं कर पाते,दिलों को जोड़ने का काम।

नए साल 2026 की इस शुरुआत में खनक जोशी की कहानी सिर्फ़ एक कलाकार की सफलता की दास्तान नहीं है, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहाँ विविधता टकराव नहीं, ताक़त बनती है; जहाँ मदरसा और मंदिर, भजन और कव्वाली, एक ही सुर में इंसानियत का राग गाते हैं। यही वह उम्मीद है, जिसके सहारे आने वाला साल और बेहतर, और ज्यादा मानवीय हो सकता है।