रोज़ा पेट का नहीं, दिल का होता है

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 10-03-2026
Fasting is not for the stomach, it is for the heart.
Fasting is not for the stomach, it is for the heart.

 

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समीर दि. शेख

रमज़ान का मुकद्दस महीना शुरू हो गया है। लेकिन इस महीने में एक बेचैन करने वाला सवाल खुद से ज़रूर पूछकर देखें। अगर आपने महीने भर रोज़ा रखा, रोज़ाना तरावीह की नमाज़ अदा की, कुरान की तिलावत की और फिर भी आपके अंदर कोई बदलाव नहीं आया तो?

हर साल लाखों लोग रोज़ा रखते हैं। लेकिन उनमें से कुछ ही लोग रूहानी बुलंदी तक पहुँच पाते हैं। कई लोग रमज़ान का चाँद दिखने से पहले जैसे होते हैं, वैसे ही महीने भर बाद भी रहते हैं। महान सूफी फ़लसफ़ी इब्न अरबी के मुताबिक, रोज़े का असली मतलब सिर्फ भूखा रहने में नहीं है। फर्क इस बात से नहीं पड़ता कि आप कितनी देर भूखे रहे, बल्कि फर्क इस बात से पड़ता है कि आपने अपने अंदर क्या और कितना साफ किया।

इब्न अरबी बताते हैं कि रमज़ान का मतलब सिर्फ जिस्म पर काबू पाना नहीं है। यह अपने 'नफ्स' (ख्वाहिशों और अना/गुरूर) का सामना करने का महीना है। यह मुकद्दस महीना एक आईना है और यह आपकी असली पहचान आपको दिखाता है।

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उन्होंने रोज़े के तीन दर्जे बताए हैं। पहला दर्जा है सिर्फ पेट का रोज़ा, जिसमें इंसान खाने और पानी से दूर रहता है। यह सबसे आम रोज़ा है। दूसरा दर्जा है अपने अंगों का रोज़ा। इसमें आँख, कान, हाथ और ज़ुबान को गुनाह करने से रोका जाता है। आपने खाने से मुँह बंद रखा, लेकिन क्या दूसरों की ग़ीबत करने से इसे बंद रखा? यह सवाल वह पूछते हैं।

तीसरा और सबसे आला दर्जा है दिल का रोज़ा। इसमें इंसान का दिल दुनिया और दुनिया की तमाम मोह-माया से अलग हो जाता है। वह सिर्फ परवरदिगार की याद में मगन रहता है। अगर आपका पेट खाली है लेकिन आपकी ज़ुबान दूसरों को ज़ख्मी कर रही है, तो आपने असल में किस चीज़ की पाकी हासिल की? पेट को भूखा रखा लेकिन दिल को  जलन से दूर नहीं रखा, तो वह रोज़ा अधूरा ही रहता है।

जब कोई आपकी बेइज़्ज़ती करता है और आपका दिल उसे करारा जवाब देने को करता है, तब उस गुस्से को पी जाना और खामोश रहना ही 'नफ्स' को हराना है। यह अंदर की जंग भूख से भी ज़्यादा मुश्किल होती है।

इब्न अरबी ने 'नीयत' के पाक होने पर बहुत ज़ोर दिया है। कोई भी इबादत सिर्फ एक बाहरी दिखावा होती है, उसकी असली रूह आपकी नीयत होती है।दो इंसान मस्जिद में कंधे से कंधा मिलाकर नमाज़ पढ़ रहे होंगे। लेकिन उनमें से एक अल्लाह के करीब जा रहा होता है और दूसरा वहीं खड़ा रहता है। क्योंकि एक का दिल खुदा को तलाश रहा होता है और दूसरा लोगों की वाहवाही पाना चाहता है।

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रमज़ान में इबादत बढ़ती है और उसके साथ ही 'दिखावा' करने का मौका भी बढ़ता है। हमने रोज़ा रखा है, हमने कुरान पूरा पढ़ लिया, हम कितने थक गए हैं, यह दुनिया को बताने का लालच इंसान को होता है।इब्न अरबी बहुत ही पते की बात कहते हैं कि हमारी इबादत हमारी सबसे कीमती दौलत है। और इसे लोगों से छुपाकर रखने में ही इसकी असली खूबसूरती छुपी है।

इस महीने में 'खामोशी' भी एक बड़ी इबादत है। रमज़ान सिर्फ खाना कम करने का महीना नहीं है, बल्कि यह हमारी ज़िंदगी का शोर कम करने का महीना है।इंसानी दिल एक आईने की तरह होता है। लगातार बोलना, बहस करना और हर बात पर रिएक्शन देने से इस आईने पर धूल जम जाती है।

जब आप अपना बोलना कम करते हैं, तब आपको अपने अंदर की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं। कोई आपको उकसाता है और आप उसे जवाब न देने का फैसला करते हैं, यही आपकी सच्ची इबादत होती है। नफ्स को शांत करने के लिए खामोशी एक बहुत बड़ा हथियार है।

अक्सर इबादत बढ़ने पर इंसान के मन में एक तरह का 'मज़हबी गुरूर' पैदा हो जाता है। हम दूसरों से ज़्यादा इबादत कर रहे हैं, यह खयाल मन में आता है।जो इंसान रोज़ा नहीं रखता या नमाज़ नहीं पढ़ता, उसे हम हिकारत से देखने लगते हैं। इब्न अरबी आगाह करते हैं कि यह मज़हबी गुरूर किसी खुले गुनाह से भी ज़्यादा भयानक होता है।

कोई गुनाह करने पर इंसान को पछतावा तो होता है। लेकिन गुरूर इंसान को खुद की ही नज़रों में महान बना देता है। सच्चा रोज़ा इंसान को आजिज़ बनाता है, मगरूर नहीं।रमज़ान दुनिया के लालच से दूर होने की तरबियत देने वाला महीना है। मोबाइल की लत, लोगों का ध्यान खींचने की आदत और हर वक्त के मनोरंजन से दूर रहने का यह एक बड़ा मौका है।

रोज़े के ज़रिए मिलने वाली भूख का एहसास परवरदिगार की एक बड़ी नेमत है। भूख हमें हमारी हदों का और खुदा पर हमारी निर्भरता का एहसास कराती है।दुनिया में ऐसे लाखों लोग हैं जिन्हें मजबूरी में यह भूख रोज़ाना सहनी पड़ती है। उनके दर्द का असली एहसास इसी महीने में होता है।

इफ्तार के वक्त जब पानी का पहला घूंट गले से नीचे उतरता है, तब मिलने वाला सुकून और दिल में शुक्रगुज़ारी का एहसास ही इस रोज़े का असली मतलब है।आखिर में इब्न अरबी एक बहुत ही अहम सवाल करते हैं। जब रमज़ान का महीना खत्म होगा और ईद का चाँद दिखेगा, तब क्या आप वैसे ही रहेंगे?

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यह महीना तीस दिनों तक भूखे रहने का रिवाज़ नहीं है, बल्कि अंदर से बदलने का एक मौका है। असली जीत इसमें नहीं है कि आपने रमज़ान में कितनी इबादत की। असली जीत इसमें है कि रमज़ान खत्म होने के बाद आप कैसे इंसान बने।

अगर ईद के दिन के बाद भी आपका सब्र, आपकी आजीज़ी और आपकी खुदा के लिए मोहब्बत कायम रही, तभी समझिए कि आपका रोज़ा सच्चे मायनों में काम आया।इस रमज़ान में सिर्फ भूखे मत रहिए, बल्कि खुद को अंदर से पाक और बेदार कीजिए। और एक नए व सच्चे रूहानी सफर की शुरुआत कीजिए।

(लेखक 'आवाज़ द वॉयस - मराठी' के संपादक हैं।)