आमिर इकबाल
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर पुलिस अधिकारी बनने तक का सफर तय करने वाले डीएसपी संतोष कुमार पटेल की कहानी सिर्फ संघर्ष और सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, गुरु-शिष्य परंपरा और हिंदू-मुस्लिम एकता की एक प्रेरणादायक मिसाल भी है। उनकी जिंदगी में एक मुस्लिम शिक्षक की छोटी-सी भूमिका ने ऐसा बदलाव ला दिया, जिसका असर तीन दशक बाद भी उतनी ही गहराई से महसूस किया जा सकता है। हाल ही में जब संतोष कुमार पटेल अपने पिता के साथ अपने पुराने शिक्षक हबीब मारसाब से मिलने पहुंचे, तो यह मुलाकात भावनाओं से भरी हुई थी और सोशल मीडिया पर भी लोगों के दिलों को छू गई।
संतोष कुमार पटेल आज मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के घाटीगांव में सब-डिविजनल पुलिस ऑफिसर (SDOP) के रूप में तैनात हैं। वे सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय रहते हैं और उनके लाखों फॉलोअर्स हैं। अपने वीडियो और पोस्ट के जरिए वे युवाओं को मेहनत, ईमानदारी और शिक्षा के महत्व के बारे में प्रेरित करते रहते हैं। लेकिन उनकी सफलता के पीछे संघर्ष से भरा बचपन और कुछ ऐसे लोगों का योगदान है, जिन्होंने सही समय पर उन्हें सही दिशा दिखाई।
संतोष का जन्म मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के अजयगढ़ तहसील के पास स्थित देवगांव नाम के छोटे से गांव में हुआ था। उनका परिवार बेहद गरीब था। पिता राजमिस्त्री का काम करते थे, जबकि मां खेतों में मजदूरी करके घर चलाने में मदद करती थीं। परिवार की आर्थिक हालत इतनी कमजोर थी कि बचपन एक छोटी-सी झोपड़ी में बीता, जहां बरसात के दिनों में छत टपकती थी और अक्सर किताबें भी भीग जाती थीं। कई बार घर में खाने के लिए पर्याप्त भोजन भी नहीं होता था। कभी चावल मिल जाता, तो कभी ज्वार की रोटी या दलिया खाकर ही दिन गुजर जाता था।
गरीबी के कारण बचपन से ही संतोष को परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाना पड़ता था। कभी वे जंगल से तेंदूपत्ता बीनकर लाते, कभी खेतों में मजदूरी करते और कई बार पिता के साथ ईंट ढोने का काम भी करते थे। लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद उनके मन में एक बात हमेशा साफ थी कि अगर जीवन बदलना है तो उसका रास्ता शिक्षा से होकर ही जाता है। यही सोच उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रही।
संतोष की जिंदगी में एक महत्वपूर्ण नाम है-हबीब मारसाब। करीब तीस साल पहले गांव में पढ़ाने आने वाले हबीब अली सर उन शिक्षकों में से थे, जो सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा की रोशनी दूर-दराज के गांवों तक पहुंचाने के लिए समर्पित थे। वे रोज साइकिल से 10 से 20 किलोमीटर का सफर तय करके बच्चों को पढ़ाने गांव आते थे। उस दौर में गांवों में शिक्षा की व्यवस्था बहुत कमजोर थी और बच्चों को स्कूल भेजना भी आसान काम नहीं था।
संतोष बताते हैं कि हबीब मारसाब ने उन्हें सीधे तौर पर पढ़ाया नहीं था, लेकिन उन्होंने एक ऐसा काम जरूर किया जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। गांव के कई बच्चे स्कूल जाने से कतराते थे और पढ़ाई को गंभीरता से नहीं लेते थे। ऐसे में हबीब सर अक्सर बच्चों को पकड़कर स्कूल ले जाते थे और समझाते थे कि पढ़ाई ही जिंदगी को बेहतर बना सकती है। संतोष भी उन बच्चों में शामिल थे जिन्हें उन्होंने कई बार स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया। शायद उस समय किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह छोटी-सी कोशिश आगे चलकर इतनी बड़ी प्रेरणा बन जाएगी।
हाल ही में संतोष कुमार पटेल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण अध्याय को लोगों के साथ साझा किया। उन्हें पता चला कि उनके पिता के पुराने गुरु और गांव के शिक्षक हबीब मारसाब, जो अब करीब 90 वर्ष के हो चुके हैं, अभी भी जीवित हैं और सतना में रहते हैं। यह खबर सुनकर संतोष भावुक हो गए और उन्होंने तुरंत अपने पिता के साथ उनसे मिलने जाने का फैसला किया।
जब वे सतना पहुंचे और हबीब मारसाब के घर गए, तो वहां का दृश्य बेहद भावुक कर देने वाला था। संतोष और उनके पिता ने सबसे पहले उनके चरण छूकर आशीर्वाद लिया। उस समय शाम का वक्त था और हबीब मारसाब नमाज पढ़ने और रोजा खोलने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने पुराने शिष्य और उसके बेटे को देखा, उन्होंने सब काम छोड़ दिया और दोनों के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दिया। यह पल केवल एक शिक्षक और शिष्य का मिलन नहीं था, बल्कि यह उस सम्मान और रिश्ते का प्रतीक था जो शिक्षा के माध्यम से पीढ़ियों को जोड़ता है।

संतोष बताते हैं कि उनके पिता ने भी बचपन में कुछ ही दिन स्कूल में पढ़ाई की थी। बाद में उन्हें पढ़ाई छोड़कर गाय चराने का काम करना पड़ा। लेकिन उन कुछ दिनों की पढ़ाई और हबीब मारसाब जैसे शिक्षकों के संपर्क ने उनके मन में शिक्षा के महत्व को हमेशा के लिए बैठा दिया। यही कारण था कि उन्होंने अपने बेटे संतोष को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया और हर संभव प्रयास किया कि वह आगे बढ़ सके।
हबीब मारसाब जैसे शिक्षक उस दौर में केवल पढ़ाने का काम नहीं करते थे, बल्कि वे समाज में जागरूकता और शिक्षा का दीप जलाने का भी काम करते थे। वे लंबी दूरी तय करके गांव-गांव जाते थे और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। उनके कई छात्र आगे चलकर शिक्षक बने, कुछ ने सरकारी नौकरियां हासिल कीं और कई लोगों ने अपने जीवन को बेहतर दिशा दी।
हबीब मारसाब से मुलाकात के बाद संतोष कुमार पटेल ने सोशल मीडिया पर एक भावुक संदेश भी लिखा। उन्होंने लिखा, “जाती और धर्म से ऊपर उठकर जो शिक्षा की ज्योति जलाए, वही सच्चा गुरु होता है।” उनके इस संदेश ने हजारों लोगों के दिलों को छू लिया। कई लोगों ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता और भारतीय संस्कृति की खूबसूरत मिसाल बताया।
दरअसल, संतोष की यह कहानी हमें यह भी बताती है कि सच्चे शिक्षक का कोई धर्म या जाति नहीं होती। उसका असली धर्म सिर्फ शिक्षा देना और समाज को बेहतर बनाना होता है। हबीब मारसाब जैसे शिक्षकों ने यही साबित किया कि अगर इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधनों के बावजूद समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
डीएसपी संतोष कुमार पटेल की यह कहानी हमें दो महत्वपूर्ण संदेश देती है। पहला, शिक्षा और मेहनत किसी भी गरीब बच्चे की जिंदगी बदल सकती है। अगर लगन और संकल्प हो तो कोई भी कठिन परिस्थिति सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती। दूसरा, इंसानियत और गुरु का सम्मान धर्म और जाति से कहीं ऊपर होता है।
आज के दौर में जब समाज में अक्सर धर्म और पहचान के नाम पर बहस और मतभेद देखने को मिलते हैं, तब संतोष और हबीब मारसाब की यह कहानी हमें भारत की उस असली पहचान की याद दिलाती है, जो आपसी सम्मान, साझा संस्कृति और भाईचारे पर आधारित है। यह कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज को जोड़ने और इंसानियत को मजबूत करने का सबसे बड़ा साधन भी है।