यूनुस ने कैसे दी मौत को मात ? 26 साल के लेखक को मिला राज्य पुरस्कार

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 11-03-2026
How did Yunus defeat death? The 26-year-old writer received the state award.
How did Yunus defeat death? The 26-year-old writer received the state award.

 

भक्ति चालक

क्या कठिनाइयाँ इंसान को तबाह करने आती हैं या उसे तराशने के लिए? अगर आप इस सवाल का जीता-जागत जवाब ढूंढना चाहते हैं, तो यूनुस सैय्यद की ओर देखिए। जब वे फर्ग्यूसन कॉलेज से मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रहे थे, तभी अचानक उनके जीवन में ब्लड कैंसर ने दस्तक दी। अगले एक साल तक मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में उनका इलाज चला। उस दौरान उन्हें 13 अलग-अलग बीमारियों से जूझना पड़ा।

दो बार तो उनकी हालत इतनी बिगड़ गई थी कि उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं बची थी। आईसीयू में उन्हें देखने वाले दोस्तों को लगा था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात होगी। हालाँकि, आज यूनुस ने मौत को मात दे दी है और हज़ारों मरीज़ों के लिए उम्मीद की किरण बन गए हैं। उनके इसी संघर्ष पर आधारित पुस्तक 'इनूची गोष्ट' (इनू की कहानी) को हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रतिष्ठित 'लक्ष्मीबाई तिलक पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है।

s

पुरस्कार से मिली नई ऊर्जा

पुरस्कार मिलने के बाद लेखक यूनुस सैय्यद ने अपनी खुशी जाहिर की। 'आवाज़-द वॉयस' से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जब पुरस्कार की घोषणा हुई, तब मैं कोंकण क्षेत्र—सिंधुदुर्ग, रत्नागिरी और रायगढ़ में कैंसर जागरूकता का काम कर रहा था।

एक जगह मैं चिकित्सा अधिकारियों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों के लिए 'पैलिएटिव केयर' (उपशामक देखभाल) केंद्रों और कैंसर रोगियों की देखभाल के तरीके पर एक सत्र ले रहा था। संयोग से, मैं लक्ष्मीबाई तिलक के गाँव के बहुत करीब एक गाँव में था, और यह पुरस्कार भी उन्हीं के नाम पर है। उनका ससुराल वहीं था। यह एक सुखद संयोग था कि मैं कैंसर जागरूकता का काम कर रहा था, जो कि मेरी किताब का मुख्य विषय भी है।"

अनुभवों से जन्मी 'इनूची गोष्ट'

कैंसर के इलाज के दौरान यूनुस को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। आम मरीजों के पास इलाज के भारी खर्च, उचित आहार, इंजेक्शन लगवाते समय बरती जाने वाली सावधानियों और पानी पीने के वैज्ञानिक तरीकों जैसी कई जानकारियों का अभाव होता है।

अक्सर कई चीजें कड़वे अनुभवों से सीखनी पड़ती हैं। यूनुस कहते हैं, "मुझे जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, उनके समाधान मैंने खुद ढूंढे। इस विचार के साथ कि मेरी यात्रा और अनुभव अन्य रोगियों को लाभ पहुँचाएं, मैंने एक डायरी लिखना शुरू किया।" बाद में यही डायरी एक किताब के रूप में बदल गई। चूंकि यूनुस का उपनाम 'इनू' है, इसलिए किताब का नाम 'इनूची गोष्ट' रखा गया और इसकी टैगलाइन 'अजून मी जिवंत आहे' (मैं अभी भी जीवित हूँ) रखी गई।

 

माँ का असीम त्याग और मुंबई का संघर्ष

यूनुस की इस यात्रा में उनकी माँ की सबसे बड़ी भूमिका रही। उन्होंने पुणे देखने के लिए कभी अपना गाँव तक नहीं छोड़ा था। लेकिन यूनुस के इलाज के लिए, वह सीधे मुंबई के एक झुग्गी वाले इलाके में कमरा किराए पर लेकर रहने लगीं।

यूनुस कहते हैं, "मेरी माँ का संघर्ष मेरे संघर्ष से कहीं बड़ा था। उन्होंने मुंबई की गर्मी, वहाँ का माहौल और मेरी बीमारी के कारण होने वाले निरंतर शारीरिक तनाव को पूरे एक साल तक सहा।" बीमारी के कारण बिस्तर पर पड़े रहने के दौरान, यूनुस पुरानी यादों को ताजा करते और उन्हें लिखते थे। अपनी माँ और उन दोस्तों से पूछकर, जो उस कठिन समय में उनके साथ थे, उन्होंने हर घटना को शब्दों में पिरोया।

केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि 'जीवन मार्गदर्शिका'

'इनूची गोष्ट' किताब सिर्फ कैंसर रोगियों तक ही सीमित नहीं रही है। एक ऐसे युवक की कहानी जो एक ही साल में 13बीमारियों से लड़ा और जीवित बचा, कई आम लोगों को भी प्रेरित कर रही है। महाराष्ट्र राज्य साहित्य और संस्कृति मंडल ने 80पुस्तकों में से इस पुस्तक का चयन किया।

महज 26 साल की उम्र में प्रौढ़ साहित्य श्रेणी में आत्मकथा के लिए राज्य पुरस्कार प्राप्त करना यूनुस को इस वर्ष का सबसे कम उम्र का साहित्यिक पुरस्कार विजेता बनाता है। विशेष रूप से, उन्होंने यह सफलता बिना किसी साहित्यिक या बड़े शैक्षिक बैकग्राउंड के, पूरी तरह से अपने अनुभव के बल पर हासिल की है।

यूनुस आगे बताते हैं, "मेरी किताब 2024के अंत में पुणे बुक फेस्टिवल में प्रकाशित हुई थी। प्रकाशन के बाद, इसे पुणे बुक फेस्टिवल से ही 'नवलेखक' पुरस्कार मिला। उसके बाद, यह किताब कई कैंसर रोगियों द्वारा पढ़ी जाने लगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले साल कैंसर दिवस पर मुझे टाटा मेमोरियल अस्पताल में अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था,वही अस्पताल जहाँ मेरा इलाज हुआ था—और वहीं इस किताब का अनौपचारिक विमोचन भी हुआ।"

g

कैंसर जागरूकता के लिए 'आरंभ'

यूनुस ने सिर्फ किताब लिखने तक ही रुकने का फैसला नहीं किया; उन्होंने 'आरंभ' नाम से एक एनजीओ की स्थापना की और सीधे क्षेत्र में उतर पड़े। वे कहते हैं, "यह मत सोचिए कि कैंसर होने पर जीवन खत्म हो गया है। वर्तमान में, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी जैसे अच्छे विकल्प मौजूद हैं।"

टाटा अस्पताल में उपचार प्रक्रिया पर उनके द्वारा बनाए गए एक वीडियो को हज़ारों लोगों ने देखा। उनमें से कई लोगों ने उनसे संपर्क किया और वास्तव में ढाई हज़ार लोग इलाज के लिए भर्ती हुए। आज उनमें से 85प्रतिशत से अधिक लोग सकारात्मक जीवन जी रहे हैं।