SpaceX जहां चूका, स्काईरूट पहली उड़ान में जीता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-07-2026
Where SpaceX fell short, Skyroot succeeded on its maiden flight.
Where SpaceX fell short, Skyroot succeeded on its maiden flight.

 

डॉ.अनिल कुमार निगम

18जुलाई 2026तारीख को इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गई है। हैदराबाद की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के विज्ञानियों ने अपने पहले ऑर्बिटल प्रक्षेपण यान विक्रम-1को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजकर अदभुत, अकल्‍पनीय एवं अविश्‍वसनीय सपने को साकार कर दिया है। इसने न केवल भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाई दी, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि भारतीय निजी उद्योग अब अंतरिक्ष विज्ञान जैसे अत्याधुनिक क्षेत्र में विश्व गुरू बनने की क्षमता रखता है।

सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण यह है कि अमेरिका की नामी निजी क्षेत्र की कंपनी स्‍पेस एक्‍स सहित  कई कंपनियों को जिस उपलब्धि तक पहुंचने में विश्व की अनेक निजी कंपनियों को कई प्रयास करने पड़े, उसे स्काईरूट ने अपने पहले ही ऑर्बिटल मिशन में झंडा गाड़कर ‘वंदे मातरम्’  का बिगुल फूंक दिया है।

यह मिशन केवल एक रॉकेट का प्रक्षेपण नहीं है, बल्कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आए नीतिगत परिवर्तन, स्टार्टअप संस्कृति, वैज्ञानिक नवाचार और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की अदभुत सफलता को दर्शाता है।श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित मिशन आगमन (Mission Aagaman) ने लगभग 450किलोमीटर की निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 6पेलोड सफलतापूर्वक स्थापित किए। प्रक्षेपण में लगभग 35मिनट की तकनीकी होल्ड के बावजूद मिशन ने सभी निर्धारित लक्ष्य पूरे किए।

इस सफलता के साथ भारत दुनिया का तीसरा देश बन गया, जहां किसी निजी कंपनी ने स्वयं विकसित ऑर्बिटल रॉकेट के माध्यम से उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया। इससे पहले यह क्षमता केवल अमेरिका और चीन के निजी क्षेत्र के पास थी। यह उपलब्धि भारत को वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के विशिष्ट समूह में स्थापित करती है।

यहां बताना उचित रहेगा कि अमेरिका की स्‍पेस एक्‍स (SpaceX) जैसी आज की विश्व की सबसे सफल निजी अंतरिक्ष कंपनी भी अपने पहले तीन ऑर्बिटल प्रयासों-2006, 2007और 2008  में असफल रही थी। उसे पहली सफलता 28सितंबर 2008को चौथे प्रयास में मिली।

न्‍यूजीलैंड की रॉक लैब (Rocket Lab) कंपनी को 2017में अपने पहले प्रयास में असफलता मिली और 2018में दूसरे प्रयास में सफलता मिली। जबकि Firefly Aerospace, Virgin Orbit, Astra और ABL Space Systems जैसी अमेरिकी कंपनियां भी पहले प्रयास में सफल नहीं हो सकीं।  चीन की प्रमुख निजी कंपनी लैंड स्‍पेस (LandSpace) भी 2018में अपने पहले ऑर्बिटल मिशन में असफल रही थी।

स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी की स्थापना वर्ष 2018में युवा वैज्ञानिक पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने इसरो की नौकरी छोड़कर की थी। मात्र आठ वर्षों के भीतर कंपनी ने भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विकसित कर इतिहास रच दिया। इससे पहले 2022में कंपनी ने विक्रम-एस के सफल सब-ऑर्बिटल परीक्षण से अपनी तकनीकी क्षमता का परिचय दिया था। आज स्काईरूट भारत का पहला स्पेस-टेक यूनिकॉर्न भी बन चुका है।

विक्रम-1भारतीय इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें 3-डी प्रिंटेड इंजन, उन्नत कंपोजिट संरचना और स्वदेशी प्रणोदन तकनीक का उपयोग किया गया है। यह रॉकेट छोटे उपग्रहों के तीव्र और कम लागत वाले प्रक्षेपण के लिए विकसित किया गया है, जो भविष्य के वैश्विक अंतरिक्ष बाजार की सबसे बड़ी आवश्यकता मानी जा रही है।

इस सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्काईरूट ने अपने पहले ही ऑर्बिटल प्रयास में सफलता प्राप्त की। अंतरिक्ष प्रक्षेपण विज्ञान अत्यंत जटिल माना जाता है। स्काईरूट की पहली ही उड़ान का सफल होना भारतीय वैज्ञानिकों की डिजाइन क्षमता, परीक्षण प्रणाली और गुणवत्ता नियंत्रण का प्रमाण है।

भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी उद्योग के लिए खोलने का निर्णय आज ऐतिहासिक सिद्ध हो रहा है। इन-स्‍पेस (IN-SPACe) की स्थापना और सरकार की नई अंतरिक्ष नीति के परिणामस्वरूप आज भारत में 300से अधिक स्पेस स्टार्टअप कार्यरत हैं। इन स्टार्टअप्स ने उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं, पृथ्वी अवलोकन, अंतरिक्ष डेटा विश्लेषण और रक्षा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक पहचान बनाई है।

भारत का वर्तमान अंतरिक्ष उद्योग लगभग 8अरब डॉलर का है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2033तक इसे बढ़ाकर 44अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का टर्नओवर 600अरब डॉलर से अधिक का हो चुका है और छोटे उपग्रहों के बाजार में तेजी से बढ़ोत्‍तरी हो रही है। स्काईरूट जैसी कंपनियां भारत को इस वैश्विक बाजार का महत्वपूर्ण भागीदार बना सकती हैं।

महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि विक्रम-1की सफलता का प्रभाव केवल अंतरिक्ष विज्ञान तक सीमित नहीं रहेगा। इससे उच्च प्रौद्योगिकी विनिर्माण, रक्षा अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स, सामग्री विज्ञान और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को भी नई गति मिलेगी। हजारों उच्च कौशल वाले रोजगार सृजित होंगे तथा भारत वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाओं का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट की सफलता को भारत के युवाओं और निजी क्षेत्र पर विश्वास की जीत बताया और यह भी कहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने का निर्णय आज सही साबित हुआ है। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल इसरो तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निजी उद्योग उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनेगा।

विक्रम-1की उड़ान वस्तुतः आत्मनिर्भर भारत की उड़ान है। यह उपलब्धि बताती है कि भारत अब केवल अंतरिक्ष मिशनों में भाग लेने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। यदि यही गति बनी रही, तो आने वाले दशक में भारत छोटे उपग्रह प्रक्षेपण, अंतरिक्ष सेवाओं और स्पेस-टेक नवाचार का वैश्विक केंद्र बन सकता है।

स्काईरूट की यह सफलता भारतीय विज्ञान, उद्योग और युवाओं के आत्मविश्वास की ऐसी उड़ान है, जिसने पूरे विश्व को यह संदेश दिया है कि भारत अब अंतरिक्ष में केवल पहुंच ही नहीं रहा, बल्कि नेतृत्व करने की तैयारी भी कर चुका है।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार है।)