ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
22 जुलाई को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय आम दिवस दुनिया भर में आम के इस अनमोल फल की लोकप्रियता, विविधता और सांस्कृतिक महत्व को याद करने का अवसर देता है। भारत जैसे देश में, जहां आम को केवल एक फल नहीं बल्कि भावनाओं, परंपराओं और खेती की विरासत से जोड़कर देखा जाता है, वहां कुछ किसानों ने अपने अद्भुत प्रयोगों से आम की दुनिया को नई पहचान दी है। उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद के हाजी कलीम उल्लाह खान और गुजरात के अमरेली जिले के दितला गांव के उकाभाई भट्टी ऐसे ही दो किसान हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, धैर्य और अनोखी सोच से साबित कर दिया कि खेती केवल परंपरा नहीं, बल्कि नवाचार का क्षेत्र भी है।
एक तरफ उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद में एक ऐसा विशाल आम का पेड़ है, जिस पर 300 से अधिक किस्मों के आम उगते हैं। दूसरी तरफ गुजरात के अमरेली जिले में एक ऐसा पेड़ है, जिसकी शाखाओं पर 14 अलग-अलग किस्मों के आम फल रहे हैं। दोनों पेड़ केवल कृषि प्रयोग नहीं हैं, बल्कि भारतीय किसानों की प्रतिभा, प्रकृति के प्रति समझ और वर्षों की तपस्या के जीवंत उदाहरण बन चुके हैं।
मलिहाबाद का जादुई पेड़: एक पेड़ पर 300 से ज्यादा किस्मों के आम
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से कुछ दूरी पर स्थित मलिहाबाद दुनिया भर में अपने दशहरी आम के लिए प्रसिद्ध है। इसी आम की धरती पर रहने वाले हाजी कलीम उल्लाह खान ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसकी चर्चा देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंच चुकी है। उनके बाग में मौजूद एक विशाल आम का पेड़ किसी प्राकृतिक अजूबे से कम नहीं है। सामान्य तौर पर एक आम के पेड़ पर एक ही किस्म के फल लगते हैं, लेकिन कलीम उल्लाह खान के इस पेड़ की हर शाखा अपनी अलग कहानी कहती है। इस पेड़ पर 300 से ज्यादा किस्मों के आम उगते हैं। अलग-अलग शाखाओं पर अलग रंग, आकार, स्वाद और खुशबू वाले आम दिखाई देते हैं।
गर्मियों के मौसम में जब यह पेड़ फलों से भर जाता है तो यह किसी जीवंत आम प्रदर्शनी जैसा दिखाई देता है। कोई आम मीठा और रसदार होता है, तो कोई अपने अनोखे स्वाद और आकार के लिए पहचाना जाता है। इस पेड़ को देखने के लिए देश-विदेश से लोग मलिहाबाद पहुंचते हैं और हाजी कलीम उल्लाह खान के इस प्रयोग को देखकर हैरान रह जाते हैं।
आमों के बादशाह हाजी कलीम उल्लाह खान की कहानी
हाजी कलीम उल्लाह खान को दुनिया भर में “आमों के बादशाह” के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि उन्होंने यह उपलब्धि किसी बड़े कृषि संस्थान की डिग्री या आधुनिक प्रयोगशाला के सहारे हासिल नहीं की, बल्कि अपने अनुभव, मेहनत और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर हासिल की। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें देश और विदेश में लगभग 300 से अधिक पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं।
कलीम उल्लाह खान का मलिहाबाद से गहरा भावनात्मक रिश्ता है। वे इस क्षेत्र को केवल खेती की जमीन नहीं बल्कि एक पवित्र भूमि मानते हैं। उनका कहना है कि मलिहाबाद की मिट्टी में एक खास शक्ति है, क्योंकि यह क्षेत्र संतों, सूफियों और साहित्यिक हस्तियों से जुड़ा रहा है। प्रसिद्ध उर्दू कवि जोश मलीहाबादी भी इसी क्षेत्र से जुड़े थे। उनका मलिहाबाद से लगाव इतना गहरा है कि उन्होंने दूसरे स्थानों पर मिलने वाले अवसरों को भी स्वीकार नहीं किया। उनके लिए यह जमीन केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान है।
सातवीं कक्षा के बाद शुरू हुआ सफर, बना दुनिया में मिसाल
हाजी कलीम उल्लाह खान का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई और सातवीं कक्षा में असफल होने के बाद परिवार की नर्सरी में काम करना शुरू कर दिया। यही नर्सरी उनके लिए सबसे बड़ी पाठशाला बनी। पौधों की देखभाल करते हुए उनके मन में एक सवाल आया कि आखिर एक ही पेड़ पर अलग-अलग किस्मों के आम क्यों नहीं उगाए जा सकते? इसी सवाल ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
उन्होंने ग्राफ्टिंग यानी कलम लगाने की तकनीक के जरिए एक पेड़ पर कई किस्मों के आम उगाने का प्रयोग शुरू किया। शुरुआती प्रयास असफल रहे। 1957-58 के आसपास उन्होंने पहली बार एक पेड़ पर सात किस्मों की शाखाएं जोड़ने का प्रयास किया, लेकिन वह पेड़ जीवित नहीं रह सका। लेकिन पेड़ भले सूख गया, उनका सपना नहीं सूखा।
उन्होंने लगातार प्रयोग जारी रखे। वर्षों तक उन्होंने पेड़ों की प्रकृति, मिट्टी, मौसम और किस्मों को समझा। इस दौरान उन्होंने कठिन मेहनत की। कई बार उनके हाथों में छाले पड़े, उन्होंने खेतों में दिन-रात काम किया और आम की खेती से जुड़ा हर छोटा-बड़ा काम खुद सीखा। उनकी मेहनत का परिणाम आज पूरी दुनिया के सामने है।
आम की किस्मों को दिए प्रसिद्ध लोगों के नाम
हाजी कलीम उल्लाह खान का एक खास अंदाज यह भी है कि वे अपनी विकसित की गई आम की किस्मों के नाम प्रसिद्ध हस्तियों के नाम पर रखते हैं। उन्होंने राजनीति, फिल्म और खेल जगत की कई बड़ी हस्तियों के नाम पर आम की किस्में तैयार की हैं। उनका मानना है कि महान लोगों के नाम पीढ़ियों तक याद रहते हैं और इसी तरह उनकी बनाई गई आम की किस्में भी लंबे समय तक जीवित रहनी चाहिए। वे अपनी किस्मों के जरिए केवल नया स्वाद नहीं तैयार करना चाहते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आम की विरासत को सुरक्षित रखना चाहते हैं।
गुजरात के दितला गांव में 14 किस्मों वाला अनोखा आम का पेड़
उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद की तरह गुजरात के अमरेली जिले का दितला गांव भी अब एक अनोखे आम के पेड़ के कारण चर्चा में है। यहां किसान उकाभाई भट्टी ने एक ऐसे पेड़ को तैयार किया है, जिस पर आम की 14 अलग-अलग किस्में फल देती हैं। पहली नजर में यह पेड़ सामान्य आम के पेड़ जैसा दिखाई देता है, लेकिन जैसे ही इसकी शाखाओं को ध्यान से देखा जाता है, इसकी असली खासियत सामने आती है।
किसी शाखा पर केसर आम लटकता है तो किसी पर अल्फांसो। कहीं लंगड़ा और दशहरी नजर आते हैं तो कहीं अम्रपाली, बादामी, गुलाबी, रसबरी, जमादार, काला जमादार, हापुस और टोटापुरी जैसी किस्में दिखाई देती हैं। हर आम का स्वाद, रंग, आकार और खुशबू अलग होती है। यही कारण है कि यह पेड़ भी किसानों और आम प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।
उकाभाई भट्टी का 25 साल का प्रयोग
दितला गांव के रहने वाले उकाभाई भट्टी एक प्रगतिशील किसान हैं, जिन्हें खेती और बागवानी में हमेशा से रुचि रही है। करीब 25 साल पहले उनके मन में विचार आया कि क्यों न एक ही पेड़ पर अलग-अलग किस्मों के आम उगाए जाएं। उनका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं था, बल्कि आम की अलग-अलग किस्मों को एक साथ संरक्षित करना भी था।
उन्होंने पारंपरिक ग्राफ्टिंग तकनीक “खुटा कलम” का सहारा लिया। इस तकनीक में अलग-अलग पेड़ों की शाखाओं को एक मजबूत मूल पेड़ से जोड़ा जाता है। समय के साथ ये शाखाएं उसी पेड़ का हिस्सा बन जाती हैं और उनमें अलग-अलग किस्मों के फल आने लगते हैं। यह काम आसान नहीं था। कई बार शाखाएं सूख गईं, कई प्रयोग असफल हुए, लेकिन उकाभाई ने धैर्य नहीं छोड़ा। लगातार प्रयासों के बाद आज उनका पेड़ 14 अलग-अलग किस्मों के आम देने लगा है।
दोनों किसानों की सोच एक, रास्ते अलग
हाजी कलीम उल्लाह खान और उकाभाई भट्टी की कहानियां अलग-अलग राज्यों से आती हैं, लेकिन दोनों की सोच एक जैसी है। दोनों किसानों ने यह साबित किया कि खेती केवल पुराने तरीकों पर निर्भर रहने का नाम नहीं है। अगर किसान नई सोच, प्रयोग और धैर्य के साथ काम करे तो खेत भी नई खोजों की प्रयोगशाला बन सकते हैं। कलीम उल्लाह खान ने जहां एक पेड़ पर 300 से ज्यादा किस्मों का संसार तैयार कर दिया, वहीं उकाभाई भट्टी ने एक पेड़ पर 14 किस्मों का अनोखा बगीचा खड़ा कर दिया।
दुर्लभ किस्मों को बचाने की कोशिश
दोनों किसानों के प्रयास केवल रिकॉर्ड बनाने तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे एक बड़ा उद्देश्य आम की दुर्लभ किस्मों को बचाना भी है। हाजी कलीम उल्लाह खान का कहना है कि पुराने समय में मलिहाबाद में आम की लगभग 1300 किस्में उगाई जाती थीं, लेकिन समय के साथ कई किस्में खत्म हो गईं। वहीं उकाभाई भट्टी भी मानते हैं कि अलग-अलग किस्मों को संरक्षित करना जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां इन स्वादों से परिचित रह सकें। विशेषज्ञों के अनुसार ग्राफ्टिंग जैसी तकनीक के जरिए कई दुर्लभ किस्मों को बचाया जा सकता है और एक ही पेड़ पर कई प्रकार के फल उगाए जा सकते हैं।
राष्ट्रीय आम दिवस पर इन किसानों की कहानी क्यों खास है
22 जुलाई को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय आम दिवस केवल एक फल का उत्सव नहीं है, बल्कि उन किसानों के सम्मान का अवसर भी है जो अपनी मेहनत से कृषि की सीमाओं को आगे बढ़ाते हैं। हाजी कलीम उल्लाह खान और उकाभाई भट्टी जैसे किसान दिखाते हैं कि खेती में सफलता केवल जमीन और संसाधनों से नहीं आती, बल्कि कल्पना, धैर्य और प्रयोग करने की क्षमता से भी आती है। एक किसान ने एक पेड़ को 300 किस्मों की दुनिया बना दिया, तो दूसरे ने एक पेड़ पर 14 स्वादों का संसार खड़ा कर दिया। इन दोनों की कहानियां भारत की कृषि परंपरा, वैज्ञानिक सोच और किसानों की रचनात्मक शक्ति का प्रमाण हैं। आज जब दुनिया आम के स्वाद का आनंद ले रही है, तब ऐसे किसान याद दिलाते हैं कि हर फल के पीछे किसी किसान की मेहनत, सपना और वर्षों का संघर्ष छिपा होता है।