वारी में रंगों से भक्ति जगाने वाले ज़हीर मिर्ज़ा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-07-2026
Zaheer Mirza: Evoking devotion through colors in the Wari
Zaheer Mirza: Evoking devotion through colors in the Wari

 

भक्ति चालक

आजकल पूरा महाराष्ट्र भगवान विट्ठल की भक्ति में डूबा हुआ है। मंजीरों की खनक और हरिनाम की गूंज के साथ आषाढ़ी 'वारी' (पंढरपुर की सालाना पैदल तीर्थयात्रा) का कारवां आगे बढ़ रहा है। इस साल की आषाढ़ी वारी में लाखों 'वारकरियों' (तीर्थयात्रियों) के साथ एक अजीब और मस्तमौला शख्स भी चल रहा था, जिसके हाथों में मंजीरे नहीं, बल्कि रंगों के ब्रश और कैनवास थे।

सफेद धोती, उजला कुर्ता, सिर पर सफेद टोपी और माथे पर चंदन लगाकर ज़हीर मिर्ज़ा वारी में शामिल हुए। वह सिर्फ शामिल ही नहीं हुए, बल्कि उन्होंने एक बहुत ही खास काम किया। वारी के रास्ते पर उन्होंने वारकरियों के सामने एक बड़ा कैनवास और रंग रख दिए। फिर क्या था, वारकरियों ने मिलकर उस कैनवास पर अपने मनपसंद रंग भर दिए। ज़हीर ने अपने 'ओपन ईज़ल' (Open Easel) नाम के इस अनोखे अभियान के ज़रिए वारकरियों के अंदर छुपी कला को बाहर आने का रास्ता दिया।

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ज़हीर मिर्ज़ा ने 'आवाज़-द-वॉयस' से खास बातचीत की। ओपन ईज़ल के विचार के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "ओपन ईज़ल लोगों तक कला को पहुंचाने का एक ज़रिया है। मैं भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अपना कैनवास लगा देता हूं और लोगों से कहता हूं कि वे रंगों के ज़रिए अपने जज़्बात बयान करें। इसी अभियान के ज़रिए मैंने इस साल महाराष्ट्र के सबसे बड़े लोक उत्सव 'वारी' में शामिल होने का फैसला किया था।"

वारी के इस तजुर्बे को बताते हुए ज़हीर जज़्बाती हो गए। उन्होंने कहा, "वारी के इस अभियान ने मेरा दिल बदल दिया। वारी में आने वाले लोग बहुत सीधे-सादे थे। कोई किसान था, कोई बढ़ई का काम करता था, तो किसी के पास एक छोटी सी नौकरी भी नहीं थी। लेकिन सबने मिलकर एक बेहद खूबसूरत कलाकृति (पेंटिंग) बनाई। यह सब विट्ठल माउली की ही कृपा है।"

वह आगे कहते हैं, "वारी से लौटकर जब मैंने घर पर बैठकर उस कैनवास को देखा, तो मेरी आंखें भर आईं। खेतों में पसीना बहाने वाले इन हाथों में इतनी बेमिसाल कला और भक्ति हो सकती है, यह देखकर मैं हैरान रह गया।"

सासवड में वारी के दौरान उन्होंने यह अभियान चलाया था। उन्होंने वे सारे पल अपने कैमरे में कैद कर लिए। उनके इन वीडियोज़ को सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त रिस्पॉन्स मिला। एक बुज़ुर्ग वारकरी महिला पेंटिंग करते हुए विट्ठल नाम में इतनी मगन हो गई कि उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उस वक्त ज़हीर भी जज़्बाती हो गए।

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आम लोगों तक पहुंचने का ज़रिया है कला

असल में मुंबई के रहने वाले ज़हीर मिर्ज़ा मशहूर 'जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स' के फाइन आर्टिस्ट हैं। उन्होंने विज्ञापन की दुनिया में बहुत बड़ा नाम कमाया है। उन्होंने 'लिंटास' और 'जेडब्ल्यूटी' (JWT) जैसी देश की सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसियों में बड़े पदों पर काम किया है। इतना ही नहीं, कुछ वक्त तक वह साउथ-ईस्ट एशिया के क्रिएटिव हेड के तौर पर भी काम देख रहे थे।

ज़हीर ने अपनी खुद की विज्ञापन एजेंसी भी बनाई थी। लेकिन कुछ वजहों से उन्होंने उसे एक जापानी कंपनी को बेच दिया। पैसा, शोहरत और चकाचौंध जब सब कुछ उनके कदमों में था, तब 60 साल की उम्र में उन्होंने ज़िंदगी की दूसरी पारी शुरू की। कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए ब्रांड बनाने के बजाय, उन्होंने समाज को कुछ वापस देने का फैसला किया।

ज़हीर जिस कॉलेज में पढ़े थे, वहीं उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया। 2019 में जे जे इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लाइड आर्ट में वह चित्रकला सिखाने लगे। वहां अपने छात्रोंको साथ लेकर उन्होंने समाज की भलाई के लिए कुछ काम करने का फैसला किया।

ज़हीर और उनके युवा साथियों ने देखा कि आज की नौजवान पीढ़ी सोशल मीडिया में बहुत ज़्यादा मशगूल है। इसी बात को समझते हुए, वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके बिल्कुल आम इंसान तक पहुंचना चाहते थे। वे अपनी कला सबके सामने रखना चाहते थे।

इसी मकसद को ध्यान में रखते हुए ज़हीर ने मार्च के महीने में 'ओपन ईज़ल' नाम का अभियान शुरू किया। इसका मकसद यह था कि आम इंसान बिना किसी डर के कैनवास पर अपनी पसंद के रंग बिखेरे। उन्होंने यह अभियान मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, रायपुर, पुणे जैसे कई शहरों में चलाया।

कैसे हुई कला से दोस्ती?

ज़हीर के बचपन की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। उस दौर में बच्चों के पास साइंस या कॉमर्स लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता था। लेकिन ज़हीर का पढ़ाई से ज़्यादा चित्रकला में दिल लगता था। वह कहते हैं, "मेरी स्कूल की कॉपियों में कभी पढ़ाई के नोट्स नहीं होते थे, वहां सिर्फ चित्र होते थे। इसलिए मेरे वालिद मुझे बहुत डांटते थे। मैंने कभी एलीमेंट्री या इंटरमीडिएट का इम्तिहान नहीं दिया, क्योंकि मुझे किसी से मुकाबला नहीं करना था। मुझे सिर्फ अपनी खुशी के लिए तस्वीरें बनानी थीं।"

भले ही ज़हीर का जन्म मुंबई में हुआ था, लेकिन वालिद की नौकरी में ट्रांसफर की वजह से उन्होंने 10वीं और 12वीं की पढ़ाई बेलगाम में पूरी की। उसके बाद वहीं पर मजबूरी में डेढ़-दो साल साइंस की पढ़ाई की। लेकिन वहां उनका दिल बिल्कुल नहीं लगा। आखिरकार वह बेलगाम से वापस मुंबई आ गए। उनके हुनर की वजह से उन्हें जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला मिल गया और उनकी ज़िंदगी ही बदल गई।

विज्ञापन की दुनिया में ज़हीर ने बहुत बड़ा काम किया। 'बजाज आंवला', 'सर्फ एक्सेल', 'जेट एयरवेज़' और 'इंडियन नेवी' जैसे बड़े ब्रांड्स के लिए उन्होंने विज्ञापन बनाए। उनके बनाए विज्ञापन बहुत मशहूर हुए। विज्ञापन की दुनिया में कहानी कहने का हुनर बहुत अहम होता है, और ज़हीर के पास वही बेमिसाल सोच है।

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'आर्ट इंटेलिजेंस' पर है पूरा भरोसा

आजकल पूरी दुनिया पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का जादू छाया हुआ है। लेकिन ज़हीर ने इस शब्द से 'आर्टिफिशियल' यानी बनावटी हिस्से को निकाल फेंका है। वह 'आर्ट इंटेलिजेंस' (Art Intelligence) के विचार को बढ़ावा दे रहे हैं। इस बारे में वह कहते हैं, "आर्ट इंटेलिजेंस का मतलब है इंसानी समझ। यह समझ कंप्यूटर या किसी मशीन को कभी नहीं मिल सकती। आज से हज़ारों साल बाद भी मशीन इंसान की जगह नहीं ले सकेगी, क्योंकि मशीन में इंसानी जज़्बात नहीं होते।"

ज़हीर आगे कहते हैं, "अगर देश में नई चीजें बनानी हैं, तो कला की तालीम बहुत ज़रूरी है। ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों को कला की तालीम देना ही मेरा मकसद है। मैं अपनी बाकी की ज़िंदगी इसी काम में लगाने वाला हूं।"

देश के मुस्तकबिल के बारे में ज़हीर कहते हैं, "अगर देश का मुस्तकबिल बदलना है, तो सिर्फ दो ही चीज़ों पर ज़ोर देना चाहिए। पहली है हमारी Education System और दूसरा है मां-बाप का बच्चों की परवरिश करने का तरीका। हमें इन दोनों चीज़ों को एक अलग नज़रिए से देखना चाहिए। अगर ये दो चीज़ें बदल गईं, तो सब कुछ बदल जाएगा।"