आवाज द वाॅयस / नई दिल्ली
"पर्सनल इज़ पॉलिटिकल" (निजी ही राजनीतिक है) के उसूल को अपनी ज़िंदगी से साबित करने वाली ज़किया सोमन। पितृसत्ता के ज़रिए निकाले गए मज़हब के अपने हिसाब वाले मायनों को नकार कर, कुरान और संविधान दोनों की बुनियाद पर बराबरी की नई इबारत लिखने वाली और तीन तलाक की बेड़ियों से मुस्लिम औरतों को आज़ाद कराने में एक बड़ा किरदार निभाने वाली 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' की सह-संस्थापक ज़किया सोमन के बारे में...
किसी औरत की ज़िंदगी में कोई तूफान आता है और वह उसमें तबाह हो जाती है, यह तस्वीर हमारे लिए कोई नई नहीं है। लेकिन उस तूफान को ही अपनी ताकत बनाकर, हज़ारों औरतों की ज़िंदगी का अंधेरा दूर करने के मकसद से मैदान में उतरना कोई आसान काम नहीं है। यह कर दिखाने वाली एक बेहद निडर शख्सियत का नाम है ज़किया सोमन। 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' (BMMA) की को-फाउंडर के तौर पर काम करते हुए वह देश की मुस्लिम औरतों के हक़ की नई परिभाषा लिख रही हैं।
ज़किया सोमन मूल रूप से गुजरात की रहने वाली हैं। उनकी पैदाइश एक बेहद आला तालीम-याफ्ता (उच्च शिक्षित) और तरक्कीपसंद ख्यालात वाले परिवार में हुई। उनके वालिद (पिता) एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जबकि वालिदा (मां) हाई स्कूल में टीचर थीं। खास बात यह है कि उनकी नानी उस दौर में अपने ताल्लुका (इलाके) में मैट्रिक पास करने वाली पहली खातून (महिला) थीं और वह भी एक स्कूल में हेडमिस्ट्रेस थीं।

ऐसे खुले और तरक्कीपसंद माहौल में पली-बढ़ीं ज़किया ने 21 साल की उम्र में लव मैरिज की। उनके शौहर भी आला तालीम-याफ्ता थे। लेकिन तालीम का मतलब तहज़ीब या अच्छा बर्ताव नहीं होता, इस बात का एहसास उन्हें शादी के बाद हुआ। एक तरफ वह गुजरात यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर बन गईं, लेकिन दूसरी तरफ घर के अंदर वह जिस्मानी, ज़हनी और आर्थिकज़ुल्मों का सामना कर रही थीं।
चूंकि यह एक लव मैरिज थी, इसलिए इसे निभाने की ज़िम्मेदारी भी खुद की ही है, इस दबाव में उन्होंने 16 सालों तक उस ज़ुल्म को बर्दाश्त किया। उनका 14 साल का बेटा भी इस ज़ुल्म को सह रहा था।
आगे चलकर ज़किया की ज़िंदगी को असली मोड़ 2002 के गुजरात दंगों के वक्त मिला। तब तक वह किसी भी सामाजिक आंदोलन में एक्टिव नहीं थीं। दंगों में तबाह हुए लोगों की मदद करने के लिए वह अहमदाबाद के एक रिलीफ कैंप में जाने लगीं। वहां के हालात ने उन्हें अंदर तक हिला कर रख दिया। घर जल चुके थे, परिवार बिखर गए थे और भविष्य की कोई गारंटी नहीं थी। लेकिन ऐसे खौफनाक माहौल में भी वह मुस्लिम औरतें जिस हौसले के साथ खड़ी हो रही थीं, उसने ज़किया को खुद के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।
मुसलमान, और उसमें भी अगर वे गरीब हों, तो वे कितने असुरक्षित होते हैं, इसका एहसास ज़किया को वहां हुआ। रिलीफ कैंप में सातवीं-आठवीं पास उन आम औरतों को जिस हिम्मत के साथ अपनी टूटी हुई ज़िंदगी को दोबारा संवारते हुए देखा, तो ज़किया को अपनी ज़िंदगी का ज़ुल्म और भी ज़्यादा नाइंसाफी लगने लगा। वह सोचने लगीं, "मेरे पास तालीम है, मैं आर्थिक रूप से आज़ाद हूँ, फिर भी मैं यह ज़ुल्म क्यों सह रही हूँ?" कैंप की उन औरतों ने अनजाने में ही ज़किया को एक बड़ी प्रेरणा और हिम्मत दी। उसके फौरन बाद 2003 में उन्होंने उस ज़ुल्म भरे रिश्ते से बाहर निकलने का एक बड़ा और साहसी फैसला लिया।

इस तरह अपने खुद के तजुर्बे की आग में तपकर निकलने के बाद ज़किया ने अपनी बाकी की ज़िंदगी मुस्लिम औरतों के हक़ के लिए वक्फ (समर्पित) करने का फैसला किया। आगे चलकर गुजराती ज़किया की कर्मभूमि मुंबई बन गई। जनवरी 2007 में उन्होंने और नूरजहां सफिया नियाज़ ने मिलकर 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' (BMMA) नाम की संस्था की शुरुआत की। इस तरह 'पर्सनल इज़ पॉलिटिकल' का नारीवादी उसूल उनकी ज़िंदगी में हकीकत बनकर उतर आया।
ज़किया का मानना है कि, "मुस्लिम औरतों को इंसाफ चाहिए, और उसे हासिल करने के लिए उन्हें अपना मज़हब छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है।" उन्होंने कुरान और संविधान, दोनों पैमानों पर औरतों के हक़ की बात रखनी शुरू की। आज BMMA संस्था देश के 15 से ज़्यादा राज्यों में फैल चुकी है। इतना ही नहीं, एक लाख से ज़्यादा मुस्लिम औरतें इस तहरीक से जुड़ चुकी हैं। ज़किया बताती हैं, "नाइंसाफी क्या होती है, गरीबी क्या होती है और भेदभाव के खिलाफ कैसे खड़ा होना चाहिए, यह मैंने किसी यूनिवर्सिटी में नहीं, बल्कि 40 साल की उम्र में इन औरतों के साथ काम करते हुए सीखा।"
BMMA के इतिहास का सबसे सुनहरा पन्ना 'ज़बानी तीन तलाक' के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई है। उन्होंने दुनिया को यह दिखाया कि तीन तलाक की रवायत न सिर्फ कुरान के खिलाफ है, बल्कि यह मानवाधिकारों का भी खुला उल्लंघन है।
इस लड़ाई के ज़रिए उन्होंने दुनिया को डंके की चोट पर बताया कि मुस्लिम औरतें भी इस देश की बराबर की नागरिक हैं। BMMA का यह रुख काफी मशहूर हुआ कि, "हमें इंसाफ चाहिए, और वह कुरान और संविधान दोनों की रोशनी में चाहिए।" उन्होंने 50,000 औरतों के दस्तखत जमा किए और सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैर-कानूनी करार दिया। अब उस फैसले को आए करीब दस साल होने वाले हैं। ज़किया अपने काम के तजुर्बे से बताती हैं कि इस दौरान आज भारत में ज़बानी तीन तलाक का चलन लगभग खत्म हो चुका है।
आज ज़किया सोमन अपनी निजी ज़िंदगी में भी बेहद खुश हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर के एक आला अफसर सोमन के साथ दूसरी शादी की है। ज़किया के काम में उनके शौहर, बेटे, बहू और सोमन की बेटी यानी पूरे परिवार का एक मज़बूत सपोर्ट रहता है।
ज़किया सोमन का सामाजिक काम का तजुर्बा जितना बड़ा है, कुरान और मज़हब को लेकर उनका अध्ययन) भी उतना ही गहरा है।
उनका मानना है कि अगर इस्लाम के मायने निकालने का काम मर्द-परस्त सोच और पुरुष-प्रधान सामाजिक-सियासी बैकग्राउंड वाले मर्दों के ज़रिए ही होगा, तो उससे निकलने वाले आम मायने भी ज़ाहिर तौर पर मर्दों के हक में ही होंगे। लेकिन, जब हम औरत-मर्द की बराबरी के नज़रिए से कुरान की तफसीरपढ़ते हैं, तब हमें यह समझ आता है कि अल्लाह ने औरत और मर्द, दोनों को बिल्कुल बराबर बनाया है।

वह हवालों के साथ बताती हैं, "इंसाफ और बराबरी इस्लाम की असल बुनियाद है, लेकिन सदियों तक मर्दों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से मज़हब के मायने निकाले। अल्लाह ने आदम और हव्वा को एक ही वक्त में, बराबर के हकों के साथ पैदा किया है।" वह पूरे ज़ोर के साथ बताती हैं कि इंसानों की पैदाइश के लिए कुरान में इस्तेमाल किया गया लफ्ज़ 'ज़ौज' (जिसका मतलब है जोड़ा) बराबरी को दर्शाता है, यानी उन दोनों को एक जोड़े के तौर पर, एक साथ बनाया गया है।
औरतों पर होने वाले ज़ुल्म और नाइंसाफी के मामलों पर काम करने के साथ-साथ वह कई और अहम मसले भी उठाती रहती हैं। 'हाजी अली दरगाह' में औरतों को एंट्री दिलाने के लिए भी उनकी संस्था ने एक बड़ी लड़ाई लड़ी, इसके अलावा वह औरतों को 'काज़ी' बनने के लिए ट्रेनिंग देने का काम भी करती हैं। 'मुस्लिम फैमिली लॉ' में सुधार करने की भी उनकी एक बड़ी मांग है। इसके लिए कानूनी लड़ाई और समाज में बेदारी फैलाने का काम इन दोनों मोर्चों पर वह और उनकी संस्था लगातार काम कर रही है।
उनका मानना है कि किसी की भी पहचान सिर्फ मज़हब तक महदूद नहीं होती। "मैं एक मुस्लिम हूँ, लेकिन इसके साथ ही मैं एक मां हूँ, एक औरत हूँ, शायद एक पेंटर या योगा करने वाली भी हो सकती हूँ।" यह बड़ी और खुली सोच उनके काम में भी नज़र आती है।
नफरत की सियासत और विविधता पर उठ रहे सवालों के बारे में वह काफी फिक्र के साथ बात करती हैं। आखिर में वह कहती हैं, "हमारे देश का हज़ारों साल पुराना इतिहास है। हमारी मिली-जुली तहज़ीब की वजह से ही यह देश आज तक मज़बूती से खड़ा रह सका है। विविधता ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। आज की सियासत इसी विविधता को खत्म करना चाह रही है, और यह एक बेहद बदकिस्मती और बेवकूफी की बात है।"