तरन्नुम की गूँज में खोती हुई रस्म-ए-ख़त: उर्दू भाषा पर बड़ा संकट

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 29-11-2025
The ritual of writing is lost in the echoes of Tarannum: a major crisis for the Urdu language
The ritual of writing is lost in the echoes of Tarannum: a major crisis for the Urdu language

 

 

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अबू शहमा अंसारी

उर्दू भाषा सदैव से तहज़ीब, शालीनता, विचार और भावनाओं की अभिव्यक्ति रही है। इसका सौंदर्य केवल शब्दों की लय में नहीं, बल्कि इसकी अनूठी लिपि (रस्म-ए-ख़त) में भी निहित है। उर्दू का हर अक्षर अपना रंग, अपनी ख़ुशबू और अपना मिजाज़ रखता है। किंतु आज के दौर में एक अजीबोगरीब विरोधाभास सामने आ रहा है: जहाँ एक तरफ़ मुशायरों की संख्या बढ़ती जा रही है, भव्य मंच सज रहे हैं, तरन्नुम की गूँज हर शहर में सुनाई दे रही है, और शायरी का शौक़ रखने वालों की भीड़ हर तरफ़ मौजूद है , वहीं दूसरी तरफ़ उर्दू की लिपि (रस्म-ए-ख़त) दिनों-दिन कमज़ोर होती जा रही है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे भाषा का मूल शरीर दुर्बल हो रहा है और हम सिर्फ़ उसकी ध्वनि को ज़िंदा रखने पर संतोष कर रहे हैं।

यह स्थिति केवल अफ़सोसनाक नहीं, बल्कि गहन चिंतन का विषय है,यह हमारी सांस्कृतिक संवेदनहीनता का सबसे शांत और बड़ा संकट है।मुशायरों का फलना-फूलना यक़ीनन एक सकारात्मक संकेत है। ये महफ़िलें सदियों से हमारी तहज़ीब का अटूट हिस्सा रही हैं; ये भावनाओं की अभिव्यक्ति, सामाजिक चेतना और वैचारिक उत्कृष्टता का माध्यम रही हैं। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब ये मुशायरे महज़ मनोरंजन तक सिमट जाएँ, जब क़ाफ़िया और रदीफ़ (तुकबंदी और लय) तो क़ायम रहें, मगर भाषा की नींवें ही कमज़ोर पड़ जाएँ।

आजकल के कई युवा शायर मुशायरों में तारीफ़ें ज़रूर बटोरते हैं, मगर उनमें से एक बड़ी संख्या उर्दू लिपि से अपरिचित है। वे ‘मोहब्बत’, ‘ज़िंदगी’, ‘ख़्वाब’, ‘सफ़र’ जैसे बुनियादी शब्द भी रोमन लिपि में लिखते नज़र आते हैं।

"मोहब्बत" जब उर्दू में लिखी जाती है, तो उसका एक ख़ास हुस्न और एहसास होता है, मगर जब वह "mohabbat" बन जाती है, तो ऐसा लगता है मानों शब्द ने अपना लिबास ही उतार दिया हो। त्रासदी यह है कि रोमन में लिखने का यह प्रचलन अब एक फ़ैशन बनता जा रहा है, और जब फ़ैशन किसी भाषा पर हावी हो जाए, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है।

असली ज़िम्मेदारी: घर की दीवारें

इस पतन की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ युवा पीढ़ी पर डालना न्यायसंगत नहीं है। समाज में जो भी बिगाड़ पैदा होता है, उसकी शुरुआत हमेशा घर से होती है। आज हमें लगता है कि बच्चों से अधिक उनके माता-पिता को सुधार की ज़रूरत है। क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं।

जब अभिभावक स्वयं उर्दू लिखना छोड़ दें, जब उन्हें अपने नाम की सही वर्तनी (रस्म-ए-ख़त) मालूम न हो, जब वे सोशल मीडिया पर रोमन उर्दू को एक सतत पुण्य (सवाब-ए-जारिया) समझकर इस्तेमाल करने लगें, तो अगली पीढ़ी से भाषा प्रेम की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

माता-पिता अगर किताब के बजाय सिर्फ़ मोबाइल को हथियार समझेंगे , अगर वे भाषा के सौंदर्य को महत्व नहीं देंगे, अगर वे अपने बच्चों को कहानियों, शायरी, और साहित्य से जोड़ने के बजाय शॉर्ट वीडियोज़ से जोड़ देंगे, तो लिखित भाषा का कमज़ोर होना अनिवार्य है। यह एक कड़वी सच्चाई है, जिसे स्वीकार किए बिना सुधार की राह असंभव है।

आज की पीढ़ी न पढ़ना चाहती है और न लिखना, लेकिन इसका मूल कारण प्रशिक्षण (परवरिश) की कमज़ोरी है। अभिभावक यह मान लेते हैं कि बच्चे स्कूल में सब सीख लेंगे। मगर वास्तविक और मौलिक शिक्षा कभी संस्थाओं में नहीं होती, वह हमेशा घरों की दीवारों के भीतर जन्म लेती है।

जब बच्चे अपने माता-पिता को उर्दू अख़बार पढ़ते हुए, या साहित्य की किताब हाथ में लिए बैठे देखेंगे, तभी उनमें भी भाषा के प्रति सहज प्रेम पैदा होगा। लेकिन अगर अभिभावक स्वयं मोबाइल की भाषा पर चलने लगेंगे, तो बच्चे अक्षरों के बजाय सिर्फ़ इमोजी में बात करना सीखेंगे। धीरे-धीरे ऐसा समय आएगा जब भाषा का शरीर मर चुका होगा और सिर्फ़ उसकी आवाज़ बाक़ी रह जाएगी। ऐसी भाषा ज़िंदा नहीं रहती, वह सिर्फ़ साँस लेती रहती है।

आसानी नहीं, सम्मान आवश्यक

एक और पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज के माता-पिता अपनी ज़िम्मेदारियों से ज़्यादा अपनी आसानियों में रुचि रखते हैं। वे बच्चों से कहते हैं कि "उर्दू मुश्किल है," "इसे लिखने-समझने में समय लगता है," "रोमन में लिखो, सबको समझ आ जाएगा।"

ये सिर्फ़ वाक्य नहीं हैं, बल्कि भाषा के जनाज़े में डाली जाने वाली पहली मुट्ठी भर मिट्टी है। बच्चा जब यही सुनता है कि उसकी भाषा 'मुश्किल' है, तो वह उससे दूर हो जाता है। किसी भी भाषा की सुरक्षा तभी संभव होती है जब उसके बोलने वाले उसे इज़्ज़त दें, उसके हर अक्षर को मुश्किल नहीं, बल्कि क़ीमती समझें।

सच यही है कि मुशायरे बढ़ रहे हैं, मगर भाषा घट रही है। मंच पर "वाह-वाह" हो रही है, मगर घरों में शब्द मर रहे हैं। शायर बढ़ रहे हैं, मगर क़ारी (पाठक) कम होते जा रहे हैं। हमारी पीढ़ी तरन्नुम (गायन शैली) तो सुन सकती है, मगर शब्दों को पढ़ने का धैर्य खो चुकी है।

विरासत की रक्षा हमारा फ़र्ज़

भाषा का सफ़र सिर्फ़ मुशायरों से ज़िंदा नहीं रहता, वह घरों, स्कूलों, गलियों, किताबों और माता-पिता के व्यवहार से ज़िंदा रहता है। अगर हम चाहते हैं कि मुशायरों की यह रोशनी भाषा की लिपि को भी प्रकाशित करे, तो हमें अपनी बुनियादों को नए सिरे से मज़बूत करना होगा।

इसके लिए सबसे पहले अभिभावकों का प्रबोधन (जागरूकता) आवश्यक है। बच्चों से ज़्यादा माता-पिता को यह अहसास दिलाने की ज़रूरत है कि भाषा एक विरासत होती है, और इस विरासत को बचाना हमारा नैतिक फ़र्ज़ है। अभिभावकों को चाहिए कि वे प्रतिदिन कम से कम कुछ मिनट बच्चों के साथ बैठकर उर्दू/हिंदी में बातचीत करें, उन्हें कहानियाँ सुनाएँ, उनसे छोटे-छोटे वाक्य लिखवाएँ। उन्हें सिखाएँ कि शब्दों का सौंदर्य उनकी लिपि में छिपा है।

याद रखना चाहिए कि भाषा सिर्फ़ व्याकरण का नाम नहीं, यह तहज़ीब, चरित्र, पहचान और चेतना का संग्रह है। जो क़ौम अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़ देती है, वह धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देती है। समय आ गया है कि हम सामूहिक रूप से इस ख़तरे को महसूस करें। यदि हमने आज भी यह संवेदनहीनता और लापरवाही जारी रखी, तो आने वाली पीढ़ी को यह तक मालूम नहीं होगा कि "मोहब्बत" का असली आकार कैसा होता था। हमें तय करना है कि हम अपनी भाषा को बाज़ार का हिस्सा बनाना चाहते हैं या तहज़ीब का।

(यह लेखक के विचार हैं)