अविश्वास की रात, सौहार्द की लालीमां

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 30-11-2025
Night of distrust, redness of harmony
Night of distrust, redness of harmony

 

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मलिक असग़र हाश्मी की कलम से

बातें थोड़ी पुरानी होती हैं, पर उनकी ख़ुशबू वक़्त के साथ और गहरी होती जाती है। उन दिनों मैं 'अमर उजाला' के अलीगढ़ संस्करण में समाचार संपादक था। मेरी दुनिया स्याही और ख़बरों की साँस पर चलती थी, और मेरी ड्यूटी अक्सर रात के उस पहर तक खिंच जाती थी, जब शहर गहरी नींद में होता है। पेज फ़ाइनल करने के बाद भी, ख़बरों की उलझन मन में देर तक रहती, और दफ़्तर से निकलते-निकलते सुबह के तीन बज जाना आम था।

एक रात, क़रीब ढाई बजे होंगे। शहर की चुप्पी कानों में बज रही थी और मैं अगली सुबह की हेडलाइन का ख़ाका बुन रहा था, कि अचानक गुड़गाँव से पत्नी का फ़ोन आया। उसकी आवाज़ में वह घबराहट थी, जो किसी भी पति को एक पल में अंदर तक दहला दे। उसने मुश्किल से साँस लेते हुए बताया, "बड़े बेटे को पुलिस सेक्टर पाँच थाने ले गई है।"

सालिक, मेरा नौवीं में पढ़ने वाला दुबला-पतला बेटा। यह सुनते ही मेरे भीतर बुरे-बुरे ख़्यालात का बवंडर उठ खड़ा हुआ। आधी रात का वक़्त, पुलिस स्टेशन, और एक बच्चा... न जाने उसने क्या कर दिया होगा! मन में डर की एक सर्द लहर दौड़ गई। मेरी बेचैनी को भाँपते हुए भी पत्नी ने अपनी बात पूरी की, "आप मयंक जी को कहिए... वह अभी उसे थाने से ले आएँगे।"

मयंक तिवारी, गुड़गाँव का पुराना साथी, एक शानदार क्राइम रिपोर्टर। इस नाम ने मुझे थोड़ा संबल दिया। मैंने गहरी साँस ली और शांत होकर पूछा, "आख़िर क्या हुआ है सालिक को? क्यों ले गई पुलिस?"

उधर से पत्नी ने अपनी कंपकंपाती आवाज़ में जो माजरा सुनाया, उसने मेरे सारे पूर्वाग्रहों को एक झटके में तोड़ दिया। उसने बताया, "बेटे ने कुछ नहीं किया है। घर में चोर घुस आया था। मोहल्ले वालों ने चोर को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया है... अब गवाही के लिए सालिक को थाने ले गए हैं।"

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जिस मुहल्ले में रहते थे, वह कैसा था?

मैं गुड़गाँव की जिस बड़ी रिहायशी कॉलोनी में रहता हूँ, वह आर्थिक रूप से समृद्ध और पेशेवर लोगों से भरी हुई है। दस हज़ार की आबादी में बमुश्किल पाँच घर मुसलमानों के होंगे, और हमारे पड़ोस में तो कोई नहीं। हमारे घर के सामने एक क्रिश्चियन परिवार, बगल में ओड़िया ब्राह्मण परिवार, दूसरी तरफ़ पंजाब के शर्मा जी और उनके साथ एक सिख परिवार। सब कामकाजी, सब अपने-अपने दायरे में व्यस्त।

पत्नी ने फ़ोन पर धीरे-धीरे उस रात का पूरा दृश्य मेरी आँखों के सामने खड़ा कर दिया। वह और दोनों बच्चे बेख़बर सो रहे थे। हमारे घर से दो घर आगे, मकान मालिक फूलचंद जी के मकान के ऊपरी हिस्से में कॉल सेंटर में काम करने वाला एक युवक अपनी ड्यूटी पूरी कर छत पर टहल रहा था।

उसकी नज़र पड़ोसी की छत से हमारी छत पर कूदे एक बाहरी साये पर पड़ी। उसे तुरंत समझ आ गया कि यह कोई अनिष्ट की नीयत से आया हुआ बाहरी व्यक्ति है। उसने बिना देर किए अपने मकान मालिक फूलचंद जी को यह बात बताई। फूलचंद जी और लेन के लगभग सभी लोग जानते थे कि मैं नौकरी के कारण अलीगढ़ में हूँ, और घर में एक अकेली महिला और दो छोटे बच्चे हैं।

फूलचंद जी की आँखों में मेरे परिवार की सुरक्षा का संकल्प जागा। उन्होंने तुरंत अपने बच्चों को उठाया, लाठी-डंडा लिया और पड़ोस के सभी परिवारों को बुला लाए।

जब अविश्वास ने सद्भाव को चुनौती दी

बाहर करीब दस-बारह लोग हाथों में डंडा लिए खड़े थे, और कॉल बेल लगातार बज रही थी। बेल की आवाज़ सुनकर पत्नी जाग गई। उसे लगा शायद अलीगढ़ से मैं आ गया हूँ। उसने छत से झाँक कर नीचे देखा और दंग रह गई।

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दस-बारह लोग, हाथ में डंडे

एक पल के लिए, उसके दिल की धड़कन रुक गई। समय ठहर गया।हाल ही में हुए कुछ सांप्रदायिक तनावों की ख़बरें उसके मन में गूँज गईं,सड़क पर नमाज़ को लेकर विवाद, सदर बाज़ार की जामा मस्जिद से ईशा की नमाज़ पढ़कर लौटते एक टोपी वाले को 'जय श्री राम' न बोलने पर पीटे जाने की अफ़वाहें। इन ख़्यालों ने उसके मन में अविश्वास का एक गहरा अँधेरा भर दिया। उसे लगा, आज उसकी बारी है... पड़ोस में रहने वाले हिंदुओं ने उसके घर पर धावा बोल दिया है!

और उसी पल, फूलचंद जी की तेज़, मगर निर्णायक आवाज़ उस अँधेरे को चीरती हुई उसके कानों से टकराई: "भाभी जी जल्दी दरवाज़ा खोलिए। आपके घर की छत पर चोर है।"

यह सुनते ही अविश्वास की दीवार ढह गई। वह भागकर नीचे गई और बिना कुछ सोचे-समझे दरवाज़ा खोल दिया। देखते ही देखते मोहल्ले वालों से हमारे घर का निचला हिस्सा भर गया। उनमें से कुछ छत पर चढ़ गए, और सचमुच एक अंजान व्यक्ति दीवार के सहारे दुबका बैठा मिला।

मोहल्ले वालों ने उसे खींचकर नीचे सड़क पर ला दिया और ख़ूब पिटाई की। उन्होंने मेरी अनुपस्थिति में न सिर्फ़ संकट से हमें निकाला, बल्कि अपनी जान जोखिम में डालकर चोर को पकड़ा। अगर उस चोर के हाथ में कोई धारदार हथियार होता, तो किसी को भारी नुक़सान पहुँच सकता था।

सुबह की लालीमां और दोस्ती का ऋण

इसके बाद पुलिस आई और चोर के साथ मेरे बेटे सालिक को भी गवाही के लिए थाने ले गई। मैंने तुरंत अपने मित्र मयंक तिवारी को फ़ोन लगाया, जो तब तक गुड़गाँव के एक बड़े और अच्छे क्राइम रिपोर्टर बन चुके थे। उन्हें पूरी कहानी बताई। मयंक ने बिना एक क्षण का विचार किए, भरोसा दिया, "असग़र भाई, आप चिंता न करें। मैं अभी अपनी गाड़ी से थाने के लिए निकलता हूँ।"

कुछ देर बाद फिर पत्नी का फ़ोन आया। आवाज़ में अब राहत थी। उसने बताया कि मयंक तिवारी बेटे को घर छोड़कर जा चुके हैं। तब तक पौने पाँच बज चुके थे। गर्मी का मौसम था और क्षितिज पर सुबह की लालीमां छाने लगी थी।

आज, जब हिंदू-मुसलमानों में छोटी-छोटी बातों पर तकरार होते देखता हूँ, या अविश्वास पनपता देखता हूँ, तो अनायास ही मुझे अपने परिवार के साथ बीता हुआ वह पल याद आ जाता है। वह लालीमां सिर्फ़ सूरज की नहीं थी; वह मेरे पड़ोसियों के निश्छल प्रेम और सद्भाव की लालीमां थी।

मेरे मोहल्ले के सारे हिंदुओं ने, मेरी ग़ैर-मौजूदगी में, एक मुस्लिम परिवार की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान दाँव पर लगा दी थी। वह घटना मेरे लिए साम्प्रदायिक सौहार्द पर लिखी गई किसी भी किताब से ज़्यादा मूल्यवान है।

यह बताती है कि हमारे दिलों में नफ़रत नहीं, बल्कि वह सच्ची इंसानियत ज़िंदा है, जो किसी भी संकट में मज़हब का चोला उतारकर सबसे पहले पड़ोसी धर्म को निभाती है। इस ऋण को मैं कभी चुका नहीं सकता।धारणा और वास्तविकता में अंतर होता हैI

संपादक

(यदि आपके पास भी ऐसी साम्प्रदायिक सौहार्द या हिंदू-मुस्लिम दोस्ती वाली अपनी कहानी हो तो हमें [email protected] पर मेल कर दें। आवाज़ द वाॅयस में उसे प्रमुखता से छापा जाएगा।)