सलीम समद
शीख हसीना का राजनीतिक करियर इस समय सबसे कठिन मोड़ पर खड़ा है। अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (ICT) द्वारा उन्हें सुनाई गई मौत की सजा ने बांग्लादेश की राजनीति को झकझोरकर रख दिया है। सवाल यह है कि क्या यह फैसला उनके लंबे राजनीतिक सफर का अंत बन जाएगा। मौत की सजा के साथ बांग्लादेश लौटना और अवामी लीग को फिर संभालना उनके लिए लगभग नामुमकिन लगता है।
यह वही ट्रिब्यूनल है जिसकी शुरुआत उनके पिता शीख मुजीबुर रहमान ने 1971 के युद्ध अपराधों की सुनवाई के लिए की थी। इसका उद्देश्य उन 195 पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों को ट्रायल में लाना था जिन पर स्वतंत्रता युद्ध के दौरान अत्याचारों का आरोप था। हसीना ने 2009 में सत्ता में वापस आने के बाद इसे फिर से सक्रिय किया, लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगा।
FirstPost की रिपोर्ट भी बताती है कि ICT का इस्तेमाल विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया गया। पिछले साल के जुलाई–अगस्त के प्रदर्शनों में 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई, लेकिन हसीना ने उस हिंसा पर कोई पछतावा नहीं जताया। यही वजह है कि आज जब वही प्रणाली उनके खिलाफ खड़ी है, तो वह उसकी सबसे बड़ी शिकार बन गई हैं।
लगभग दो दशक तक बांग्लादेश पर कड़े हाथ से शासन करने वाली हसीना आज अपने ही फैसलों के बोझ तले दब रही हैं। उनके कई समर्थक, खासकर जो भारत में शरण लिए हुए हैं, अभी भी लड़ाई छोड़ने के लिए तैयार नहीं। भारत में रहकर भी उन्होंने पिछले 15 महीनों में कई आक्रामक बयान दिए और बांग्लादेश सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की।
इससे भारत के लिए भी असहज परिस्थितियाँ बनीं क्योंकि यह बयानबाज़ी भारत–बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर सकती थी। दिलचस्प बात यह है कि हसीना भारत के लिए हमेशा “हर मौसम की दोस्त” मानी गईं। उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान भारत के साथ सुरक्षा, व्यापार और कूटनीति के मामलों में मजबूत रिश्ते विकसित किए।
लेकिन इसके बावजूद वह कई बार ऐसे कदम उठाती रहीं जिनसे क्षेत्रीय स्थिरता पर विपरीत असर पड़ा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण SAARC का ठप पड़ जाना है। 2016 में जब पाकिस्तान ने SAARC सम्मेलन की मेज़बानी का ऐलान किया तो भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर इसका बहिष्कार कर दिया।
हसीना ने भी यात्रा रद्द कर दी। लेकिन बाद में उन्होंने SAARC को पुनर्जीवित करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की, जिससे दक्षिण एशिया का यह महत्वपूर्ण मंच लगभग निष्क्रिय हो गया। बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच तनाव भी लगातार बढ़ता गया।
हसीना ने पाकिस्तानी राजनयिकों को निष्कासित किया और कई वर्षों तक नई नियुक्तियों की अनुमति नहीं दी। इस टकराव का असर दोनों देशों के व्यापार पर पड़ा और क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाएं कमजोर होती चली गईं।
ICT के फैसले के बाद बांग्लादेश ने भारत से हसीना को प्रत्यर्पित करने की औपचारिक मांग भी की है। लेकिन भारत ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। विदेश मंत्रालय ने ICT के फैसले को “नोट” किया, लेकिन हसीना की कानूनी स्थिति पर कोई टिप्पणी नहीं की।
यह चुप्पी साफ बताती है कि दिल्ली अपनी पुरानी सहयोगी को किसी भी कीमत पर बांग्लादेश नहीं सौंपेगा, खासकर तब जब उनकी जान को खतरा हो। भारत यह भी समझता है कि ICT एक राजनीतिक औजार बन चुका है और इसका फैसला न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
यही वजह है कि भारत इस ट्रिब्यूनल को पूर्ण वैधता देने का इच्छुक नहीं है। The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार भारत 2013 की प्रत्यर्पण संधि की अपवाद धारा का इस्तेमाल कर सकता है और हसीना को सौंपने से इनकार कर सकता है। यह भारत के रणनीतिक हितों के अनुकूल होगा क्योंकि बांग्लादेश की मौजूदा सरकार की नीतियाँ भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए स्थिरता नहीं ला रही हैं।
बांग्लादेश सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है और चुनाव आयोग ने नाव चुनाव चिन्ह को भी सूची से हटा दिया है। ऐसे माहौल में देश का राजनीतिक ढांचा असंतुलित हो गया है और चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
बांग्लादेश के कई विश्लेषकों का मानना है कि हसीना के लिए हालात मुश्किल होते जाएंगे और उनकी पुरानी शक्ति व प्रभाव अब लौटकर नहीं आएंगे। वहीं, भारत के लिए भी बांग्लादेश की यह अस्थिरता चिंता का विषय है, क्योंकि एक अस्थिर पड़ोसी देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सुरक्षा और व्यापारिक हितों को प्रभावित करता है।
आज हसीना उसी तंत्र की गिरफ्त में हैं जिसे उन्होंने विरोधियों को दबाने के लिए बनाया था। भरत भूषण ने सही लिखा है कि हसीना अब उसी जाल में फँसी हैं जिसे उन्होंने दूसरों के खिलाफ बुना था।
बांग्लादेश की मौजूदा रणनीति,जिसमें राजनीतिक बदले की भावना, भारत पर दबाव की कोशिश और क्षेत्रीय संतुलन की अनदेखी शामिल है—आने वाले समय में और भी बड़े राजनीतिक संकट को जन्म दे सकती है। भारत के खिलाफ आक्रामक नीतियाँ और घरेलू राजनीतिक दमन बांग्लादेश को और अस्थिर करेंगे। इन गलत निर्णयों का असर अब हसीना के राजनीतिक भविष्य पर सीधे दिख रहा है।
(लेखक बांग्लादेश के स्वतंत्र पत्रकार हैं और यह उनके विचार हैं।)