
हरजिंदर
लंदन के किंग्स्टन ग्रींस इलाके में पिछले हफ्ते एक उग्रवादी हमला हुआ। साफतौर पर इसके तार इन दिनों पश्चिम एशिया में जो संघर्ष चल रहा है उससे जुड़े थे। इसके पीछे का मकसद यह हो सकता है कि खाड़ी के क्षेत्र में इन दिनों जो तनाव चल रहा है उसकी नफरत के कुछ बीज ब्रिटेन में भी बोए जाएं।
वारदात के दो दिन बाद ही किंग्स्टन ग्रींस इलाके में महिलाओं का एक शांति मार्च निकला। इस जुलूस की खासियत यह थी कि इसमें मुस्लिम और यहूदी दोनों ही धर्मों की महिलाएं शामिल थीं।निसा-नशीम नाम के संगठन के बैनर तले जब यह जुलूस निकाला गया तब तक ब्रिटेन में ज्यादातर लोगों ने इस संगठन का नाम तक नहीं सुना था। ऐसे मौके पर दोनों धर्मों की महिलाओं का एक साथ खड़े होना एक बड़ी खबर थी इसलिए मीडिया में इसे काफी कवरेज भी मिला और तारीफ भी।
तकरीबन 12 साल पहले बने इस संगठन का इस तरह सुर्खियों में आना इसके सदस्यों के लिए बड़ी खबर थी। लेकिन इससे बड़ी खबर यह उन ब्रिटिश महिलाओं के लिए थी जो तमाम तरह की नफरतों की बीच उम्मीद तलाश रही हैं।

वैसे ब्रिटेन में दोनों समुदायों के लोगों के बीच तालमेल बनाने के लिए कुछ संगठन पहले ही काम कर रहे हैं। लेकिन इस काम के लिए सिर्फ महिलाओं का साथ आना लोगों को जैसी उम्मीद बंधा रहा है वैसी पहले कभी नहीं बनी थी।
Golders Green Stabbing: Attacker Chases Victims Through Jewish Neighborhood
— Roy Rogue (@rogue185263) April 29, 2026
Keir Starmer: North London stabbing follows Iranian ambassador’s “unacceptable and inflammatory” call to “all sons and daughters of Iran” to be ready to sacrifice their lives pic.twitter.com/tBtqRSroVF
हालांकि ये महिलाएं स्वीकार करती हैं कि उनका काम बहुत आसान नहीं है। पश्चिम एशिया में जिस तरह की हिंसा होती रही है उसे रोकना पूरी दुनिया के लिए हमेशा से ही टेढ़ी खीर रहा है। उसकी एक वजह अतीत के पूर्वाग्रह भी हैं और वर्तमान के तनाव भी। इनसे जो शक और नफरत का माहौल पैदा होता है वह ब्रिटेन समेत पूरी दुनिया में फैलता है और सिर्फ स्थानीय स्तर पर इसे रोकना काफी कठिन काम है।
वह भी तब जब पश्चिम एशिया की समस्या न सिर्फ लगातार बढ़ती जा रही है बल्कि और जटिल भी होती जा रही है। ऐसे में दोनों समुदायों की महिलाओं का एक साथ आना उम्मीद बंधाता है।निसा-नशीम नाम के इस संगठन हो मुस्लिम और यहूदी महिलाओं के एक नेटवर्क के रूप में खड़ा किया गया था। मकसद था दोनों समुदायों की महिलाओं को एक साथ लाना।

उनके आपसी पूर्वाग्रह दूर करना ताकि वे एक साथ आगे बढ़ सकें।अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन बनाए गए इस संगठन के तहत ये महिलाएं विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेती हैं और एक दूसरे के पर्व-त्योहार मनाती हैं। लेकिन यह पहला मौका है जब वे एक कठिन समय में साथ बाहर निकलीं और अब इसी में संभावनाएं देखी जा रही हैं।क्या भारत के विभिन्न समुदायों की महिलाएं इससे सबक लेंगी।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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