नूरूल हक/ अगरतला
कहते हैं कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती, बशर्ते उन्हें पूरा करने का जुनून, मेहनत और आत्मविश्वास हो। त्रिपुरा के एक छोटे से गांव से निकलकर ब्रिटेन के प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थान तक का सफर तय करने वाले तुराब अली की कहानी इसी हौसले, संघर्ष और सफलता की मिसाल बन गई है। सीमित संसाधनों और साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले इस युवा ने अपनी मेहनत और पेशेवर क्षमता के बल पर अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा जगत में ऐसी पहचान बनाई है, जिस पर न सिर्फ उनका परिवार बल्कि पूरा त्रिपुरा गर्व महसूस कर रहा है।
त्रिपुरा के कैलाशहर उपमंडल के तिला बाजार क्षेत्र स्थित कलेरकंडी गांव के निवासी तुराब अली आज इंग्लैंड के प्रतिष्ठित सैलिसबरी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट में एनेस्थेटिक प्रैक्टिशनर (Anesthetic Practitioner) के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। चिकित्सा क्षेत्र की यह भूमिका बेहद संवेदनशील और जिम्मेदारीपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसमें मरीजों को ऑपरेशन से पहले बेहोशी की दवा देना, उनकी शारीरिक स्थिति की निगरानी करना और पूरे चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल होता है। बताया जाता है कि तुराब अली पिछले करीब एक वर्ष से इस पद पर अत्यंत कुशलता और जिम्मेदारी के साथ कार्य कर रहे हैं।
तुराब अली की सफलता केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि त्रिपुरा जैसे अपेक्षाकृत छोटे और संसाधन सीमित राज्य के युवाओं के लिए प्रेरणा की कहानी बन चुकी है। खासकर ऐसे समय में, जब छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के युवाओं के सामने शिक्षा और रोजगार को लेकर अनेक चुनौतियां होती हैं, तुराब अली का सफर यह संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प और सही दिशा में मेहनत के जरिए वैश्विक मंच तक पहुंचा जा सकता है।

तुराब अली स्वर्गीय उस्ताद यज़ीद अली के पुत्र हैं। पारिवारिक परिस्थितियां बहुत अधिक संपन्न नहीं थीं, लेकिन शिक्षा के प्रति परिवार की गंभीरता और खुद तुराब की लगन ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। स्थानीय स्तर पर अपनी प्रारंभिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने त्रिपुरा इंस्टीट्यूट ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज (TIPS) में दाखिला लिया, जहां उन्होंने पैरामेडिकल शिक्षा हासिल की।
शिक्षा पूरी करने के बाद तुराब ने अपने करियर की शुरुआत भारत के प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों में काम करके की। उन्होंने बेंगलुरु के प्रतिष्ठित मणिपाल अस्पताल सहित पश्चिम बंगाल के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में काम करते हुए व्यावहारिक अनुभव हासिल किया। इस दौरान उन्होंने आधुनिक चिकित्सा तकनीकों, ऑपरेशन थिएटर प्रबंधन और मरीजों की देखभाल के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता को मजबूत किया।
हालांकि, उनके मन में हमेशा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने का सपना था। लेकिन विदेश में चिकित्सा क्षेत्र में नौकरी पाना आसान नहीं होता। इसके लिए तकनीकी योग्यता, भाषा कौशल और पेशेवर प्रमाणन जैसी कई कठिन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। तुराब अली ने इन चुनौतियों को रुकावट नहीं बनने दिया।
उन्होंने ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में प्रवेश के लिए जरूरी योग्यताओं को हासिल करने की दिशा में गंभीर तैयारी शुरू की। अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए लगातार मेहनत की और अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं तथा इंटरव्यू की तैयारी की। उन्होंने कई कठिन चयन प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक पार किया। इसके बाद उन्होंने हेल्थ एंड केयर प्रोफेशंस काउंसिल (HCPC) में अपना पंजीकरण कराया, जो ब्रिटेन में स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण नियामक संस्था मानी जाती है।
एचसीपीसी पंजीकरण मिलने के बाद उनके लिए ब्रिटेन में नौकरी का रास्ता खुला और अंततः उन्हें इंग्लैंड के सैलिसबरी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट में एनेस्थेटिक प्रैक्टिशनर के पद पर नियुक्ति मिली। यह उपलब्धि इसलिए भी खास मानी जाती है क्योंकि एनएचएस (नेशनल हेल्थ सर्विस) दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में गिनी जाती है, जहां चयन प्रक्रिया बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धी होती है।
तुराब अली बताते हैं कि ब्रिटेन में काम करना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। उनका कहना है कि अगर उचित योजना, तैयारी और निरंतर मेहनत की जाए तो त्रिपुरा जैसे राज्य के छात्र भी वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना सकते हैं। वे मानते हैं कि सफलता का सबसे बड़ा मंत्र धैर्य और लगातार सीखते रहने की आदत है।
अपने काम की संवेदनशीलता पर बात करते हुए तुराब कहते हैं कि मरीजों को बेहोशी की दवा देना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। ऑपरेशन के दौरान मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करना, उसकी स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी रखना और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत निर्णय लेना उनके कार्य का अहम हिस्सा है। यही कारण है कि जिस चिकित्सा संस्थान में वे कार्यरत हैं, वहां उनकी पेशेवर दक्षता और जिम्मेदारी की भावना को विशेष महत्व दिया जाता है।
तुराब अली की उपलब्धि ने त्रिपुरा में खुशी और गर्व का माहौल पैदा कर दिया है। विशेषकर मुस्लिम समुदाय के लोगों में इसे लेकर उत्साह देखा जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक छोटे गांव का युवक जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल करता है, तो वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। सोशल मीडिया पर भी लोग उन्हें बधाइयां दे रहे हैं और उनकी सफलता को युवाओं के लिए एक सकारात्मक संदेश बता रहे हैं।
शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि तुराब अली की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मान लेते हैं। यह कहानी बताती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो भौगोलिक सीमाएं और आर्थिक चुनौतियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं।
आज जब देश के कई युवा विदेशों में बेहतर अवसरों की तलाश कर रहे हैं, तुराब अली का सफर यह सिखाता है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, धैर्य, सीखने की ललक और अपने सपनों के प्रति अटूट विश्वास छिपा होता है। त्रिपुरा के इस युवा ने न केवल अपने राज्य का नाम रोशन किया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि छोटे शहरों और गांवों से निकले युवा भी दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर अपनी काबिलियत का परचम लहरा सकते हैं।