राजीव नारायण
भारत ने अपनी आबादी की उम्र तो बढ़ा दी है, लेकिन उस लंबी जिंदगी को सुरक्षा देना भूल गया है। आज जब लोग पहले से ज्यादा लंबे समय तक जीवित रह रहे हैं, तो रिटायरमेंट चुपचाप भारत की सबसे बड़ी वित्तीय और सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है। कभी रिटायरमेंट करियर का आखिरी दौर हुआ करता था। आज यह जिंदगी का सबसे लंबा और सबसे अनिश्चित अध्याय बन चुका है।
हर महीने के पहले कामकाजी दिन भारत के करोड़ों माता-पिता एक जैसा रूटीन दोहराते हैं। अखबार खुलने या चाय ठंडी होने से पहले वे फोन पर बैंकिंग ऐप खोलते हैं। पासबुक अपडेट करते हैं और एक ही एंट्री का इंतजार करते हैं। वह एंट्री ब्याज क्रेडिट की होती है।
यह छोटा सा आंकड़ा बैंक बैलेंस से कहीं ज्यादा तय करता है। इससे दवाइयां आती हैं, राशन खरीदा जाता है, बिजली का बिल चुकता होता है और मेडिकल टेस्ट का खर्च निकलता है। इसी से तय होता है कि डॉक्टर के पास जाने से पहले फीस की चिंता न करनी पड़े। इससे यह भी तय होता है कि पुराना फ्रिज एक और गर्मी झेल पाएगा या नहीं। इसी पैसे से दादा-दादी अपने पोते-पोती की जेब में बिना सोचे पांच सौ का नोट खिसका पाते हैं।
ये लोग बेहिसाब खर्च करने वाले नहीं हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी नियमों के हिसाब से बिताई। इन्होंने कड़ी मेहनत की, पैसे बचाए, कर्ज से दूर रहे। इन्होंने सट्टेबाजी के बजाय फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी पर भरोसा किया। इन्होंने यह सोचकर रिटायरमेंट का स्वागत किया कि समझदारी से बचत करने पर सुरक्षा जरूर मिलेगी। लेकिन किसी ने इन्हें चेतावनी नहीं दी थी कि खुद रिटायरमेंट का स्वरूप ही बदल जाएगा।
बदलता गणित और लंबा होता जीवन
एक वक्त था जब रिटायरमेंट केवल दस साल का होता था। तब लोगों की उम्र कम होती थी, पेंशन आसानी से मिलती थी, इलाज सस्ता था और पूरा परिवार एक छत के नीचे रहता था। तब रिटायरमेंट को सुनहरे दिनों की शुरुआत माना जाता था, न कि लंबे चौड़े वित्तीय हिसाब-किताब की शुरुआत।
वह दुनिया अब धीरे-धीरे गायब हो चुकी है। भारत में औसत उम्र जो साठ के दशक में इकतालीस साल थी, वह आज बढ़कर सत्तर साल हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, साल 2050 तक करीब पैंतीस करोड़ भारतीय साठ साल की उम्र पार कर चुके होंगे। यानी हर पांच में से एक नागरिक बुजुर्ग होगा। यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी स्वास्थ्य उपलब्धियों में से एक है। लेकिन साथ ही यह देश की सबसे बड़ी आर्थिक परीक्षा भी बन रही है।
असली दिक्कत यह नहीं है कि भारतीय ज्यादा जी रहे हैं। असल समस्या यह है कि रिटायरमेंट के लिए बनाया गया पुराना वित्तीय मॉडल बढ़ती उम्र की इस दौड़ में पिछड़ गया है। भारत के नब्बे फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इन लोगों के लिए रिटायरमेंट बिना किसी पेंशन के आती है। वरिष्ठ नागरिकों की पसंदीदा निवेश योजना यानी एफडी पर मिलने वाला रिटर्न अब घट गया है। दूसरी तरफ, इलाज का खर्च और घर का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है।
भारत ने अपने लोगों को लंबी उम्र तो दे दी है, लेकिन उन अतिरिक्त सालों का खर्च कैसे चलेगा, इसकी कोई ठोस तैयारी नहीं की। नतीजा यह हुआ कि जिंदगी का चक्र उलट गया। नौकरी के दौरान कमाई बढ़ती जाती है और समय कम लगता है। वहीं रिटायरमेंट के बाद समय बहुत होता है, लेकिन कमाई रुक जाती है। साठ की उम्र में इनकम रिटायर हो जाती है, लेकिन खर्चे कभी रिटायर नहीं होते।
रिटायरमेंट का कड़वा गणित
मान लीजिए कोई दंपत्ति साठ साल की उम्र में एक करोड़ रुपये की बचत के साथ रिटायर होता है। उनके पास कोई पेंशन नहीं है और अपना एक घर है। ज्यादातर भारतीयों के लिए एक करोड़ की रकम बहुत बड़ी लगती है। लेकिन गणित कुछ और ही कहानी बयां करती है। आज की तारीख में एफडी पर छह से सात फीसदी ब्याज मिलता है। इस हिसाब से उस एक करोड़ पर सालभर में छह से सात लाख रुपये की कमाई होगी। टैक्स काटने के बाद महीने के हिसाब से देखें तो यह रकम पचपन से साठ हजार रुपये बैठती है।
अब जरा खर्चों पर नजर डालिए। एक मध्यमवर्गीय परिवार में घर चलाने का खर्च ही महीने का चालीस से पचास हजार रुपये आ जाता है। इसमें शुगर या ब्लड प्रेशर की दवाइयां, हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम, जांच के खर्चे, घरेलू मदद, बिजली बिल और कभी-कभार आने वाले पारिवारिक खर्च जोड़ लें, तो महीने का कुल खर्च सत्तर हजार रुपये को पार कर जाता है। पहले साल यह अंतर बहुत ज्यादा बड़ा नहीं लगता। लेकिन वक्त के साथ यह खाई तेजी से चौड़ी होने लगती है।
अगर महंगाई दर छह फीसदी सालाना भी मानी जाए, तो आज का सत्तर हजार रुपये का मासिक खर्च बीस साल बाद दो लाख रुपये से ज्यादा हो जाएगा। तब जाकर परिवार अपनी जीवनशैली को बचा पाएगा। आज रिटायरमेंट का मतलब केवल कुछ पैसे जोड़ना नहीं रह गया है। अब इसका मतलब यह सुनिश्चित करना है कि आपकी जमा पूंजी महंगाई, अनिश्चितता और महंगे होते इलाज के बोझ को कम से कम तीस साल तक झेल सके।
और उन आपात स्थितियों का क्या जिन्हें कोई रिटायरमेंट शीट कभी जगह नहीं देती? जैसे कोई गंभीर बीमारी और किसी निजी अस्पताल का इलाज, जिसका बिल कई लाख रुपये आ जाए। एक ही गंभीर बीमारी कुछ ही दिनों में बरसों की ब्याज से हुई कमाई को साफ कर सकती है। ऐसा इसलिए नहीं होता कि बुजुर्गों ने प्लानिंग खराब की थी, बल्कि इसलिए क्योंकि आधुनिक चिकित्सा तकनीक जितनी उन्नत हुई है, उतनी ही महंगी भी हो गई है।
बदल चुके हैं रिटायरमेंट के नियम
दशकों तक भारतीयों के पास एक सीधा सा फार्मूला था। कड़ी समझदारी से काम करो, सूझबूझ से पैसे बचाओ और सुरक्षित जगह निवेश करो। लेकिन अब रिटायरमेंट के नियम पूरी तरह बदल चुके हैं। एक पीढ़ी पहले जो बुजुर्ग रिटायर होते थे, उनके पास पेंशन होती थी, उम्र कम होती थी और परिवार का साथ होता था। आज करोड़ों लोग बिना पेंशन के रिटायर होते हैं, अस्सी की उम्र तक जीते हैं और अक्सर ऐसे एकल परिवारों में रहते हैं जहां बच्चे दूसरे शहर या दूसरे देश में नौकरी करते हैं।
रिटायरमेंट अब जिंदगी का वह दौर बन चुका है जहां कमाई सीमित हो जाती है और अनिश्चितता अनंत हो जाती है। आज कोई यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि दस साल बाद ब्याज दरें क्या होंगी। कोई नहीं जानता कि साल 2046 में दवाइयां कितने की मिलेंगी, महंगाई बचत से आगे निकल जाएगी या रिटायरमेंट कितने साल और चलेगा।
अब रिटायरमेंट धन इकट्ठा करने का खेल नहीं रहा, बल्कि अनिश्चितताओं से निपटने का नाम बन चुका है। इसी वजह से कई लोगों को ऐसे फैसले लेने पड़ रहे हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लोग जरूरी इलाज टाल रहे हैं, घर की मरम्मत रोक रहे हैं, अपने शौक के खर्चे घटा रहे हैं या फिर उस मूलधन को निकालने पर मजबूर हो रहे हैं जिसे वे छूना तक नहीं चाहते थे। असली डर विलासिता का नहीं, बल्कि पूंजी के कटाव का है।
बदलता बुढ़ापा और सामाजिक बदलाव
इस बदलाव की सबसे शांत तस्वीर भारत भर में तेजी से उभरती सीनियर लिविंग कम्युनिटी यानी वृद्ध आश्रमों और विशेष आवासों के रूप में दिखाई देती है। कभी इन्हें अपवाद माना जाता था, लेकिन अब ये शहरी जीवन का आम हिस्सा बनते जा रहे हैं। कुछ लोग यहाँ साथ, पेशेवर देखभाल और आत्मनिर्भरता के लिए जाते हैं। वहीं कुछ लोग इसलिए यहाँ रहने को मजबूर हैं क्योंकि परिवार के पास अलग-अलग शहरों में रहकर रोजाना देखभाल करने का वक्त नहीं बचा है। आज रिटायरमेंट केवल एक वित्तीय मील का पत्थर नहीं रह गया है। यह एक बड़ा सामाजिक बदलाव बन चुका है।
यही वजह है कि अब इस मुद्दे पर बातचीत केवल व्यक्तिगत बचत तक सीमित नहीं रह सकती। पेंशन सुधार, सस्ता इलाज, वित्तीय साक्षरता, बुजुर्गों के अनुकूल घर, लंबी अवधि की देखभाल, रिटायरमेंट की आय पर टैक्स और मजबूत सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे अब अलग-थलग नीतिगत सवाल नहीं रहे। ये सब मिलकर भारत की तेजी से बढ़ रही बुजुर्ग आबादी के जीवन की गुणवत्ता को तय करते हैं।
'सुनहरे दिन' शब्द आज भी सुनने में अच्छा लगता है। फिर भी, करोड़ों बुजुर्गों के लिए ये साल कई अनकहे सवाल लेकर आते हैं। क्या जमा पूंजी आखिरी वक्त तक साथ देगी? क्या इलाज का खर्च काबू में रहेगा? क्या महंगाई के बीच इंसान की आत्मनिर्भरता बची रहेगी? क्या किसी बड़ी बीमारी के बाद भी कुछ पैसे बचेंगे? ये केवल किसी एक व्यक्ति की चिंताएं नहीं हैं। ये इस बात के सवाल हैं कि आखिरकार हमारा समाज किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
हर पीढ़ी को अपनी आर्थिक चुनौतियां विरासत में मिलती हैं। हमारे माता-पिता के लिए चुनौती पर्याप्त कमाने की थी। आज के परिवारों के लिए अपना घर खरीदना मुख्य चुनौती है। वहीं जो लोग अब रिटायरमेंट की दहलीज पर हैं, उनके लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनकी जमा पूंजी से उनकी जिंदगी लंबी न पड़ जाए। साफ शब्दों में कहें तो आज रिटायरमेंट का सबसे बड़ा जोखिम जीवन का खत्म होना नहीं, बल्कि जिंदगी खत्म होने से पहले पैसों का खत्म हो जाना है।
