जितेंद्र पुष्प/ गया जी ( बिहार)
गया का नाम लेते ही सबसे पहले पिंडदान, फल्गु नदी और विष्णुपद मंदिर की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इस शहर की पहचान इससे कहीं बड़ी है। यहां धार्मिक आस्था की कई धाराएं एक साथ बहती हैं। इसी गया में फल्गु नदी के किनारे एक ऐसी सूफी खानकाह है, जहां पहुंचकर लोगों को मन की शांति का एहसास होता है। यह जगह है बीथो शरीफ। गया शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित खानकाह बीथो शरीफ और यहां की दरगाह लंबे समय से आस्था का केंद्र बनी हुई है। यहां आने वालों में सिर्फ मुसलमान नहीं हैं। अलग अलग धर्मों के लोग भी मन्नत, दुआ और सुकून की तलाश में यहां पहुंचते हैं।
बीथो शरीफ की पहचान हजरत मखदूम सैयद शाह दुर्वेश अशरफ रहमतुल्लाह अलैह की खानकाह और दरगाह से जुड़ी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार हजरत मखदूम सैयद शाह दुर्वेश अशरफ करीब छह सौ साल पहले ईरान से भारत आए थे।

वह सूफी संत थे और उन्होंने लोगों को प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश दिया। कहा जाता है कि उन्होंने पैदल हज भी किया था। वर्ष 1443 में उन्होंने यहां खानकाह, मस्जिद और अपने रहने के लिए हुजरे की स्थापना की। इसके बाद धीरे धीरे बीथो शरीफ सूफी परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
इस जगह का पुराना नाम भी स्थानीय इतिहास में दिलचस्पी पैदा करता है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार, कभी इसे विथूर कहा जाता था। बाद में हजरत मखदूम ने इसका नाम बेतहू शरीफ रखा। समय के साथ यह नाम बीथो शरीफ के रूप में प्रचलित हो गया। आज यह गांव गया जिले में एक ऐसी जगह के रूप में जाना जाता है, जहां धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेलजोल की भी मजबूत परंपरा दिखाई देती है।
बीथो शरीफ की सबसे खास बात यहां का सामाजिक ताना बाना है। स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में हिंदू और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर है। दोनों समुदाय लंबे समय से एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होते रहे हैं। त्योहारों के मौके पर भी आपसी भागीदारी दिखाई देती है। दरगाह में आने वालों के लिए भी कोई धार्मिक बंदिश नहीं है। हिंदू हों या मुस्लिम, जो व्यक्ति यहां आता है वह अपनी आस्था के मुताबिक दुआ करता है और कुछ देर इस शांत माहौल में बैठता है।
इसी वजह से बीथो शरीफ को गया और बिहार की गंगा जमुनी तहजीब की एक मिसाल माना जाता है। यहां धार्मिक पहचान से ज्यादा इंसान की मौजूदगी दिखाई देती है। फल्गु नदी के किनारे बसे इस गांव की यही खूबी इसे दूसरी धार्मिक जगहों से अलग बनाती है।
खानकाह और दरगाह के मौजूदा गद्दीनशीन सैयद शाह अरबाब अशरफ कहते हैं कि यह केवल धार्मिक स्थल नहीं है। उनके मुताबिक यह इंसानियत का दरबार है, जहां हर व्यक्ति के लिए दरवाजे खुले हैं। यहां धर्म, जाति और भाषा के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाता। लोग अपनी परेशानी लेकर आते हैं। दुआ करते हैं और अपने भीतर सुकून महसूस करके लौटते हैं।
सैयद शाह अरबाब अशरफ का परिवार पीढ़ियों से इस खानकाह की जिम्मेदारी संभालता आया है। उनके पिता शाहिद शाह गया कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे थे। पिता के इंतकाल के बाद सैयद शाह अरबाब अशरफ ने गद्दीनशीनी की जिम्मेदारी संभाली। कोरोना काल में शाहिद शाह का इंतकाल हुआ था। इसके बाद खानकाह की परंपरा और उससे जुड़ी जिम्मेदारियां आगे बढ़ाने का काम सैयद शाह अरबाब अशरफ कर रहे हैं।
बीथो शरीफ की दरगाह से जुड़ी कई मान्यताएं भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। कुछ श्रद्धालुओं का कहना है कि वे लंबे समय से मानसिक परेशानियों से जूझ रहे थे और यहां आने के बाद उन्हें राहत महसूस हुई। कुछ लोग गंभीर बीमारी और जीवन की दूसरी परेशानियों के बीच यहां दुआ करने आते हैं।
स्थानीय लोगों के बीच ऐसे कई किस्से भी सुनने को मिलते हैं, जिनमें लोग दरगाह पर हाजिरी के बाद खुद को बेहतर महसूस करने की बात कहते हैं। ये श्रद्धालुओं की आस्था और व्यक्तिगत अनुभव हैं। इनका चिकित्सकीय इलाज का विकल्प होना जरूरी नहीं है। फिर भी इन मान्यताओं ने बीथो शरीफ की रूहानी पहचान को मजबूत किया है।
शाम के वक्त इस खानकाह का माहौल और भी अलग दिखाई देता है। फल्गु नदी की तरफ से आती हवा वातावरण में ठंडक घोल देती है। दरगाह में चिराग रोशन होते हैं। कहीं धीमी आवाज में कुरान की तिलावत होती है तो कहीं लोग खामोशी से बैठे नजर आते हैं। कुछ श्रद्धालु मजार के पास बैठकर दुआ करते हैं। कुछ देर तक आंखें बंद किए रहते हैं। इस पूरे माहौल में एक ठहराव है। शायद इसी वजह से दूर से आने वाले लोग यहां कुछ समय रुकना पसंद करते हैं।
दरगाह परिसर में हजरत मखदूम सैयद शाह दुर्वेश अशरफ की मजार के साथ उनकी बीबी जान मलक और परिवार के दूसरे सदस्यों की मजारें भी मौजूद हैं। परिसर में एक पुराना चिराग भी सुरक्षित रखा गया है। स्थानीय मान्यता है कि यह चिराग सदियों पुराना है। इसे हर शाम रोशन किया जाता है। श्रद्धालु इसे बरकत और रूहानी रोशनी का प्रतीक मानते हैं।
बीथो शरीफ का सबसे बड़ा आयोजन सालाना उर्स है। उर्स के दौरान यह शांत गांव अचानक लोगों की भीड़ और रौनक से भर जाता है। बिहार के अलग अलग जिलों के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और ओडिशा से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। नेपाल से आने वाले जायरीन भी इस आयोजन में शामिल होते हैं। पांच दिनों तक चलने वाले उर्स में चादरपोशी, कुरानखानी, कव्वाली और लंगर का आयोजन होता है।
उर्स के दौरान दरगाह से जुड़ी पवित्र निशानियां भी श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखी जाती हैं। इनमें हजरत मखदूम से जुड़ा वस्त्र, टोपी और तस्बीह शामिल हैं। लोग इन निशानियों को श्रद्धा से देखते हैं। रात के समय कव्वाली और इबादत का सिलसिला चलता रहता है। कई श्रद्धालु देर रात तक दरगाह परिसर में मौजूद रहते हैं।
बीथो शरीफ का प्रभाव धार्मिक और सामाजिक दायरे से आगे भी दिखाई देता है। बिहार की राजनीति में भी इस दरगाह की अपनी पहचान है। चुनाव के दौरान कई राजनीतिक नेता यहां पहुंचते रहे हैं और चादरपोशी करते हैं। उनके आने से यह जगह राजनीतिक चर्चा में भी आ जाती है। हालांकि आम श्रद्धालुओं के लिए दरगाह का महत्व राजनीति से कहीं अलग है। उनके लिए यह दुआ, भरोसे और आध्यात्मिक शांति की जगह है।
दरगाह परिसर में बाहर से आने वाले जायरीनों के लिए बुनियादी सुविधाएं भी मौजूद हैं। मुसाफिरखाना, पानी, शौचालय और बिजली की व्यवस्था है। कई लोग परिवार के साथ आते हैं और कुछ समय यहां ठहरते हैं। कुछ श्रद्धालु अकेले भी आते हैं। उनके लिए यहां कुछ घंटे बैठना ही यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
गया की इस सूफी खानकाह की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि यहां किसी को अपनी पहचान साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती। दरगाह के दरवाजे पर धर्म और जाति की पहचान पीछे छूट जाती है। सामने सिर्फ एक इंसान होता है और उसके मन में पल रही कोई इच्छा, परेशानी या उम्मीद।
आज जब समाज में धार्मिक पहचान को लेकर बहस तेज है, बीथो शरीफ का माहौल एक अलग तस्वीर पेश करता है। यहां हिंदू और मुस्लिम परिवारों का साथ रहना, त्योहारों में एक दूसरे की भागीदारी और दरगाह में हर समुदाय के लोगों का पहुंचना इस जगह की पुरानी सामाजिक परंपरा को सामने लाता है।

बीथो शरीफ इसलिए सिर्फ गया की एक पुरानी दरगाह नहीं है। यह बिहार की सूफी विरासत, गंगा जमुनी तहजीब और साझा संस्कृति का जीवंत हिस्सा है। यहां आने वाला हर व्यक्ति अपने साथ अपनी कहानी लेकर आता है। कोई मन्नत लेकर पहुंचता है। कोई परेशानी लेकर। कोई सिर्फ इस जगह की शांति देखने आता है। लौटते समय सबके पास शायद अलग अनुभव होता है, लेकिन एक बात समान रहती है। कुछ देर के लिए सही, मन को ठहरने की जगह मिल जाती है।
फल्गु नदी के किनारे जलता वह पुराना चिराग इसी भरोसे की तरह दिखाई देता है। बीथो शरीफ की पहचान इसी रोशनी में है। यहां रूह को राहत देने का दावा किसी मशीन या प्रमाण से नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, दुआ और इंसानी रिश्तों से जुड़ा है। शायद इसी वजह से गया आने वाले कई लोगों के लिए विष्णुपद और पिंडदान की यात्रा के साथ बीथो शरीफ की खानकाह भी एक ऐसी जगह बन गई है, जहां कुछ देर बैठकर इंसान अपने भीतर झांक सकता है।