मलिक असगर हाशमी
हिंदी साहित्य के कद्दावर हस्ताक्षर सैयद असगर वजाहत वैसे तो यूपी के फतेहपुर के चिराग हैं, लेकिन जब जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तो मन मचल रहा था कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जाकर जमावड़ा लगाया जाए । मगर माता जी की सख्त हिदायत थी--"बेटा ! पढ़ाई होगी तो सिर्फ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से!" वजह साफ़ थी, ननिहाल के कुछ सूरमा वहाँ प्रोफेसर की कुर्सियों पर विराजमान थे। सो, भारी मन से वजाहत साहब का बोरिया-बिस्तर AMU के हॉस्टल में टिका दिया गया।
अब नियति का खेल देखिए ! हॉस्टल में कदम रखते ही असगर साहब की मुलाकात हुई मुजफ्फर अली से (वही, जो आगे चलकर 'उमराव जान' जैसी फिल्में बनाकर मशहूर हुए)। दोनों का साइंस (केमिस्ट्री) में दाखिला तो हो गया था, पर सच पूछिए तो दोनों की रूह का 'केमिकल लोचा' कुछ और ही था। पढ़ाई-लिखाई को छोड़कर दुनिया का हर फालतू काम करने में दोनों का मन ज़ोर-शोर से लगता था! कला, साहित्य और मटरगश्ती-बस यही दो दोस्तों का असली सिलेबस था।
बीड़ी का बंडल और गार्ड साहब की दया!
रात-दिन मटरगश्ती करने वाले इन दोनों 'मजनुओं' की सबसे बड़ी आफ़त थी--हॉस्टल का मेन गेट और वहाँ बैठा खूँखार गार्ड! देर से आने वाले हर परिंदे का नाम रजिस्टर में चढ़ जाता था, जिसके बाद यूनिवर्सिटी के 'प्रोक्टर साहब' ऐसी खबर लेते थे कि नानी याद आ जाए।
लेकिन हमारे दोनों उस्ताद भी कम दिमाग़ी खिलाड़ी नहीं थे! उन्होंने गार्ड की सबसे कमज़ोर नब्ज़ पकड़ ली थी-बीड़ी का बंडल !

मुजफ््फर अली के नौजवानी की एक दुलर्भ तस्वीर
देर रात जब दोनों टहलते हुए हॉस्टल लौटते, तो जेब में बीड़ी का एक ताज़ा बंडल तैयार रहता। रिश्वत हाथ में पहुँचते ही गार्ड साहब का दिल मोम हो जाता। वह आँख मारते हुए बीड़ी जेब में सरकाते और एक नकली घूर के साथ चेतावनी देते.."देख भाई! आज तो छोड़ रहा हूँ, कल से टाइम पे आना!"
दोनों दोस्त बड़ी मासूमियत से सीना ठोककर झूठा वादा करते..."हाँ-हाँ चाचा, बिल्कुल!"... और अगले दिन फिर वही बीड़ी, वही रिश्वत और वही पुरानी टाइमिंग!
'मौलाना घोड़ी' और पान का चक्कर
AMU में इन दोनों का एक सब्जेक्ट था 'शिया थियोलॉजी'। इस विषय को पढ़ाने वाले मौलाना साहब का असली नाम तो शायद इतिहास के पन्नों में खो चुका था, क्योंकि पूरी यूनिवर्सिटी उन्हें 'मौलाना घोड़ी' के नाम से ही जानती थी।
मौलाना साहब पान के ज़बरदस्त शौकीन थे और हमेशा अपनी चांदी की डिबिया साथ रखते थे। हमारे वजाहत साहब के पास क्लास से रफ़ूचक्कर होने का सबसे शानदार बहाना यही था। जैसे ही मौलाना का पान खत्म होने को आता, असगर साहब बेहद आज्ञाकारी छात्र बनकर खड़े होते—"मौलाना साहब, पान ले आऊँ?" और बस! पान लाने के बहाने जो क्लास से चंपत होते, तो सीधे अगले दिन ही दर्शन देते थे !

असगर वजहत अपने घर के लान में
प्रेक्टिकल की पैरवी और 'आधे दाम में किताबें '!
अब आया परीक्षा का मौसम! केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल में पास होने की कोई उम्मीद दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी। तो दोनों ने सोचा..क्यों न थोड़ी जुगाड़बाजी की जाए ? दोनों हिंदी के एक सीधे-साधे टीचर को साथ लेकर केमिस्ट्री के प्रोफेसर के पास पहुँचे और बड़े प्यार से पैरवी लगवाई।
केमिस्ट्री वाले प्रोफेसर साहब ने चश्मा नाक पर टिकाया, दोनों को ऊपर से नीचे तक घूरा और मुँह बनाकर बोले—"अरे भाई ! ये दोनों कौन हैं? मैंने तो आज तक इन्हें अपनी क्लास की शक्ल भी नहीं दिखाई!"
जवाब सुनते ही पैरवी के सारे गुब्बारे की हवा निकल गई। दोनों मायूस होकर बाहर निकले। अब फेल होना तो तय दिख रहा था! ऐसे में मातम मनाने के बजाय दोनों ने जो किया, वह सिर्फ वही कर सकते थे !
उन्होंने तुरंत अपनी केमिस्ट्री की सारी नई-नवेली किताबें आधी कीमत पर कबाड़ी को बेचीं। जो पैसे मिले, उससे सीधे 'पेकर होटल' पहुँचे, दबाकर मुर्ग-मुसल्लम उड़ाया, सिनेमा हॉल में जाकर मस्त फिल्म देखी और अगली ट्रेन पकड़कर अपने-अपने घर के लिए रफ़ूचक्कर हो गए,जहाँ पहुँचकर ज़ाहिर है, दोनों को घरवालों से भरपूर डांट का स्वाद चखना पड़ा!
(द एवर न्यूज पाॅडकास्ट का अंश)