खेल सबका है

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 10-08-2026
The game belongs to everyone.
The game belongs to everyone.

 

ssशम्स आलम

विकलांगता कोई अभिशाप नहीं होती। यह बात सच है कि जीवन में अचानक आई कोई शारीरिक कमी इंसान को अंदर तक हिला देती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि जिंदगी वहीं रुक जाए। जब मैं अपने शुरुआती खेल जीवन को देखता हूँ और आज खुद को जिस मुकाम पर पाता हूँ, तो मुझे अपने आप पर गर्व महसूस होता है। सच कहूँ तो हादसे से पहले का सामान्य जीवन जैसा था, आज का जीवन उससे कहीं ज्यादा बेहतर, सार्थक और बुलंदियों से भरा है।

खेल एक ऐसा माध्यम है जिसके दम पर एक पैरा खिलाड़ी वह सब कुछ हासिल कर सकता है जो एक सामान्य खिलाड़ी पाता है। सम्मान, पैसा, पहचान और शोहरत सब कुछ मेहनत के बल पर मिलता है। फ्रांस दूतावास और पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया के सहयोग से मुझे दिल्ली में 'पैरा ऐलान - सब का मैदान' कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ अलग-अलग स्कूलों से आए तीन सौ से ज्यादा बच्चों के साथ मैंने अपना जीवन अनुभव साझा किया।
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बच्चों के मन में पैरा खेलों को लेकर कई सवाल थे। उनके साथ बातचीत करके और उनकी जिज्ञासा को देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। उन बच्चों का नजरिया अब हमारे प्रति पूरी तरह बदल चुका है। वे समझ चुके हैं कि मैदान हर उस इंसान का है जिसमें मेहनत करने का जज्बा है।

मधुबनी के छोटे से गांव से मुंबई का शुरुआती सफर

मेरा जन्म बिहार के मधुबनी जिले के बिस्फी प्रखंड के एक छोटे से गांव राठोस में हुआ था। हमारे गांव में शिक्षा के साधन बहुत सीमित थे। बुनियादी सुविधाएं न के बराबर थीं और वहां रहकर कोई बड़ा सपना देखना बहुत मुश्किल काम था। मेरा बचपन गांव के तालाब में तैरते हुए और कच्ची जमीन पर दोस्तों के साथ कबड्डी खेलते हुए बीता। मन में हमेशा एक अच्छे स्कूल की वर्दी पहनने का सपना रहता था।

अच्छी पढ़ाई की तलाश मुझे बहुत छोटी उम्र में मुंबई ले आई। मुंबई आने के बाद मुझे अकेले रहना पड़ा। खुद खाना बनाना, पढ़ाई करना और रोजमर्रा के काम संभालना मैंने बहुत कम उम्र में सीख लिया था। जिस उम्र में बच्चे खेलकूद में मस्त रहते हैं, उस उम्र में मैं अपनी जिंदगी को सही ढर्रे पर लाने के लिए संघर्ष कर रहा था।

मुंबई में ही खेल धीरे-धीरे मेरी पहचान बन गया। मैंने कराटे सीखा और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर राष्ट्रीय स्तर का कराटे खिलाड़ी बना। वर्ष 2010 में मेरा चयन एशियन गेम्स के लिए लगभग तय हो गया था। मैं भारत का प्रतिनिधित्व करने के बेहद करीब था।

रीढ़ की हड्डी का ट्यूमर और जीवन में आई अचानक रुकावट

उसी समय मेरी जिंदगी में एक ऐसा भयानक मोड़ आया जिसने सब कुछ बदलकर रख दिया। मेरी रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर का पता चला। ट्यूमर की सर्जरी के दौरान हुई एक चूक के कारण मेरे शरीर का निचला हिस्सा हमेशा के लिए पैरालाइज्ड हो गया।

रातों-रात मेरे चलने की क्षमता चली गई। जो सपने मैंने सालों से संजोए थे, वे एक झटके में टूटते हुए दिखे। इस कठिन समय में कई करीबियों ने साथ छोड़ दिया। रातें आंसुओं में बीतती थीं। मेरा आत्मविश्वास मेरी शारीरिक हालत से उतना नहीं टूटा था, जितना समाज के रवैये और कड़वी बातों से टूट रहा था।

लेकिन एक खिलाड़ी का दिल कभी हार नहीं मानता। मुंबई के पैराप्लेजिक फाउंडेशन में इलाज के दौरान मुझे एहसास हुआ कि तैराकी मेरे लिए केवल एक फिजियोथेरेपी नहीं है। यह मेरे जीवन की एक नई शुरुआत बन सकती है। बचपन में गांव के जिस तालाब में मैं अनजाने में तैरा करता था, उसी ने मुझे इस नए भविष्य के लिए तैयार किया था। मैंने तैराकी को गंभीरता से लिया और पैरा स्विमिंग की दुनिया में कदम रखा।

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का नाम और विश्व रिकॉर्ड

पैरा तैराकी शुरू करने के बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। राज्य स्तर से शुरू होकर मैं राष्ट्रीय चैंपियनशिप और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुँचा। मैंने जर्मनी, कनाडा, पोलैंड, पुर्तगाल और आइसलैंड जैसे देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और देश के लिए कई पदक जीते। 2018 में जकार्ता एशियन पैरा गेम्स में मैंने 43 देशों के एथलीटों के बीच चौथा स्थान प्राप्त किया।

वर्ष 2022 में पुर्तगाल में हुई वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में मैंने दुनिया के टॉप 10 तैराकों में जगह बनाई। आइसलैंड में 2024 और 2025 की प्रतियोगिताओं में मैंने 12 पदक जीते। इसमें स्वर्ण पदक के साथ 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में नया एशियन रिकॉर्ड भी शामिल है।

स्विमिंग पूल के अलावा मैंने खुले समुद्र और नदियों में भी तैराकी की। मुंबई में सनक रॉक से गेटवे ऑफ इंडिया तक 6 किलोमीटर की दूरी 1 घंटे 40 मिनट 28 सेकंड में तैरकर पूरी की। इसके लिए मेरा नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। गोवा में मैंने 8 किलोमीटर की समुद्री तैराकी की, जिसमें 5 किलोमीटर समुद्र की उलटी लहरों के खिलाफ तैरना शामिल था। इसका मकसद समुद्र तटों को दिव्यांगों के लिए सुगम बनाने का संदेश देना था।

वर्ष 2024 में पटना में गंगा नदी में 13 किलोमीटर की ओपन वाटर स्विम 2 घंटे 13 मिनट में पूरी करके मैंने एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। इन उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने मुझे देश के राष्ट्रपति के हाथों 'राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ दिव्यांग खिलाड़ी पुरस्कार' से सम्मानित किया। मैं बिहार से यह राष्ट्रीय सम्मान पाने वाला पहला पैरा एथलीट बना।
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स्कूलों के बच्चों के साथ संवाद और समावेशी खेल का संदेश

मेरी इस यात्रा पर एक प्रेरणादायक डॉक्यूमेंट्री भी बनी है जो मेरी जिंदगी के संघर्षों और सफलताओं को दिखाती है। लेकिन मेरा असली लक्ष्य केवल पदक जीतना नहीं है। मेरा लक्ष्य भारत के हर सार्वजनिक स्थान और खेल के मैदान को इतना सुगम बनाना है कि हर दिव्यांग व्यक्ति बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ सके।

इसी उद्देश्य से दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में मैंने भाग लिया। इस कार्यक्रम में भारत में फ्रांस के राजदूत थिएरी माथू, पैरा एथलेटिक्स महासंघ के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र सिंह, पैरालंपिक पदक विजेता शरद कुमार और दिल्ली सरकार के शिक्षा अधिकारी शामिल हुए थे।

300 से ज्यादा स्कूली बच्चों के साथ जो समय मैंने बिताया, वह बहुत खास था। बच्चों ने पैरा खेलों के बारे में कई सवाल पूछे और यह समझा कि दिव्यांगता किसी की क्षमता को रोक नहीं सकती। हमारा साझा संदेश बहुत साफ है कि खेल का मैदान किसी एक का नहीं, बल्कि सब का है। अगर हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां सबको साथ लेकर चला जाए, तो हर बच्चा अपनी प्रतिभा के बल पर दुनिया में चमक सकता है।

( लेखक  अंतरराष्ट्रीय पैरा स्वीमर हैं)