लोन वुल्फ अटैक के बाद

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 03-08-2026
After the Lone Wolf Attack
After the Lone Wolf Attack

 

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रक्षा विशेषज्ञ जब आंतकवादी हमलों का विश्लेषण करते हैं तो इनमें एक हमला सबसे अलग तरह का होता है - लोन वुल्फ अटैक। किसी अतिवादी विचारधारा से प्रभावित एक अकेला व्यक्ति एक दिन अचानक किसी भीड़ पर हमला बोल देता है। कभी वह किसी जुलूस पर गाड़ी चढ़ा देता है या फिर गोलीबारी करने लगता है।

ऐसे हमलों में शुरू से आखिर तक सिर्फ व्यक्ति शामिल होता है इसलिए इसकी जांच भी बहुत दूर तक नहीं जा पाती। लोन वुल्फ अटैक इसे इसलिए कहा जाता है क्योंकि धारणा यह है कि किसी भेड़िये को जब उसके झुंड से अलग कर दिया जाता है तो वह ज्यादा खतरनाक हो जाता है और वह कभी भी किसी पर हमला कर सकता है।

पिछले सप्ताह जर्मनी में एक लोन वुल्फ अटैक हुआ। बर्लिन में हर साल होने वाले क्रिस्टोफर स्ट्रीट डे के जुलूस पर एक व्यक्ति ने एक एसयूवी चढ़ा दी। इस हमले में एक व्यक्ति मारा गया और कईं घायल हो गए। नुकसान ज्यादा न हो इसके लिए वहां मौजूद सुरक्षा बलों ने गोली चलाकर गाड़ी के चालक मार गिराया।

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जांच हुई तो पता पड़ा कि वह व्यक्ति जर्मनी का नागरिक था और इस्लामिक स्टेट की विचारधारा से काफी प्रभावित था। पिछले साल उसने सीरिया और तुर्की वगैरह देशों की यात्रा की थी और शायद वहीं कहीं उसके इस्लामिक स्टेट की लोगों के संपर्क बने हों। हालांकि यह दूसरी बात सिर्फ पुलिस की अटकल ही है, लेकिन उसकी विचारधारा के पुलिस को जरूर कईं सबूत मिले हैं।

वैसे क्रिस्टोफर स्ट्रीट डे जर्मनी को कोई त्योहार नहीं है, यह सिर्फ एक दिवस है जिसे वहां के समलैंगिक लोग हर साल मनाते हैं और एक जुलूस निकालते हैं। इसे प्राइड परेड भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन वे यह बताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें अपनी समलैंगिकता पर गर्व है। इसमें जर्मनी के नागरिक अधिकार संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

मुमकिन है कि कट्टरपंथी होने की वजह से हमलावर इसे पूरी तरह गलत मानता हो और इसीलिए उसने हमला किया हो। लेकिन लोकतंत्र में असहमति किसी को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं देती।दूसरे पश्चिमी देशों की तरह ही जर्मनी में भी इस्लामफोबिया यानी इस्लाम का खौफ फैलाने की कोशिश हो रही है। वहां की दक्षिणपंथी पार्टियां इसे हवा देने में काफी आगे रहती हैं। जर्मनी का मुख्य विपक्षी दल अल्टरनेटिव फाॅर जर्मनी तो इसके लिए काफी बदनाम है।

जर्मनी में सात से आठ फीसदी तक आबादी मुसलमानों की है। धार्मिक आधार पर यह मुल्क की सबसे बड़ी आबादी है। इनमें ज्यादातर लोग वे हैं जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की से मजदूरी करने केे लिए यहां लाए गए थे और फिर यहीं बस गए। हालांकि वहां दूसरे देशों से आए मुस्लिम भी काफी संख्या में हैं। पिछले कुछ साल में वहां सीरिया से भी काफी लोग आए हैं।

घटना की खबर आते ही वहां के इस्लामिक संगठनों को लगा कि इसके बाद इस्लामफोबिया और भड़क सकता है। सबसे पहले बर्लिन के इमामों का संगठन कौंसिल आॅफ बर्लिन इमाम आगे आया उसे साफ शब्दों में इस हमले की निंदा की। संगठन ने यह भी कहा कि हम इस हमले में मारे गए लोगों के साथ हैं और यह भी कि मजहब में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है।

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इसके बाद बहुत से मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने आगे बढ़कर मीडिया को इंटरव्यू वगैरह देने शुरू किए। जैसे मंस्टर विश्वविद्यालय में सेंटर फाॅर इस्लामिक थियोलाॅजी के डीन मोहनद कोरचिदे ने इस बात को बार-बार कहा कि कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन जर्मनी के मुसलमान कट्टरपंथी नहीं हैं और वे इस्लामिक स्टेट को नहीं मानते।

सेंट्रल कौंसिल आॅफ मुस्लिम इन जर्मनी और इस्लामिक कौंसिल फाॅर फेडरल रिपब्लिक आॅफ जर्मनी के नेताओं ने भी आगे आकर कहा कि वे किसी भी तरह की हिंसा की निंदा करते हैं।ये सारे कदम इस समय जरूरी थे लेकिन जिस तरह से जर्मनी में इस्लामफोबिया बढ़ रहा है इसके आगे भी कुछ सोचने की जरूरत है। इससे तो लड़ाई शायद हर रोज ही लड़नी होगी, किसी एक मौके पर नहीं।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

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