गांव की सड़क और विकास: हक, जरूरत और जमीन का उलझा सच

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 07-08-2026
Village Roads and Development: Rights, Needs, and the Complex Reality of Land
Village Roads and Development: Rights, Needs, and the Complex Reality of Land

 

ffअंकि कुमारी

गांव तक सड़क पहुंचना केवल विकास का कोई कागजी आंकड़ा नहीं है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षित आवागमन का सीधा रास्ता होता है।प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का मुख्य उद्देश्य भी ग्रामीण बस्तियों को हर मौसम के अनुकूल पक्की सड़कों से जोड़ना है।बिहार में इस दिशा में पिछले कुछ सालों के दौरान काफी काम हुआ है और हजारों किलोमीटर लंबी ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाया गया है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में ग्रामीण सड़क संपर्क को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर काम पूरा हो चुका है।

लेकिन किसी भी योजना की असल सफलता केवल कागजी किलोमीटर या आंकड़ों से तय नहीं की जा सकती। असली सवाल यह होता है कि क्या सड़क सचमुच गांव के आखिरी घर तक पहुंची है। क्या वह रास्ता साल के बारह महीने लोगों के उपयोग के लायक है।

आज भी राज्य के कई गांव ऐसे हैं जहां पक्की सड़क गांव की सीमा के बाहर ही दम तोड़ देती है। इसके पीछे हर बार प्रशासनिक लापरवाही या बजट की कमी हो यह जरूरी नहीं है। कई बार विकास के कामों और निजी जमीन के कानूनी अधिकारों के बीच खड़े हुए विवाद इन पक्की सड़कों का रास्ता रोक लेते हैं।

सीतामढ़ी जिले के ललितपुर गांव की एक बानगी इसी जटिल समस्या की तरफ इशारा करती है। इस गांव के अंदरूनी हिस्सों तक पक्की सड़क पहुंचाने की राह में कुछ स्थानीय लोगों की निजी जमीन आ रही है।

हालांकि सरकार की तरफ से भूमि अधिग्रहण या उपयोग के बदले उचित मुआवजा देने का प्रावधान है। लेकिन दूसरी तरफ जमीन मालिकों का तर्क है कि उन्हें मिलने वाला मुआवजा बाजार की वास्तविक कीमत से काफी कम है। इसी बात को लेकर उपजी असहमति के कारण वे सड़क निर्माण के लिए अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं दिखते हैं।

पक्की सड़क न होने का सबसे भारी और बुरा असर बरसात के दिनों में देखने को मिलता है। कच्चे रास्तों पर पानी और कीचड़ भर जाने के बाद पैदल चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। ऐसे वक्त में गांव के भीतर किसी मरीज के लिए एम्बुलेंस या आपातकालीन वाहन का पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है।

बीमारी या प्रसव जैसी गंभीर स्थिति में यह परेशानी पूरे परिवार के लिए भारी संकट बन जाती है। मरीज को मुख्य सड़क तक लाने के लिए परिजनों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है और अतिरिक्त समय गंवाना पड़ता है।

इस सड़क समस्या का एक ऐसा पहलू भी है जिस पर कम ही लोगों का ध्यान जाता है। यह पहलू ग्रामीण इलाकों की किशोरियों की पढ़ाई से जुड़ा हुआ है। गांव की बेटियों के लिए स्कूल तक का सफर केवल दूरी तय करने भर का मामला नहीं है।

रास्ते की खराब हालत, मौसम की मार, सुरक्षित परिवहन की कमी और परिवार की चिंताएं उनकी नियमित शिक्षा की राह में बड़ी दीवार बन जाती हैं। जब रास्ता कीचड़ से भरा होता है तो स्कूल आने जाने में ज्यादा वक्त लगता है। बरसात के मौसम में अकेले घर से निकलना मुश्किल हो जाता है।

ऐसी सूरत में परिवार कई बार किशोरियों को खराब रास्तों पर भेजने से कतराने लगता है, खासकर तब जब स्कूल गांव से बाहर किसी दूसरे इलाके में हो। इस डर और असुविधा का नतीजा यह होता है कि पढ़ाई से कुछ दिनों की गैरहाजिरी धीरे-धीरे हमेशा के लिए स्कूल छूटने की वजह बन जाती है।

ग्रामीण किशोरियों के लिए शिक्षा का हर एक साल उनके भविष्य के अवसरों और विकल्पों को विस्तार देता है। स्कूल पहुंचने में आने वाली यह दिक्कत केवल आज की परेशानी नहीं है। इसका सीधा असर उनके उच्च अध्ययन, कौशल विकास, रोजगार और समाज में उनकी सक्रिय भागीदारी पर पड़ता है।

जब खराब सड़क के कारण किसी बेटी के कदम रुक जाते हैं, तो उसके आगे बढ़ने के रास्ते भी सीमित हो जाते हैं। इसके उलट अगर गांव में पक्की और बेहतर सड़क हो तो स्कूल, अस्पताल, बाजार और सार्वजनिक साधन आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इससे परिवारों का हौसला भी बढ़ता है और वे बेझिझक बच्चों की पढ़ाई जारी रखते हैं।

ग्रामीण समाज में जमीन सिर्फ एक संपत्ति का टुकड़ा भर नहीं होती है। वह परिवार की आजीविका का साधन, भविष्य की सुरक्षा और कई पीढ़ियों की भावनाओं से जुड़ी पूंजी होती है। इसलिए किसी भी ग्रामीण की जमीन से जुड़े मुद्दों और वाजिब मुआवजे की मांग को नजरअंदाज करके सड़क जैसी समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाना मुमकिन नहीं है।

साथ ही यह पहलू भी उतना ही अहम है कि कुछ परिवारों की निजी जमीनों का आपसी विवाद पूरे गांव की बड़ी आबादी को बुनियादी सुविधाओं से वंचित न कर दे।

ललितपुर जैसी जगहों के इस गतिरोध को केवल सड़क और जमीन के बीच का विवाद मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसे इस बड़े सवाल के रूप में देखना जरूरी है कि विकास का फायदा हर एक इंसान तक कैसे पहुंचे और साथ ही अपनी जमीन देने वाले परिवार के अधिकारों का हनन भी न हो। इस तरह की उलझनों का हल टकराव या जबरदस्ती से कभी नहीं निकल सकता। इसका एकमात्र रास्ता आपसी बातचीत, संवाद और भरोसे की बहाली है।

प्रशासन को चाहिए कि वह जमीन मालिकों, स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों, ग्रामीणों और सड़क निर्माण से जुड़े नुमाइंदों को एक मंच पर लाए। सबकी संयुक्त बैठक कराकर इस समस्या का व्यावहारिक हल निकाला जाना चाहिए।

जहां तकनीकी रूप से संभव हो, वहां सड़क के ऐसे वैकल्पिक रास्तों पर भी विचार किया जा सकता है जिससे कम से कम निजी जमीन प्रभावित हो। यदि जमीन लेना पूरी तरह अनिवार्य ही हो, तो मुआवजे को लेकर अड़े पेंच का निष्पक्ष और संतोषजनक हल निकाला जाना चाहिए।

इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित होना कागजी खानापूर्ति के लिए नहीं बल्कि धरातल पर होना चाहिए कि विकास की रोशनी गांव के अंतिम छोर तक पहुंचे। ग्रामीण विकास की असली परख इसी बात में है कि योजना की पहुंच वहां तक हो जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

सड़क केवल गिट्टी, मिट्टी और डामर का ढांचा नहीं होती। उसके हर एक मीटर के दायरे में लोगों के अधिकार, उनकी रोजी-रोटी और पूरे समुदाय की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। इसलिए सरकार और स्थानीय लोगों दोनों को थोड़ा आगे बढ़कर एक साझा और टिकाऊ रास्ता तलाशना होगा ताकि सबका विकास संभव हो सके।

(यह लेखिका की निजी राय है)