नुरुल हक/ अगरतला
असम में बाढ़ का पानी बढ़ने के साथ एक पुरानी समस्या फिर सामने आई है। पीने के साफ पानी का संकट। कई इलाकों में घर डूब गए हैं। सड़कें टूट गई हैं। गांवों का संपर्क मुख्य सड़कों से कट गया है। ऐसे में राहत सामग्री पहुंचाना आसान नहीं है। खासकर साफ पीने का पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती बन जाता है। इसी मुश्किल के बीच त्रिपुरा से निकली एक तकनीक असम के बाढ़ प्रभावित इलाकों में लोगों के काम आ रही है।
त्रिपुरा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एक युवा प्रोफेसर की अगुवाई में छात्रों के एक समूह ने पानी साफ करने की ऐसी व्यवस्था विकसित की है, जिसे जरूरत के हिसाब से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। एचएन टेक्नोवेशन्स का इंस्टावाटर मोबाइल वॉटर प्यूरिफिकेशन सिस्टम इस समय असम के सिबसागर जिले के बाढ़ प्रभावित और दूरदराज के इलाकों में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि बाढ़ के गंदे पानी को मौके पर ही साफ करके पीने लायक पानी बनाया जा सकता है।

राहत अभियान के दौरान अब तक सिबसागर जिले में 400 से अधिक परिवारों को इसका लाभ मिला है। करीब 15,000 लीटर साफ पीने का पानी लोगों तक पहुंचाया जा चुका है। यह काम शानमुख, नागांव, नेपालीखुटी और आसपास के कई बाढ़ प्रभावित इलाकों में किया जा रहा है। स्थानीय स्वयंसेवी और मानवीय सहायता संगठनों के साथ मिलकर इंस्टावाटर की टीम मोबाइल वॉटर प्यूरिफिकेशन सिस्टम चला रही है।
इस पहल की एक और खास बात है। यह केवल पानी की समस्या का समाधान नहीं करती। इससे बोतलबंद पानी पर निर्भरता भी घटती है। बाढ़ के समय राहत शिविरों और गांवों में बड़ी मात्रा में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर पहुंचाया जाता है। इसके साथ प्लास्टिक की बोतलों का कचरा भी बढ़ता है। इंस्टावाटर के अनुमान के मुताबिक, असम के मौजूदा राहत अभियान में करीब 150 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा बनने से रोका जा सका है।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में इस तकनीक की उपयोगिता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि इसे सड़क से लेकर नाव तक के जरिए पहुंचाया जा सकता है। जब पानी बढ़ता है और सड़क संपर्क टूट जाता है, तब स्थानीय नावें ही आने जाने का मुख्य साधन बनती हैं। ऐसी स्थिति में हजारों बोतल पानी नावों से ले जाना मुश्किल और महंगा हो सकता है। इसके बजाय मोबाइल वॉटर प्यूरिफिकेशन सिस्टम को ही नाव पर ले जाकर स्थानीय जलस्रोत के पानी को साफ किया जा सकता है।
इंस्टावाटर के अलग अलग सिस्टम में COM 5000 भी शामिल है। यह करीब 300 लीटर पानी प्रति घंटे साफ करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा पोर्टा हाइब्रिड बॉक्स भी राहत अभियान का हिस्सा है। इसे सौर ऊर्जा से चार्ज किया जा सकता है। इसमें पावर बैकअप की सुविधा है। यह सिस्टम नाव से भी दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाया जा सकता है। इसकी क्षमता करीब 100 लीटर साफ पीने का पानी प्रति घंटे तैयार करने की है।
Assams floodwater into safe drinking water what an innovation 👏👏 pic.twitter.com/O2YJDKBs9Z
— SanghiDentico🇮🇳,🚩🚩🕉️ (@priyathedentico) August 8, 2026
बाढ़ जैसी आपदा में इस तरह की तकनीक का महत्व सिर्फ इसकी क्षमता में नहीं है। इसकी असली ताकत इसकी पोर्टेबिलिटी है। जरूरत वाली जगह पर इसे जल्दी पहुंचाया जा सकता है। पानी के स्रोत के पास ही शुद्धिकरण किया जा सकता है। इससे पानी को दूर से ढोकर लाने की जरूरत घटती है। यही वजह है कि विकेंद्रीकृत जल शुद्धिकरण व्यवस्था को आपदा प्रबंधन में उपयोगी विकल्प माना जा रहा है।

इंस्टावाटर की कहानी हालांकि असम की बाढ़ से शुरू नहीं हुई। इसकी शुरुआत 2019 में त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के एक आउटरीच प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी। उस समय मकसद साफ था। उन दूरदराज और कमजोर इलाकों तक पीने का साफ पानी पहुंचाना, जहां लोग इस बुनियादी सुविधा से अक्सर वंचित रह जाते हैं। विश्वविद्यालय से शुरू हुई यह कोशिश धीरे धीरे आगे बढ़ी।
2023 के बाद त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के स्टार्टअप इकोसिस्टम से जुड़कर इस पहल ने सोशल एंटरप्राइज का रूप लिया। एचएन टेक्नोवेशन्स के तहत इंस्टावाटर ने पोर्टेबल वॉटर प्यूरिफिकेशन तकनीक पर काम आगे बढ़ाया। प्रयोगशाला और प्रदर्शन से निकलकर यह तकनीक अब वास्तविक आपदा राहत अभियान का हिस्सा बन चुकी है।
एचएन टेक्नोवेशन्स के फाउंडिंग इंजीनियर और त्रिपुरा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हरजीत नाथ के मुताबिक, यह सफर एक विश्वविद्यालयी पहल से शुरू हुआ था। उद्देश्य उन लोगों तक साफ पानी पहुंचाना था, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में भी इसकी कमी का सामना करना पड़ता है। अब वही तकनीक बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए इस्तेमाल हो रही है।
हरजीत नाथ का कहना है कि संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन जरूरत वाली जगह तक साफ पानी पहुंचाने का प्रयास जारी रहेगा। इस सोच में इस पहल की असली कहानी छिपी है। तकनीक तभी उपयोगी मानी जाती है, जब वह प्रयोगशाला से निकलकर किसी मुश्किल वक्त में आम लोगों के काम आए।
असम में इस समय चल रहा राहत अभियान यह भी दिखाता है कि आपदा के दौरान स्थानीय स्तर पर तैयार की गई तकनीक कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। बाढ़ में सबसे पहले परिवहन व्यवस्था प्रभावित होती है। इसके बाद बिजली, स्वच्छता और पेयजल जैसी बुनियादी सेवाओं पर असर पड़ता है। ऐसे में बड़े केंद्रीकृत जल संयंत्रों के बजाय छोटे और मोबाइल सिस्टम कई जगह ज्यादा तेजी से काम कर सकते हैं।

इंस्टावाटर का मॉडल इसी दिशा में जाता है। यह स्थानीय जलस्रोत का इस्तेमाल करता है। सिस्टम को जरूरत वाली जगह पर ले जाया जा सकता है। वहां पानी को शुद्ध करके लोगों को उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे राहत कार्य में समय बचता है और बोतलबंद पानी की जरूरत भी कम होती है।
इस अभियान में पंजाब की ज्योति फाउंडेशन की भी भूमिका रही है। पहले संस्था ने इंस्टावाटर के वॉटर प्यूरिफिकेशन सिस्टम के साथ काम किया था। इस बार इसी सिस्टम को किराए पर लेकर असम के बाढ़ राहत अभियान में इस्तेमाल किया गया है। नेपालीखुटी समेत कई बाढ़ प्रभावित गांवों में इससे लोगों को साफ पानी उपलब्ध कराया जा रहा है।
सिबसागर की जिला आपदा प्रबंधन अथॉरिटी और पब्लिक हेल्थ टेक्निकल डिपार्टमेंट ने भी इस पहल की उपयोगिता को सराहा है। आपात स्थिति में तेजी से तैनात किए जा सकने वाले विकेंद्रीकृत वॉटर प्यूरिफिकेशन सिस्टम की जरूरत को अधिकारियों ने महत्वपूर्ण माना है।
इंस्टावाटर की योजना केवल असम तक सीमित रहने की नहीं है। एचएन टेक्नोवेशन्स आगे गैर सरकारी संगठनों, सीएसआर संस्थाओं, सरकारी विभागों, आपदा प्रबंधन संगठनों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ काम बढ़ाना चाहता है। लक्ष्य देश के दूसरे बाढ़ प्रभावित और पानी की कमी वाले इलाकों तक इस तकनीक को पहुंचाना है।

भारत में बाढ़, चक्रवात और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान साफ पानी की उपलब्धता हमेशा बड़ी चुनौती रहती है। ऐसे समय में राहत सामग्री के साथ सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी होती है। असम में इंस्टावाटर का प्रयोग इसी चुनौती का एक स्थानीय समाधान सामने रखता है।
यह कहानी एक मोबाइल मशीन से कहीं आगे की है। यह एक विश्वविद्यालयी प्रयोग के सामाजिक पहल में बदलने की कहानी है। यह बताती है कि किसी तकनीक का मूल्य केवल उसकी मशीन में नहीं होता। उसका असली मूल्य तब सामने आता है, जब वह बाढ़ में फंसे परिवार तक पहुंचकर एक गिलास साफ पानी उपलब्ध कराती है। असम के सिबसागर में फिलहाल यही हो रहा है। बाढ़ का पानी गंदा है, रास्ते मुश्किल हैं, लेकिन उसी पानी को साफ करके लोगों तक पहुंचाने की कोशिश जारी है।