नारी शक्ति वंदन अधिनियम और देशज पसमांदा समाज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-04-2026
The Nari Shakti Vandan Adhiniyam and the Indigenous Pasmanda Community
The Nari Shakti Vandan Adhiniyam and the Indigenous Pasmanda Community

 

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डॉ फैयाज अहमद फैजी

भारतीय लोकतंत्र में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बहस एक बार फिर केंद्र में है। हाल में प्रस्तुत नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) को एक ऐतिहासिक पहल के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका और वोटिंग के दौरान गिर गया। यह घटनाक्रम केवल एक विधेयक की विफलता नहीं, बल्कि उस गहरे राजनीतिक और सामाजिक मतभेद का संकेत है, जो महिला आरक्षण के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। यह मुद्दा केवल इच्छाशक्ति का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के स्वरूप को लेकर गहरे मतभेदों का है।

दरअसल महिला आरक्षण का इतिहास दशकों पुराने संघर्षों और टलते फैसलों से भरा है। इसकी शुरुआत 1989में राजीव गांधी सरकार ने की, जो लोकसभा में पास होकर भी राज्यसभा में अटक गया। अंततः 1993में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने इसे पारित कराया, जिससे पंचायतों और निकायों में महिला भागीदारी सुनिश्चित हुई।

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संसद और विधानसभाओं के लिए यह मांग 1996में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार के समय उठी और 2008में यूपीए सरकार द्वारा फिर पेश की गई। 2010में राज्यसभा से पारित होने के बावजूद लोकसभा में राजनीतिक अंतर्विरोधों के कारण यह कानून नहीं बन सका।

महिला आरक्षण को अक्सर “महिलाओं के अधिकार” के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसके भीतर एक बुनियादी सवाल छिपा है कि इन 33%सीटों पर कौन-सी महिलाएं पहुंचेंगी?यही वह बिंदु है जहां OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) उप-कोटा की मांग सामने आती है। विपक्ष के नेताओं ने लगातार यह कहा है कि महिला आरक्षण के भीतर OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए।

उनका तर्क है कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो यह आरक्षण मुख्यतः ऊँची जातियों और पहले से सशक्त वर्गों की महिलाओं तक सीमित रह जाएगा। भारतीय समाज की वास्तविकता को देखते हुए यह चिंता निराधार नहीं है, क्योंकि महिलाओं के भीतर भी गहरी सामाजिक और आर्थिक असमानताएं मौजूद हैं।

डॉ फैयाज अहमद फैजी से पसमांदा समाज पर खास बातचीत यहां देखें :-

महिला आरक्षण की चर्चा के दौरान अक्सर यह मांग उठती है कि मुस्लिम महिलाओं को अलग से आरक्षण दिया जाए। लेकिन यह मांग, जितनी सरल दिखती है, उतनी ही जटिल और समस्याग्रस्त है।पहली बात यह है कि मुसलमान कोई एकरूप सामाजिक समूह नहीं हैं।

मुस्लिम समाज के भीतर भी जातिगत विभाजन अशराफ और पसमांदा (मुस्लिम धर्मावलंबी आदिवासी,दलित और पिछड़े) मौजूद है। ऐसे में “मुस्लिम महिला” को एक एकल श्रेणी मान लेना, सामाजिक वास्तविकता को नजरअंदाज करना है।

दूसरी बात धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग न तो संवैधानिक रूप से जायज है और न ही सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप।सुप्रीम कोर्ट ने भी बार‑बार यह स्पष्ट किया है कि आरक्षण सामाजिक वंचितता के आधार पर दिया जा सकता है, न कि धर्म के आधार पर।

धर्म‑आधारित आरक्षण न केवल समाज को धर्म‑समूहों में और ज़्यादा विभाजित करेगा, बल्कि महिला आरक्षण के भीतर से OBC, SC, ST जैसे पिछड़े वर्गों के महिलाओं के साथ समकक्ष पसमांदा महिलाओं के समायोजन की राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अवधारणा को भी कमजोर करेगाI

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इसलिए विरोध यह नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं में वंचितता नहीं है, बल्कि यह है कि उनकी वंचितता,जाति‑पिछड़ापन, भेदभाव छुआछूत और आर्थिक पिछड़ेपन के ढांचे में ही संबोधित होनी चाहिए, न कि धर्म के नाम पर अलग श्रेणी बनाकर।

पसमांदा विमर्श इस बहस में एक स्पष्ट और व्यावहारिक रास्ता प्रस्तुत करता है। इसका मूल सिद्धांत है कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन होना चाहिए।इस दृष्टिकोण के अनुसार OBC पृष्ठभूमि की पसमांदा महिलाएं OBC श्रेणी के भीतर प्रतिनिधित्व पाएं,

दलित प्रकृति की पसमांदा महिलाओं के लिए SC श्रेणी में न्याय की बहस को आगे बढ़ाया जाए,ST पृष्ठभूमि की पसमांदा महिलाओं को ST श्रेणी के तहत शामिल किया जाए।अर्थात, समाधान “मुस्लिम महिला आरक्षण” में नहीं, बल्कि SC, ST, OBC जैसी धर्मनिरपेक्ष श्रेणियों के भीतर समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने में है।

दुर्भाग्य से, संसद में यह बहस उस स्पष्टता और गंभीरता से नहीं उठाई गई, जिसकी आवश्यकता थी। आवाजें तो उठीं, लेकिन संरचनात्मक समाधान की दिशा कमजोर रही। महिला आरक्षण विधेयक का बार-बार विफल होना यह दिखाता है कि यह केवल एक राजनीतिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के ढांचे से जुड़ा जटिल प्रश्न है। जब तक यह स्पष्ट नहीं किया जाएगा कि आरक्षण के भीतर वंचित वर्गों खासतौर पर OBC और पसमांदा महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे सुनिश्चित होगा, तब तक व्यापक सहमति बन पाना मुश्किल रहेगा।

महिला आरक्षण का उद्देश्य तभी सार्थक होगा, जब यह केवल प्रतीकात्मक न रहकर वास्तविक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बने। इसके लिए जरूरी है कि 33%आरक्षण के भीतर OBC महिलाओं के लिए उप-कोटा सुनिश्चित किया जाए, जातिगत जनगणना के आधार पर प्रतिनिधित्व का ढांचा तय हो, और पसमांदा मुस्लिम महिलाओं को उनकी वास्तविक सामाजिक श्रेणियों में समुचित स्थान मिले।

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महिला आरक्षण विधेयक भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, लेकिन यह अवसर तभी सार्थक होगा, जब इसे सामाजिक न्याय के व्यापक ढांचे के भीतर लागू किया जाए।पसमांदा दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि समानता का अर्थ केवल अवसर देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को प्राथमिकता देना भी है। जब तक यह सिद्धांत महिला आरक्षण में शामिल नहीं होगा, तब तक यह प्रयास अधूरा ही रहेगा।

( लेखक अनुवादक स्तंभकार,मीडिया पैनलिस्ट  और पसमांदा-सामाजिक कार्यकर्ता हैं)