कर्ज, कटाक्ष और कूटनीति: पाकिस्तान-यूएई रिश्तों में बढ़ती दरार

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-04-2026
Debt, Barbs, and Diplomacy: The Widening Rift in Pakistan-UAE Relations
Debt, Barbs, and Diplomacy: The Widening Rift in Pakistan-UAE Relations

 

xdअदिति भादुरी

पाकिस्तान इन दिनों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का साढ़े तीन अरब डॉलर का कर्ज चुकाने में जुटा है। इस बीच पाकिस्तानी सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने यूएई का मजाक उड़ाते हुए उसे एक "बेबस देश" बता दिया। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानियों ने ही यूएई को बनाया है। भारत और यूएई की बढ़ती नजदीकियों पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि वे यूएई को 'भाईचारे' वाली सलाह देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यूएई की आबादी केवल एक करोड़ है जिसमें से 45लाख भारतीय हैं। ऐसे में उन्हें भारत से दोस्ती बढ़ाते वक्त सावधान रहना चाहिए ताकि वे भारत के 'अखंड भारत' के आदर्शों का शिकार न बन जाएं।

हैरानी की बात यह है कि सऊदी अरब अब पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आया है ताकि वह यूएई का कर्ज उतार सके। यूएई ने पाकिस्तान से अपना पैसा वापस मांग लिया है। इस पूरे मामले के पीछे कई गहरे कारण हैं जिन्हें समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा।

यूएई और पाकिस्तान के बीच यह दूरी करीब एक दशक पहले शुरू हुई थी। यूएई को आतंकवाद और अपनी सुरक्षा को लेकर डर सताने लगा था। खाड़ी देशों के लिए ईरान हमेशा से एक प्रतिद्वंद्वी रहा है जिसके लड़ाके पूरे अरब जगत में फैले हुए हैं। 'अरब स्प्रिंग' के आंदोलनों ने भी खाड़ी देशों के राजशाहों को डरा दिया था। जब 2015में यह आग यमन तक पहुंची तो सऊदी अरब और यूएई ने मिलकर वहां दखल देने का फैसला किया।

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पाकिस्तान लंबे समय से खाड़ी देशों को सैन्य मदद देता रहा है जिसके बदले उसे भारी निवेश और अनुदान मिलता था। लेकिन यमन के मामले में पाकिस्तान हिचकिचा गया। नवाज शरीफ सरकार को देश के अंदर विरोध और सुन्नी-शिया दंगों का डर था। सऊदी और यूएई को पाकिस्तान का यह रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया। यहीं से पुराने दोस्तों के बीच दरार पड़नी शुरू हुई। हालांकि बाद में सऊदी ने तो पाकिस्तान से रिश्ते सुधार लिए लेकिन यूएई के साथ संबंध उलझे ही रहे।

यूएई एक छोटा सा देश है जहां की अपनी आबादी बहुत कम है। वह एक बड़ा सैन्य पावर नहीं है लेकिन उसने खुद को व्यापार और फाइनेंस के ग्लोबल हब के रूप में स्थापित किया है। इसके लिए उसे शांति और स्थिरता चाहिए। इसीलिए यूएई ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और अपने देश में कट्टरवाद को जगह नहीं दी। उसने खुद को एक उदारवादी और सहिष्णु मुस्लिम देश के रूप में पेश किया जहां मंदिर और चर्च भी बनाए गए।

दूसरी तरफ पाकिस्तान में बढ़ते कट्टरवाद और आतंकवाद को पालने की नीति यूएई के लिए चिंता का विषय बन गई। जब यूएई को लगा कि अमेरिका इस क्षेत्र से दूर हो रहा है और पाकिस्तान सैन्य मदद नहीं दे पा रहा तो उसने नए साथियों की तलाश शुरू की। यहां भारत की एंट्री हुई। देखते ही देखते भारत और यूएई के रिश्ते बहुत मजबूत हो गए।

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2015 में जब प्रधानमंत्री मोदी यूएई गए तो पहली बार दोनों देशों ने सीमा पार आतंकवाद पर साझा बयान जारी किया। दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा होने लगी। यहां तक कि भारत को वांछित पाकिस्तानी नागरिक वहां से पकड़कर भारत भेजे जाने लगे।

इस खींचतान में एक नया मोड़ तब आया जब सऊदी अरब और यूएई के बीच भी मतभेद शुरू हो गए। सऊदी अरब अब खुद को यूएई की जगह क्षेत्र का सबसे बड़ा बिजनेस और ट्रांसपोर्ट हब बनाना चाहता है। वहीं यूएई ने इजरायल के साथ 'अब्राहम समझौता' करके अपनी एक अलग राह चुन ली जो क्षेत्र के कई देशों को रास नहीं आई। यह आपसी होड़ अब पाकिस्तान के मामले में भी दिख रही है।

इमरान खान ने पाकिस्तान को अरब देशों से दूर करने की कोशिश की थी लेकिन शरीफ सरकार के आते ही पुराना दौर लौट आया। शहबाज शरीफ ने प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले सऊदी और यूएई का दौरा किया। कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान को इन दोनों देशों ने कर्ज और उधार तेल देकर सहारा दिया।

इसके बदले में पिछले साल पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता हुआ। इसमें तय हुआ कि एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। यह बात यूएई को खटक गई क्योंकि उस वक्त यमन के मुद्दे पर उसके सऊदी के साथ मतभेद चल रहे थे।

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लेकिन यूएई के लिए सबसे बड़ा झटका ईरान युद्ध के दौरान पाकिस्तान का तटस्थ रहना था। इस युद्ध में यूएई को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। ईरान के हमलों ने यूएई की सुरक्षित छवि को बिगाड़ दिया और उसे अरबों डॉलर का घाटा हुआ। पाकिस्तान ने इन हमलों की निंदा करने के बजाय ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता की पेशकश कर दी। यूएई को लगा कि मुसीबत के वक्त उसके पुराने दोस्त ने फिर से साथ नहीं दिया।

इसके अलावा पाकिस्तान ने अपनी वायु सेना के विमान सऊदी अरब में तैनात कर दिए। उसने इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता में भी यूएई को नहीं बुलाया और इसके बजाय सऊदी, तुर्की और मिस्र से चर्चा की। यूएई के इन सभी देशों के साथ अपने राजनीतिक मतभेद हैं।

इन सब वजहों ने ऐसा माहौल बना दिया कि यूएई ने पाकिस्तान के पैर नीचे से जमीन खींचने के लिए अपना कर्ज वापस मांग लिया। आने वाले दिनों में यह खाई और चौड़ी होने की आशंका है। सऊदी अरब का तुरंत मदद के लिए आगे आना यह दिखाता है कि क्षेत्र में नई गुटबाजी शुरू हो चुकी है। इस पूरी लड़ाई में पाकिस्तान की स्थिति फिलहाल काफी कमजोर नजर आ रही है।