सानिया अंजुम
कुछ जिंदगियां अपनी कामयाबी का शोर नहीं मचातीं। वे दशकों तक क्लासरूम, बातचीत और अपने फैसलों के जरिए खामोशी से समाज में बदलाव लाती हैं। प्रोफेसर सलमा बेगम का सफर भी कुछ ऐसा ही है। यह कहानी सिर्फ बड़े सपनों की नहीं, बल्कि उस यकीन की है कि अगर शिक्षा को संवेदना और मकसद के साथ जोड़ा जाए, तो वह इंसान और समाज दोनों की सूरत बदल सकती है।
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए वे बताती हैं कि पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद वे करियर को लेकर असमंजस में थीं। 1980के दशक में करियर काउंसलिंग जैसी चीजें बहुत कम हुआ करती थीं। उस दौर की कई महिलाओं की तरह उन्होंने भी बैंक और एलआईसी में हाथ आजमाया, लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा।

मोड़ तब आया जब उन्होंने एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया। सलमा कहती हैं कि पहले ही दिन उन्हें अहसास हो गया था कि यही उनका असली रास्ता है। पढ़ाने में उन्हें जो खुशी मिली, वह उन्हें कहीं और नहीं मिली।
प्रोफेसर सलमा के मूल्यों की जड़ें कृष्णागिरी में उनके बचपन से जुड़ी हैं। उनके घर में पैसा नहीं, बल्कि ऊंचे आदर्श मायने रखते थे। उनके परिवार में शेक्सपियर, रूमी और पंचतंत्र की चर्चा आम बात थी। साहित्य उनके लिए सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसे जिया और महसूस किया जाता था। बचपन के इसी माहौल ने उनकी भाषा और सोच को गहराई दी, जो बाद में उनके पढ़ाने के अंदाज में भी झलकी।
लड़कियों की शिक्षा को लेकर उनका नजरिया बहुत साफ है। वे बताती हैं कि बचपन में उन्होंने देखा कि परिवारों में बेटियों की पढ़ाई को तवज्जो नहीं दी जाती थी। लड़कियों को यही सिखाया जाता था कि शादी ही उनका आखिरी मकसद है। लेकिन सलमा का परिवार अलग था।

वहां लड़कियों की शिक्षा को सबसे जरूरी माना जाता था। उनकी मां का मानना था कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं देती, बल्कि चरित्र और साहस का निर्माण करती है। वे कहती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया कि सम्मान किसी भी भौतिक सुख-सुविधा से कहीं बढ़कर है।
उनके करियर का एक चुनौतीपूर्ण अध्याय चन्नापटना में शुरू हुआ। वहां पढ़ाई का माध्यम कन्नड़ था और छात्र सिर्फ वही भाषा समझते थे। सलमा ने इसे दीवार नहीं बनने दिया। उन्होंने ट्रेन के सफर के दौरान कन्नड़ सीखना शुरू किया।
धीरे-धीरे छात्रों की मदद से उन्होंने न सिर्फ भाषा सीखी, बल्कि अर्थशास्त्र जैसे विषय को कन्नड़ में पढ़ाने में महारत हासिल कर ली। वे मानती हैं कि अगर हम छात्र की भाषा में बात करें, तो मुश्किल विषय भी आसान हो जाता है। उनकी काबिलियत का आलम यह था कि बाद में उन्हें महारानी कॉलेज में कन्नड़ माध्यम की क्लास लेने के लिए बुलाया गया।
अर्थशास्त्र प्रोफेसर सलमा के लिए सिर्फ एक विषय नहीं है। वे इसे व्यापार, वित्त और जीवन के हर पहलू से जुड़ा मानती हैं। वे कहती हैं कि आज के दौर में अर्थशास्त्र का दायरा बहुत बढ़ गया है, जो इसे और भी दिलचस्प बनाता है। क्लास में उनका मकसद छात्रों को सिर्फ पढ़ाना नहीं, बल्कि उनके मन में इस विषय के प्रति प्यार जगाना होता है।
साहित्य को लेकर भी उनकी समझ बहुत गहरी है। वे अंग्रेजी और उर्दू दोनों भाषाओं के साहित्य का सम्मान करती हैं। वे मानती हैं कि साहित्य ही भाषा को सलीका और खूबसूरती देता है। उर्दू के बारे में वे कहती हैं कि यह एक नई भाषा जरूर है, लेकिन इसका साहित्य बहुत जीवंत और संवेदनशील है।

प्रोफेसर सलमा की शैक्षणिक उपलब्धियां भी शानदार हैं। उन्होंने 1995 में बेंगलुरु यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। उन्होंने पांच किताबें और कई शोध पत्र लिखे हैं। उन्होंने 'सबला' (SABALA) नाम की एक संस्था भी बनाई। इसका मकसद महिला छात्रों और स्टाफ को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें सशक्त बनाना था। सबला के जरिए उन्होंने कानून, संचार कौशल और टीम वर्क जैसे विषयों पर सफल काम किया।
आज की युवा महिलाओं को वे एक खास संदेश देती हैं। वे कहती हैं कि महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे हैं, लेकिन मैनेजमेंट और फैसले लेने की ताकत अब भी ज्यादातर पुरुषों के पास है। उनकी सलाह है कि महिलाएं नेतृत्व करना सीखें। वे कहती हैं कि समाज को नाराज करने का डर छोड़ें और आगे बढ़कर अपनी भूमिका खुद तय करें। प्रोफेसर सलमा बेगम की जिंदगी हमें याद दिलाती है कि सच्ची शिक्षा सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि उसे जीने के सलीके में होती है।